Thursday, February 9, 2023
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राप्ती नदी क्षेत्र की समस्याओं और संभावनाओं पर हुआ विचार मंथन

रोल्पा से गोरखपुर तक नदी यात्रा करने वाले विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताए अनुभव

गोरखपुर। राप्ती नदी के उद्गम रोल्पा से गोरखपुर तक की यात्रा करने वाले स्वंयसेवी संगठनों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज गोरखपुर में यात्रा के अनुभवों के साथ-साथ राप्ती नदी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की समस्याओं पर चर्चा की। चर्चा में यात्रा में शामिल रहे दोनों देशों के लोगों के अलावा गोरखपुर के सामाजिक कायकर्ताओं, विषय विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिक, किसान, पत्रकारों ने भाग लिया।

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गोरखपुर एनवायरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप द्वारा आयोजित ‘ राप्ती नदी क्षेत्रः समस्याएं एवं सम्भावनाएं नागरिक समाज स्तर पर सहयोग ’ विषय पर आयोजित संवाद में नेपाल और भारत के नदी और बाढ़ क्षेत्र पर कार्य करने वाले विशेषज्ञों ने कहा कि प्राचीन काल से ही राप्ती एवं इसकी सहायक नदियां, पूर्वांचल की आजीविका, संस्कृति व विकास का अभिन्न अंग रही है। नदी का उद्गम नेपाल के कई जल स्त्रोतों के समागम से हुआ है और यह नदी नेपाल एवं पूर्वांचल के कई जिलों से प्रवाहित होकर घाघरा में समाहित हो जाती है।

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गोरखपुर एनवायरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डा0 शीराज़ वजीह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत एवं नेपाल की सीमा के दोनों तरफ इस नदी क्षेत्र में रहने वाले लोगों – विशेषतः गरीब लोगों का जीवन व आजीविका नदी से जुड़ी हुई है। पिछले कुछ दशकों में नेपाल व भारत क्षेत्र में पारिस्थितिकी एवं विकास में आये बदलावों के कारण इस नदी क्षेत्र में बाढ़ एवं जल जमाव के प्रकोप बढ़े हैं तथा सैकड़ों लोग बाढ़ की विभीषिका झेलने को मजबूर हैं। सिंचाई, ऊर्जा, बाढ़ से बचाव आदि के प्रयासों/ कार्यकलापों ने नदी की पारिस्थितिकी को और भी अधिक प्रभावित किया है। क्षेत्र में बसे बहुसंख्यक लघु-सीमान्त किसानों ने अपने प्रयासों व प्रयोगधर्मिता से इन समस्याओं के सार्थक समाधान भी खोजे हैं जो जमीनी स्तर पर कारगर रहे हैं और सरकारी प्रयासों को भी सशक्त किया है।

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नेपाल के पूर्व जलस्रोत मंत्री एवं नेपाल वाटर कंर्जवेशन फाउण्डेशन के अध्यक्ष दीपक ज्ञावली ने कहा कि नदी का स्वास्थ्य व इसके रख-रखाव के प्रयास भारत व नेपाल दोनों देशों की तरफ किये जाने जरूरी हैं अन्यथा नदी पर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से निर्भर लोगों की समस्याएं और अधिक जटिल होती जायेंगी। इस दिशा में सरकारी प्रयासों के साथ-साथ क्षेत्र के नागरिक समाज का सहयोग सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

नेपाल सरकार के पूर्व सचिव डा0 द्वारिका नाथ ढुगेल ने बाढ़ की विभीषिका से होने वाले नुकसान को हर हाल में कम करने और बाढ़ के बाद उत्पन्न कठिनाईओं को जनसहयोग के माध्यम से दूर किये जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि छोट-छोटे समूह बना कर उनकी भागीदरी सुनिश्चित किया जाना भी आवश्यक है।

परिचर्चा में मदन मोहन मालवीय प्राद्योगिकी विश्वविद्यालय के डा0 गोविन्द पाण्डेय ने राप्ती क्षेत्र के जल की गुणवत्ता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में और अधिक शोध की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि नदियों में हो रही गंदगी और प्रदूषण के कारण विभिन्न प्रकार की दिक्कतों के निराकरण के लिए स्थानीय स्तर पर अधिक सर्तक रहने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ चिकित्सक डा0 आर0एन0सिंह ने जलजनित बीमारियों पर चर्चा करते हुए कहा कि राप्ती बेसिन और उससे जुड़े आबादी वाले क्षेत्र में जलजनित बीमारियों का प्रसार हो रहा है वह अति चिन्तनीय है।

नेपाल से आये नीति फाउण्डेशन के सौमित्रा न्यौपाने ने राप्ती नदी के जल संग्रहण वाले क्षेत्रों और जल प्रवाह पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत और नेपाल में विद्युत और ऊर्जा, पर्यावरण, खेती किसानी, पशुपालन जैसे कार्यो में नसैगर्गिक समानता है और इनके निराकरण के तरीके एक जैसे है। उन्होंने जल, बिजली और सौर ऊर्जा के प्रयोग की चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में सौर ऊर्जा से सिंचाई द्वारा जलदोहन से जो बड़ी समस्या उत्पन्न होगी जिससे भूजल स्तर में तेजी से गिरावट होगी।

वहीं प्रतिभागियों ने बाढ़ से पूर्व नेपाल से आने वाले पानी की सूचना और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को बाढ़ के खतरों से बचने के लिए अपने सुझाव देते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षो में आयी जागरूकता के कारण जन धन हानि को रोकने में काफी हद तक सफलता मिली है। वक्ताओं ने बाढ के समय की जाने वाली खेती में एैसी प्रजातिओं की फसलों को बोने की आवश्यकता बतायी जिससे किसान को होने वाली हानि कम हो सकेगी।

महाराजगंज, कुशीनगर, गोरखपुर और सिद्धार्थनगर से आये किसानों ने बाढ़ से उत्पन्न स्थितिओं का सामना करने के लिए उनके द्वारा नवाचारों के अनुभव प्रस्तुत करते हुए कहा कि पारम्परिक ज्ञान और तकनीकी प्रयोगों से प्रतिवर्ष बाढ़ से होने वाले खेती किसानी के आर्थिक नुकसान को बचाया जा सकता है।

परिचर्चा में नेपाल के गोविन्द शर्मा पोखरियाल, निर्जन राय, प्रेरण कुवर, राजेश्वरी, विनोद, अरूणिमा राणा और मुन्नी प्रधान के अतिरिक्त गौतम गुप्ता, राजन राय, मनोज सिंह, डा0 विजय सिंह, के0के0सिंह, टी0पी0शाही, जे0के0श्रीवास्तव, रवीन्द्र जैन, डा0एस0एस0वर्मा, डा0वीरेन्द्र श्रीवास्तव, विजय पाण्डेय, डा0 मुमताज खान, डा0सुधाकर पाण्डेय, पी0के0लाहिड़ी, अनिल गुप्ता, एम0पी0कंडोई आदि ने अपने विचार व्यक्त किये।

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