लोकसभा चुनाव 2019

ट्रेन यात्रा में युद्धोन्माद, बेरोजगारी और माननीय का जूता

युद्धोन्माद और राष्ट्रवादी शोर के बीच हाल ही में लंबे समय बाद एक यात्रा के दौरान नये भारत को देखने समझने का मौका मिला। अलसुबह इंटरसिटी एक्सप्रेस से गोरखपुर से लखनऊ का पांच घंटे का सफर। सीट नं. 103 के कन्फर्म टिकट वाले बोगी में सिर्फ 90 सीट। लोगों को सहूलियत रही कि ऊपर के एलाटमेंट वाले भी बोगी में समा ही लिए।

सफर शुरू। सामने की सीट पर बैठे बुजुर्ग अपने पीठासीन अधिकारी होने के दौर की चुनावी धांधली पर बगलगीर से चर्चारत थे। इधर मेरे बगलगीर ने अख़बार खरीदा। नं. 1 वाले अख़बार के टाप बाक्स पर भाजपा सांसद और विधायक के बीच जूतमपैजार की खबर थी। जी, यह राष्ट्रवादी संस्कार वाली घटना की सुबह थी। उन्होंने कहा- इ तो खूबे जूता चला। फिर तो जूते पर परिचर्चा चल पड़ी। पीठासीन अधिकारी यानि मास्टर साब ने कहा- गलती फलां की थी, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसी बीच ऊपर की सीट पर बैठे कुछ युवा भी चर्चा में एंट्री मार लिए। एक ने कहा- क्या अंकल, आप इसमें गलती ढूंढ रहे हैं। ये माननीय लोग वहां कौन सा माननीय काम कर रहे थे। फिर क्या सभी ने बारी-बारी से अपनी सुनाई।

एक ने कहा- ये सरकार कुछ भी ठीक नहीं कर पा रही है। चुनाव आने पर प्रदेश में भर्तियां शुरू की गयीं, प्रक्रिया किसी की पूरी नहीं हुई। तो एक ने कहा- चुनाव आते ही पुलवामा भी हो गया… देखते-देखते वही सवाल उठने लगे जिसे दबाने के लिए सत्ता और गोदी मीडिया की जुगलबंदी ने आफ़त मचा रखा है। उधर मास्टर साब की कनपटी सूर्ख, चर्चा को समेटकर बगलगीर से बतकही में व्यस्त हो गए।

कमाल है, दबाने के भगीरथ प्रयास के बाद भी ये सवाल हैं कि उठे जा रहे हैं। लखनऊ पहुंचते-पहुंचते इन प्रयासों का असर भी दिखा। अभिन्न अंग कहे जाने वाले प्रदेश के अपने कुछ भाई को लखनऊ में राष्ट्रवादी देश प्रेमियों ने कूट दिया। तीसरे दिन इंटरसिटी से वापसी का सफर। इस बार की चर्चा में मैं ही निशाने पर आ गया। मेरे बगल की खाली सीट पर 20 से 25 साल के दो लड़के धमक लिए। लिखने-पढने के शौक की चर्चा में उन्होंने मुझे मीडिया वाला ही समझ लिया। एक ने कातर लहजे में पूछा- अच्छा ये मीडिया वाले चार का चालीस खूब करते हैं न ? मैंने कहा- भाई, वो भी तो कुछ बेच रहे हैं न। उसने कहा- बढ़िया बेच रहे हैं। फिर दूसरे ने कहा- एक बात पूछें बुरा नहीं न मानिएगा। मैंने कहा- पूछो। उसने कहा- ये पुलवामा… मैंने सवाल काटकर जवाब देना उचित समझा। उससे कहा- सवाल उठना, उठाना बुरा नहीं होता, पर जवाब जरूर सही ढूंढा जाना चाहिए। अब सही जवाब को लेकर मैं खुद ही गड्डमड्ड था। सही जवाब कहां ढूंढा जाए, जब सवाल-जवाब की विधा को ही खत्म करने का खेल हो रहा हो।

