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Swami-Vivekananda

व्यवहार के दार्शनिक विवेकानन्द

सदानन्द शाही

विवेकानन्द की एक किताब है-मेरा भारत,अमर भारत। हर उस व्यक्ति को जो देश से प्रेम करता है और देश के लिए कुछ करना चाहता है,यह किताब जरूर पढनी चाहिए।इस किताब में विवेकानन्द ने अपने भारत की कल्पना की है ।साथ ही कल्पना को साकार करने के उपाय बताये हैं।

राष्ट्रीय पतन के कारणों पर विचार करते हुए विवेकानन्द महसूस करते हैं कि पतन का सबसे महत्वपूर्ण कारण जन समुदाय की उपेक्षा है।दुनिया भर के लोगों ,देशों और जातियों से सम्पर्क में आने के बाद विवेकानन्द ने भारत की अपनी कमजोरियों पर भी दृष्टिपात किया। वे लिखते हैं कि भारत में  दो बडी बुरी बातें हैं-‘स्त्रियों का तिरस्कार और गरीबों को जातिभेद के द्वारा पीसना’। विवेकानन्द हमें बताते हैं कि इसके मूल में हमारा दार्शनिक दोमुंहापन है। तात्विक स्तर पर सबको ब्रह्मस्वरूप मानना और व्यावहारिक स्तर पर घृणा और क्रूरता का व्यवहार करना हमारे समाज की सबसे बडी विकृति है।

उन्होंने  कहा कि -‘जिन असंख्य करोडों लोगों  को हमने अद्वैत का तत्व सुनाया और जिनसे तीव्र घृणा की ,जिनके विरोध में हमने लोकाचार का आविष्कार किया ,जिन्हें हमने मुख से तो कहा कि सब बराबर हैं,सब एक ही ब्रह्म हैं,परन्तु इस उक्ति को काम में लाने का तिल मात्र भी प्रयत्न नहीं किया’। वे बार- बार कहते हैं कि गरीबों  और निम्न जाति वालों का गला घोटने में भारत की सामाजिक संरचना जैसी क्रूरता दिखाती है वैसी क्रूरता दुनिया में कहीं नहीं है।

वे अद्वैत को व्यावहारिक रूप देने का प्रस्ताव करते हैं और इस तरह मनुष्य और मनुष्य में भेद को मिटाने की कोशिश  करते हैं। वे ब्रह्माण्ड के एकत्व को भारत की सबसे बडी खोज बताते हैं और कहते हैं कि खोज पर हम गुमान नहीं करते। अगर इस बात को ठीक से समझ लिया जाये तो कोई किसी का नुकसान या अनिष्ट चिंतन ही न करे। यदि यह बात सही है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक है तो यह भी सही है कि  अपना नुकसान किये बिना कोई व्यक्ति  दूसरे का अनिष्ट कर ही नहीं सकता। जो शक्तियां भारत के करोडों -करोड गरीब जन के साथ भेदभाव और अन्याय कर रही हैं वे खुद अपने अनिष्ट में लगी हुई हैं। हम देख रहे हैं कि जैसे -जैसे भारतीय लोकतंत्र की उम्र बढ रही है वैसे -वैसे यह दोमुंहापन कम होने के बजाय बढता गया है और लैंगिक सामाजिक भेदभाव तीव्रतर हुए हैं।विवेकानन्द  मानते हैं कि अद्वैत को  व्यावहारिक रूप देकर  ही इस अनिष्ट को रोका जा  सकता है।

विवेकानन्द ने शिद्दत से महसूस किया  कि भारत में   -‘वे लोग जो किसान हैं; जो मछुआरे , जुलाहे,जो भारत के नगण्य मनुष्य हैं ,विजाति विजित स्वजाति निन्दित छोटी छोटी जातियां हैं,वे ही लगातार चुपपचाप काम किए जा रही हैं।’  निरन्तर काम करने वाली ये जातियां अपने परिश्रम का फल नहीं पा रही हैं। क्योंकि -पुरोहिती शक्ति और विदेशी विजेतागण के हाथों सदियों से कुचले जाने के कारण गरीबों की दुर्दशा हुई है।विदेशी विजेताओं के जाने के बाद भी पुरोहिती वर्चस्व बना हुआ है। इससे भारत की बडी आबादी भारत की उन्नति की पटकथा में अपना योगदान नहीं कर पा रही है। वर्चस्वशाली समूहों की   महत्वाकांक्षा आज भी भारत की दुर्दशा और पतन के मूल में है। गांधी ने इसे ही लोभ की पराकाष्ठा कहा है।

 विवेकानन्द  ने गरीबों के उत्थान को  भारत वर्षोन्नति का प्रमुख  उपाय बताया है । वे इस तथ्य को भलीभांति जानते थे कि दरिद्र नारायण के कल्याण के बिना भारत का पुनर्निर्माण संभव ही नहीं है। दरिद्रनारायण को पहले से शिक्षा से वंचित  रखा गया है ,कमोबेश आज भी यह बात जारी है।शिक्षा पर एकाधिकार को विवेकानन्द बहुत बडा दुर्भाग्य मानते हैं,और इसे खत्म करने के हर संभव साधन अपनाने पर जोर देते हैं। वे मानते हैं कि भारत की विशाल जनसंख्या भारत की समस्याओं का समाधान खोज सकती है।लेकिन विद्या-बुद्धि,राज-शासन और दम्भ के बल पर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने  शिक्षा  पर एकाधिकार  कर लिया है और बहुत बडी जनसंख्या को  देश निर्माण की प्रकिया से बाहर कर दिया है। इसीलिए वे  सबके लिए शिक्षा का द्वार खोल देना चाहते हैं।

भारतीय समाज की एक और विलक्षण बुराई है ‘आलस्य और नीचता’। विवेकानन्द स्पष्ट शब्दों में कहते हैं -आलस्य के चलते स्वयं कुछ न करना और यदि दूसरा कोई कुछ करना चाहे तो उसकी हंसी उडाना भारतवासियों का एक महान दोष है।वे हमें यह भी बताते हैं कि  इस दोष की परिणति हृदयहीनता और उद्यम के अभाव में होती हैं।इसीलिए वे आलस्य और नीचता को त्याग कर कर्मशीलता का आह्वान करते हैं।विवेकानन्द कहते हैं कि हम आलसी हैं,हम कार्य नहीं कर सकते ,हम पारस्परिक एकता स्थापित नहीं कर सकते,हम एक दूसरे प्रेम नहीं करते ,हम बडे स्वार्थी हैं,हम तीन मनुष्य एकत्र होते ही आपस में घृणा करते हैं, ईर्ष्या करते हैं। ……..हम बातें बहुत करते हैं परन्तु उसके अनुसार कभी कार्य नहीं करते।

विचार और कर्म की दूरी को विवेकानन्द कबीर आदि संतों की तरह खारिज करते हैं। विवेकानन्द को याद करते हुए हमें बराबर ध्यान रखना चाहिए कि वे व्यवहार के दार्शनिक थे। याद हमें यह भी रखना चाहिए कि  हम विवेकानन्द की बात तो करते हैं लेकिन  उनकी बातों को आचरण में नही उतारते।आचरण में उतारे बिना बडी से बडी बात सिर्फ बात ही होगी और इससे न तो देश और समाज की उन्नति  हो सकती है और न ही व्यक्ति की।

About The Author

सदानन्द शाही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं
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One comment

  1. बहुत शानदार प्रयास , उम्दा लेख

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