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देवरिया बालिका गृह कांड: जांच टीम ने सीडब्ल्यूसी का व्यवहार गैर जिम्मेदाराना बताया

गोरखपुर. देवरिया बालिका गृह कांड की जांच करने वाली अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार और अपर महानिदेशक अंजू गुप्ता ने देवरिया की बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी की है. जांच टीम ने कहा है कि ‘ बाल कल्याण समिति का संव्यवहार लापरवाही पूर्ण और गैर जिम्मेदाराना रहा है. बाल कल्याण समिति, किशोर न्याय (बच्चों के देखरेख व संरक्षण) अधिनियम द्वारा अधिरोपित अपने कर्तव्यों का पालन करने में पूर्णतया अक्षम रही. ’

उल्लेखनीय है कि इसी जांच टीम की रिपोर्ट के बाद देवरिया की बाल कल्याण समिति को भंग कर दिया गया है. देवरिया की बाल कल्याण समिति दिसम्बर 2016 में गठित हुई थी. इसके अध्यक्ष श्रीकांत यादव थे जबकि सदस्य के रूप में कौशल किशोर, कनक लता दिवेदी, रंजना तिवारी और प्रतिभा श्रीवास्तव कार्य कर रहे थे.  नई बाल कल्याण समिति का गठन होने तक देवरिया जिले का कार्य महराजगंज की बाल कल्याण समिति को करने का आदेश दिया गया है. यह आदेश महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार ने नौ अगस्त के अपने आदेश में दिया है जो कुछ दिन पहले ही देवरिया आया है.

देवरिया बालिका गृह कांड की जांच कई स्तरों पर हो रही है. सबसे पहले इसकी जांच महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव रेणुका कुमार और वूमेन पावर लाइन/ महिला सम्मान प्रकोष्ठ की अपर महानिदेशक अंजू गुप्ता ने की.  इस जांच कमेटी में रेणुका कुमार अध्यक्ष और अंजू गुप्त सदस्य थीं.  इस जांच कमेटी ने प्रमुखतः मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा नियम विरूद्ध किए जा रहे कार्यों और दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर केन्द्रित की.

जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि डीएम देवरिया के मौखिक निर्देश पर गठित समिति ने 12 जुलाई 2018 को गिरिजा त्रिपाठी के संस्थान द्वारा संचालित बालिका गृह, शिशु गृह और एडाप्शन सेंटर का निरीक्षण किया था. इस समिति में जिला प्रोबेशन अधिकारी प्रभात कुमार, जिला बाल संरक्षण अधिकारी जय प्रकाश त्रिपाठी, बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष श्रीकांत यादव, बाल कल्याण समिति की सदस्य रंजना श्रीवास्तव, 181 महिला हेल्प लाइन की माला मणि और 181 महिला हेल्प लाइन की सुगमकर्ता संध्या सिंह थीं.

समिति ने अपनी निरीक्षण रिपोर्ट डीएम को दी थी.  इस रिपोर्ट में कहा गया था कि मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान की अधीक्षक और उनके संचालकों का कार्य व्यवहार मनमाना व स्वेच्छाचारी है.  निरीक्षण के दौरान दो महिला कांस्टेबल मिली जो दो बालिकाओं को बालिका गृह लेकर आयीं थी. बाल कल्याण समिति ने कांस्टेबल से पूछा कि बालिकाओं को किसके आदेश से लाया गया है तो उन्होंने बताया कि एसआई के आदेश से लाया गया है.

जिला बाल कल्याण समिति देवरिया के अध्यक्ष और सदस्य अपने कार्यालय में

जिला परिवीक्षा अधिकारी ने विशेष दत्तक ग्रहण इकाई सात शिशुओं के बारे में पूछा तो अधीक्षिका कंचनलता त्रिपाठी ने बताया कि सभी शिशु, शिशु गृह में हैं. यह पूछे जाने पर कि ये शिशु किसके आदेश पर यहां रखे जा रहे हैं तो अधीक्षिका का जवाब था कि हम संस्था की नियमावली के अनुसार कार्य कर रहे हैं. हमें किसी का आदेश लेने की जरूरत नहीं है. हम जेजे एक्ट और महिला कल्याण विभाग की मातहत नहीं हैं. अधीक्षका ने यह भी कहा कि शिुशओं के बारे में कारा के उच्चाधिकारियों से उनकी बातचीत होती है. जो भी कार्यवाही करानी है, कारा से पत्राचार कर करें. उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न थानों से बच्चे उनकी संस्था में भेजे जा रहे हैं जिसके बारे में पुलिस कप्तान भी अवगत हैं.

संस्था की अधीक्षिका ने 23 जून 2017 को मान्यता रद हो जाने के समय यहां पर रह रहे पांच शिशुओं के बारे में भी कोई जवाब नहीं दिया और कहा कि इस बारे में उनसे किसी को प्रश्न करने का अधिकार नहीं है.

समिति की निरीक्षण रिपोर्ट कहती है कि ‘ विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान द्वारा संचालित बाल गृह बालिका की मान्यता 23 जून 2017 को स्थगित कर दी गई थी और बच्चों को दूसरी संस्था में स्थानान्तरित करने का आदेश महिला कल्याण निदेशक द्वारा दिया गया था लेकिन संस्थान ने बच्चों को स्थानान्तरण नहीं किया। इससे बाल गृह (शिशु)  के सात बच्चों की दत्तक ग्रहण प्रक्रिया बाधित है. संस्था जेजे एक्ट 2015 के विरूद्ध अवैधानिक रूप से संचालित की जा रही है. संस्थान का भवन मानक के अनुरूप नहीं हैं. संस्थान में रह रहे बालक /बालिकाओं के शिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है और यह रह रही संवासियों का पुनर्वासन प्रक्रिया भी बाधित है. संस्थान द्वारा विशिष्ट दत्तक ग्रहण के विनिमयों का पालन नहीं किया जा रहा है. संस्थान के ऐसे कार्य से खरीद फरोख्त व दुव्र्यपार की संथावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. ’

रेणुका कुमार और अंजू गुप्ता जांच कमेटी ने अपनी जांच में कहा कि इस निरीक्षण रिपोर्ट के बाद बाल कल्याण समिति को संस्था के विरूद्ध एफआईआर दर्ज करानी चाहिए थी और किशोर न्याय (बालकों की देख रेख व संरक्षण) अधिनियम 2015 के तहत प्रभावी कार्यवाही की जानी चाहिए थी, जो नहीं की गई.

जांच कमेटी ने कहा-‘ बाल कल्याण समिति सीडब्ल्यूसी के बयानों से स्पष्ट है कि उन्हें यह पता था कि संस्था द्वारा संचालित गृहों की मान्यता समाप्त हो चुकी है। उनके संज्ञान में यह भी था कि आस-पास के जिलों की सीडब्ल्यूसी, जनपद देवरिया की पुलिस व कोर्ट के आदेश से बालक /बालिकाएं इन गृहों में एक वर्ष से लगातार लाए जा रहे थे. सीडब्ल्यूसी ने इन गृहों की कार्यवाही की कोई मानीटरिंग नहीं की और न ही इस संबंध में कोई रिपोर्ट प्रेषित की, अतः सीडब्ल्यूसी को तत्काल प्रभाव से भंग करने की संस्तुति की जाती है. ’

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