Friday, December 9, 2022
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प्रो सदानंद शाही बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने

-प्रेमचंद साहित्य संस्थान, जन भोजपुरी मंच, बीएचयू में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के संस्थापक हैं प्रो शाही

-कुशीनगर जिले के रामकोला के पास सिंगहा गांव के निवासी हैं

-उदित नारायण डिग्री कालेज के छात्र संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं

गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए, पीएचडी की है

गोरखपुर, 23 मई। बीएचयू में हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर सदानंद शाही को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर विश्वविद्यालय, बिलासपुर का कुलपति बनाया गया है।

58 वर्षीय प्रो शाही कुशीनगर जिले के रामकोला के पास सिंगहा गांव के रहने वाले हैं और उन्होंने प्राम्भिक शिक्षा से लेकर स्नातक तक की शिक्षा कुशीनगर और एमए, पीएचडी गोरखपुर विश्वविद्यालय से की है।

प्रोफेसर शाही ने कुशीनगर, गोरखपुर और वाराणसी में कई साहित्यिक व शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने वर्ष 1991 में प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की तो 2010 में रामकोला के पास कुसम्हा में महिला महाविद्यालय की स्थापना की। बीएचयू में उन्होंने 2009 में भोजपुरी अध्ययन केंद्र की स्थापना की और उसके संस्थापक समन्वयक के रूप में अभी तक कार्य कर रहे थे। वर्ष 2014 में उन्होंने जन भोजपुरी मंच की स्थापना की और इसके जरिये भोजपुरी भाषा के विकास, उसको सम्मान दिलाने और संविधान की आठवीं अनसूची में शामिल कराने के लिए अभियान चलाया जो काफी चर्चा में रहा।

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सिंगहा गांव में पहली जुलाई 1958 को जन्में प्रो शाही ने हाई स्कूल तक की पढाई गांव में की। इंटरमीडिएट उन्होंने रामकोला से किया। इसके बाद उन्होंने 1981 में पडरौना के उदित नारायण डिग्री कालेज से बीए किया। वह यहाँ छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए। उन्होंने एमए और पीएचडी गोरखपुर विश्वविद्यालय से की । उन्हीने 1985 से 1988 तक यूजीसी के रिसर्च फेलो के रूप में ‘ अपभ्रंश के धार्मिक मुक्तक काव्य और हिंदी के संत काव्य का तुलनात्मक अध्ययन ‘ विषय पर शोध  किया। इसके बाद 1990 में गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर  हो गये। उन्होंने यहाँ 2001 तक अध्यापन कार्य किया। इसके बाद वह बीएचयू में प्रोफेसर हो गए।

उनकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनमें ये प्रमुख हैं- काव्य संग्रह ‘  असीम कुछ भी नहीं ‘ (1999), शोध पुस्तक-अपभ्रंश के धार्मिक मुक्तक और हिंदी संत काव्य (1991) , अनुवाद -फ्रैंक ई के लिखित ए हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचर (1986), दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद (2000), हरिऔध रचनावली, 10 खण्डों में (2010।

प्रो शाही ने कबीर, रैदास, पलटूदास और प्रेमचंद पर वृहद् लेखन किया है।

उन्होंने साखी, भोजपुरी जनपद, कर्मभूमि, दीक्षा नाम की पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।

वह साऊथ एशिया इंस्टिट्यूट हाईडेलबर्ग जर्मनी में फेलो रहे हैं और इटली के तूरिनो विश्वविद्यालय में व्याख्यान व कविता पाठ कर चुके हैं।

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