Wednesday, February 1, 2023
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आज के समाज को समझने के लिए भी प्रेमचन्द को पढ़ना जरूरी-प्रो अवधेश प्रधान

साहित्कारों, साहित्य प्रेमियों ने बयां किए अपने जीवन पर प्रेमचन्द की कहानियों का प्रभाव

‘ गोरखपुर में प्रेमचन्द: शताब्दी स्मरण ’ श्रृंखला
गोरखपुर, 27 सितम्बर। प्रेमचन्द को पढ़ कर हम देश को जानते है। उनके समय के देश को और आज के देश को भी। आज के समाज को समझने के लिए भी प्रेमचन्द को पढ़ना जरूरी है क्योंकि उनकी कहानियां हमें बताती हैं कि कौन से सवाल अभी हल होने से रह गए हैं। प्रेमचन्द हमारी सहानुभूति का विस्तार करते हैं, बड़ा सन्दर्भ देते हैं।
यह बातें बीएचयू के हिन्दी के प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने आज प्रेमचन्द पार्क में प्रेमचन्द साहित्य संस्थान द्वारा ‘ गोरखपुर में प्रेमचन्द: शताब्दी स्मरण ’ श्रृंखला के तहत ‘ प्रेमचन्द की कहानियां का मेरे जीवन पर प्रभाव ’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने हमें बताया कि भोजपुररी जनपद की स्त्री कैसी होती है। उसकी प्रेम, घृणा और प्रतिरोध की शक्ति क्या होती है। उन्होंने दलित समाज की चुनौतियों हो ह्दय से अनुभव करना सिखाया। उन्होंने प्रेमचन्द को पढ़ना अनिवार्य किए जाने पर बल देते हुए कहा कि प्रेमचन्द हमारे मन को बदलते हैं। समाज के गरीबों, दलितों, स्त्रियों, बच्चें, वृद्धों के दुख दर्द को अपना दुख दर्द समझना सिखाते हैं।

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इस कार्यक्रम में लोगों ने प्रेमचन्द की कहानियों को अपने जीवन पर पड़े प्रभाव के बारे में बताया। फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने कहा कि प्रेमचन्द की कहानी ‘ कफन ’ का मंचन करते समय वह प्रेमचन्द से जुड़े। आज वह अपने कार्यों में प्रेमचन्द का मागदर्शन पाते हैं। युवा शिक्षक आनन्द पांडेय ने कहा कि प्रेमचन्द की कहानियों ने उनके किशोर मन को संवेदनात्मक ज्ञान से परिचय कराया। वरिष्ठ पत्रकार जगदीश लाल ने कहा कि कफन कहानी ने उनके उपर गहरा प्रभाव डाला। इस कहानी ने उनके जीवन के कार्यों में हाशिए के समाज को हमेशा अपने दृष्टि में रखने की सीख दी। वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार ने कहा कि उन्हें ईदगाह कहानी ने जबर्दस्त रूप से प्रभवित किया। उन्होंने पाया कि उनके गांव में कई हामिद हैं। प्रेमचन्द की कहानियों के सौन्दर्य बोध ने हाशिए को समाज को अपनी पीड़ा हरने की ताकत दी। पत्रकार अशोक चौधरी ने कहा कि ‘ ईदगाह ’ कहानी के बाद ‘ गोदान ’ ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने गरीब तबके के लिए संघर्ष करने को अपने जीवन का मिशन बना लिया। भाकपा माले के राजेश साहनी ने कर्मभूमि उपन्यास के सूरदास के पात्र को प्रभावित करने वाला बताते हुए कि आज भी विकास के नाम पर सूरदास विस्थापित हो रहा है और वही लड़ भी रहा है। कार्यक्रम में डॉ मुमताज़ खान , फूलबदन कुशवाहा, जय प्रकाश यादव, राधा आदि ने भी प्रेमचन्द की कहानियों के बारे में अपने अनुभव बयां किए। कार्यक्रम का संचालन प्रेमचन्द साहित्य संस्थान के सचिव मनोज कुमार सिंह ने किया।

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