Wednesday, February 1, 2023
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नेपाल के भाषा आयोग में मुस्लिम प्रतिनिधित्व न होना चिंताजनक- राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल

सगीर ए ख़ाकसार
वरिष्ठ पत्रकार
नेपाल का आधुनिक संविधान जिसका समावेशी के आकर्षक नारों और दावों के बीच अस्तित्व हुआ ‘और जिसने अल्पसंख्यकों में अपने अधिकार के संदर्भ में उम्मीद की एक ज्योति जलाई’ पर ज़मीनी स्तर पर अब तक वह अपना विश्वास हासिल करने में सफल नहीं हो सका है। उस का एक ताजा उदाहरण डॉक्टर लव देव अवस्थी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय भाषा आयोग का गठन है। जिस आयोग का उल्लेख संविधान की धारा 278 में है।
डॉक्टर अब्दुल गनी अलकूफ़ी अध्यक्ष राष्ट्रीय मदरसा संघ नेपाल ने इस विषय पर चर्चा करते हुए बताया कि संविधान की धारा 32 खंड एक और तीन में देश के सभी नागरिकों को उनकी भाषा ‘ संस्कृति और लिपि की स्वतंत्रता और उनकी सुरक्षा की गारंटी दी गई है। उस के हिसाब से होना तो यह चाहिए था कि राष्ट्रीय भाषा आयोग के गठन में मुस्लिम अल्पसंख्यक की मातृ भाषा और धार्मिक भाषा को भी शामिल किया जाता और उन्हें भी प्रतिनिधित्व दिया जाता मगर अब तक आयोग द्वारा उप समिति के लिए जिन लोगों के नाम की घोषणा हुई है उनमें एक भी मुस्लिम नाम नहीं है। जबकि मूल समिति जिसके सदस्यों की संख्या संविधान अनुसार चार है उनके नामों की घोषणा अब तक बाकी है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मदरसा संघ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कानून विशेषज्ञों से संपर्क करके उनसे इस मामले पर चर्चा की और उनके सामने अपनी चिंता जताई।
आगे की रणनीति पर प्रकाश डालते हुए संगठन के महासचिव मौलाना मशहूद खान नेपाली ने कहा कि राष्ट्रीय मदरसा संघ ने काफी विचार विमर्श के बाद निर्णय लिया है कि इस सिलसिले में प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड , संस्कृति पर्यटन तथा उड्डयन मंत्री जीवन बहादुर शाही ‘और राष्ट्रीय भाषा आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर लव देव अवस्थी और संबंधित अधिकारयों से भेंट करके उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया जायेगा। श्री मशहूद ने कहा कि मुस्लिम नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी अल्पसंख्यक समुदाय है। और उनकी मातृ भाषा उर्दू ‘और धार्मिक भाषा अरबी की अनदेखी करके देश विकास की राह पर आगे नहीं बढ़ सकता। जिस तरह पड़ोसी देश भारत ने उर्दू के लिए अच्छा खासा बजट आवंटित कर रखा है ‘और अरबी भाषा को भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और सरकारी परीक्षा में उसका एक स्थान दिया है’ ठीक उसी तरह नेपाल के मुसलमानों के साथ भी न्याय का मामला होना चाहिए  और भाषा आयोग में उन्हें उनका सही और वैध स्थान मिलना चाहिए।
राष्ट्रीय मदरसा संघ ने पिछली सरकार के कार्यकाल में भी संबंधित मंत्रालयों से इस सिलसिले में आमने-सामने बातचीत और पत्राचार भी किया था जो ऑन रिकॉर्ड है ‘लेकिन सरकार बदल जाने के कारण उनका अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सका। अतः संगठन ने इस विषय पर फिर से कार्रवाई करने और दोबारा सब से भेंट करने का निर्णय लिया ताकि इस बार इस मामले पर सरकार नए सिरे से गंभीर रूप में विचार विमर्श करके मुस्लिम अल्पसंख्यकों की चिंताओं और उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए कोई ठोस और प्रभावी उपाय करे।

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