विचार

डॉक्टरों के सम्मान और सुरक्षा की चिंता उतनी ही जायज़ हैं जितनी बाकी समाज की

फोटो -साभार एएनआई
डॉक्टरों के सम्मान और सुरक्षा की चिंता उतनी ही जायज़ हैं जितनी बाकी समाज की ।
स्वीकार करना ही चाहिए कि पत्रकारिता की तरह चिकित्सा भी एक धंधा बन चुका है । पत्रकारिता की ही तरह चिकित्सा का भी कार्पोरेटीकरण होता जा रहा है , अब सरकारी सूत्रीकरण भी ।
फिलहाल बंगाल में जो डाक्टरों का उबाल दिख रहा है और उसका जितना मुस्तैद समर्थन पूरे देश में वायरल हुआ  है , वह बिना सियासी रणनीति के सम्भव ही नहीं।
चरणबद्ध तरीके से शहर दर शहर चिकित्सकों का हड़ताल का समर्थन करते हुए आंदोलन करना एक सोची समझी रणनीति और निर्देश के अलावा स्वतःस्फूर्त नहीं  है । दुखद यह है कि इतना प्रबुद्ध तबका भी इस गेम को समझ नहीं पा रहा ।
समाज के अन्य तबकों की तरह डाक्टरों की महत्वाकांक्षा अब सियासी भी हो गई है।
शिक्षा और चिकित्सा , दोनों बुनियादी सामाजिक सुविधाओं का कार्पोरेटीकरण चिंता का विषय है । सरकारी शिक्षकों की तरह सरकारी चिकित्सक भी सुविधा विहीन स्थितियों में काम कर रहे हैं । पर दुखद है कि वे इन सुविधा विहीन स्थितियों से लड़ने और उन्हें बदलने की जगह उसे ही अपनी धन लिप्सा के लिए किए जा रहे अनैतिक कार्यों को जायज ठहराने का तर्क बना ले रहे हैं । गांव के अस्पताल से बिना ड्यूटी तनख्वाह लेना और शहर कस्बे में प्राइवेट प्रैक्टिस करना । जेनरिक दवाओं की जगह फार्मास्युटिकल्स की दवाएं लिखना । अपनी मनमानी फीस निर्धारित कर लेना , आदि आदि ।
बाकी जो सक्षम हैं वे एक करोड़ की पढ़ाई के बदले अपना नर्सिंग होम खोल रहे हैं या बने बनाए नर्सिंग होमों में सेवा बेच रहे हैं । दवा कम्पनियों के साथ डाक्टरों की साठगांठ और कमीशनखोरी छिपी नहीं है । गोरखपुर में बच्चों की आक्सीजन न होने से मौत का मामला रहा हो या अभी मुजफ्फरपुर में मर रहे बच्चों का मामला हो, कभी डाक्टरान इसके खिलाफ संगठित हुए ?
किसी सामाजिक आर्थिक राजनीति मामले पर उनका संगठन सड़क पर उतरा ?
क़फ़ील ही नहीं कई मुद्दे ऐसे हैं जो अनसुने अनसुलझे हैं और इस डाक्टर एकता के आड़े आते हैं ।
डॉक्टर भगवान नहीं होता मगर मरीज़ और तीमारदार उसमें अपनी मुक्ति ही देखता है । गलती उससे भी हो सकती है । और मरीजों की बढ़ती तादाद का बोझ गलतियों की तादाद बढाने का बहुत बड़ा कारक भी है । मगर ऐसे में भी डाक्टर के साथ परिजनों की बदसलूकी कहीं से जायज नहीं है । परंतु परिजनों के साथ डाक्टरों की एकल और फिर सांगठनिक मारपीट कहां तक जायज है ? गोरखपुर मेडिकल कॉलेज और अन्य प्राइवेट अस्पतालों में यह प्रवृत्ति लगातार देखी जा रही है ।
आम आदमी डाक्टरों के बारे में अब बहुत अच्छी राय नहीं रखता जैसे कि वकीलों या नेताओं या पत्रकारों के बारे में । बेशक यह सामाजिक आर्थिक गिरावट के ही कारण है । पर अभी मामला डाक्टर के बहाने ममता का है ।
दिख रहा है कि ममता बनर्जी के अंदर  सियासी रणनीति कुशलता की बेहद कमी है । बंगाल में डाक्टरों की हड़ताल को देश व्यापी बनने देने की जिम्मेदारी आखिर वहां के सी एम की नहीं तो किसकी है ?

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