घर पहुंचकर एक बार फिर फ्लैश बैक में चला गया। पुलवामा की दुखद त्रासदी के बाद मीडिया की उन्माद गाथा में कैसे जनपक्षीय सवाल बह से गए। एक ऐसा खतरनाक महौल जहां सत्ता की वफादारी से इतर कोई भी बात सीधे देशद्रोह से जोड़ने की होड़। युद्धोन्माद में युद्धोन्मत्त हो सिर्फ युद्ध-युद्ध का महिमामंडन। संकट के काल को गौरव व जश्न में तब्दील करने का झोल। विकास के सवाल को विनाश और तबाही के डर में बदल देने का खेल। वाकई, आजादी के दौर के अपने मिशन काल से अब के इस पेशेवर और कारपोरेटी दौर की पत्रकारिता/मीडिया का यह हश्र विचलित करने वाला रहा। यह तब, जबकि दुनिया के बड़े लोकतंत्र के रूप में देश अभी तमाम चुनौतियों के बीच अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहा है। दुर्भाग्य यह भी कि ये सब लोकतंत्र की पैरोकारी व चौकीदारी की आड़ में हो रहा है।

फिलहाल यात्रा की चर्चा से कुछ सुकून मिला। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, दुश्मन रहा है सदियों दौरे जहां हमारा… बरबस हा यह गीत स्मरण हो आई। अल्लामा इकबाल की इन पंक्तियों में इस जमीन की यही सच्चाई है और ताकत भी। यह सही है कि आजादी के बाद देश में लोकतांत्रिक परिवेश के लिए परिस्थितियां बहुत स्वस्थ और अनुकूल नहीं रही। तमाम विविधता के बीच जातीयता, सांमती ठसक व सांप्रदायिकता को हमेशा से ही राजनीतिक हवा मिलती रही है। लोभ, छल-कपट, नाटक-प्रपंच, दबंगई ये सब बरसों से चुनाव में जीत हार के हथियार रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पंचायत चुनाव तो इसमें दो कदम और आगे ही रहे। बावजूद इसके आम जनमानस में लोकतांत्रिक समझ फलती फूलती रही। माटी, मेहनत, खून-पसीने वाली जिंदगी की जद्दोजहद में वह राम रहीम, देशभक्ति, राष्ट्रवाद जैसे फ़लसफे से बखूबी वाकिफ़ रहा है। वह अच्छी तरह जानता है कि कब उसका पांव पखारा जाएगा और कब पांव तले जमीन खींच ली जाएगी। मान, अपमान और दुत्कार के तमाम पैतरों से वह न सिर्फ चौकन्ना बल्कि चतुर भी हो चुका है।

इसकी बानगी कुछ समय पहले गांव में देखने को मिली थी। किसान समृद्धि योजना के तहत पहली खेप की राशि के आने के पहले लोग चौकस हो गए। लोग एक अजीब सी चर्चा करने लगे कि खाते में पैसा आते ही जल्द ही निकाल लो, नहीं तो वापस हो जाएगा।

खैर, देखने-समझने के इन अनुभवों में एक मोटा-मोटी समझ जरूर बन गया। वो ये कि अब देश की दुश्वारियों को झूठ व जुमले में निपटाकर अंधराष्ट्रवाद का हौव्वा बनाना खुद सत्ता और उसके सत्ता लोभ का भ्रम है। आम जन का भ्रम नहीं। हां, इस खेल में दरबारी मीडिया का उदय जरूर अप्रत्याशित है। जहां वह सत्ता की चाटुकारिता और वफादारी मे खुद के विनाश का हल्ला बोल रहा है। उसका असर सिर्फ इतना भर है कि कुछ खाए-पिए, अघाए लोगों के ड्राइंग रूम और दफ्तर की चर्चा में उनकी सांमती और सांप्रदायिक ठसक को सुकून मिल जाता है। आम जन को ऐसे सुकूं की फुरसत कहां ? वह तो जय जवान और जय किसान की परंपरा में जी व जान खपा रहा है। शायद यही सोचकर…

ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन।

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