साहित्य - संस्कृति

सिनेमा के ज़रिये दुनिया की विविधता की खोज

उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर में बच्चों के लिए ‘ प्रतिरोध का सिनेमा ’ ने आयोजित किया मिनी फ़िल्म फेस्टिवल 

28 नवम्बर 2016 को राजकीय बालिका इन्टर कॉलेज में ‘ प्रतिरोध का सिनेमा ’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने बच्चों के लिए एक दिवसीय मिनी फ़िल्म फेस्टिवल का आयोजन किया| आयोजन दो सत्रों में हुआ जिसमें पहले सत्र में कक्षा 6 से 9 तथा दूसरे सत्र में कक्षा 10 से 12 तक के बच्चों को फ़िल्में दिखाई गईं |
सत्र की शुरुआत नॉर्मन मेक्लेरेन की लघु फ़िल्म ‘द चेयरी टेल’ से हुई, जो एनीमेशन के माध्यम से रची दृश्यों और ध्वनियों की एक ऐसी अद्भुत रचना है जो सत्ता के संबंध को बहुस्तरीय तरीके से पेश करती है| संजय जोशी ने इस फ़िल्म के माध्यम से सरल भाषा में बच्चों को सिनेमा में दृश्य और ध्वनि संयोजन के महत्व को समझाया | एक फूल के लिए लड़ रहे दो पड़ोसियों की कहानी ‘नेबर’ में जब पड़ोसियों की जगह दो राष्ट्रों को रख के देखते हैं तो फ़िल्म व्यापक फ़लक पर बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है| गीतांजलि राव की लघु एनीमेशन ‘ प्रिंटेड रेनबो ’ यथार्थ और स्वप्न की कहानी है जिसे एक प्रौढ़ा और उसकी बिल्ली की कहानी के ज़रिये कहा गया है| दोस्ती की निरंतरता की कहानी कहती हुई फ़िल्म ‘ रेड बलून ’ बच्चों को बेहद पसंद आई | झारखंडी समाज से बच्चों को रूबरू कराती फ़िल्म ‘ गाड़ी लोहरदगा मेल ’ न सिर्फ लोहरदगा से रांची के बीच चलने वाली मीटर गेज़ ट्रेन की कहानी है, बल्कि वहां के जल, जंगल, ज़मीन से जुड़े सवालों और झारखंडी अस्मिता और संघर्ष का भी पता देती है |

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‘ सुपर मैन ऑफ़ मालेगांव ’ महाराष्ट्र के मालेगांव शहर के लोगों के सिनेमा प्रेम के बारे में है, जिससे बच्चे हँसी-हँसी में वहाँ के समाज से परिचित होते हैं | प्रतिरोध के गीत ‘ गाँव छोड़ब नाहीं ’ से बच्चे जबर्दस्त तरीके से कनेक्ट हुए |
फ़िल्में देखते दिखाते संजय जोशी ने छात्रों के साथ-साथ अध्यापकों से भी सीधे संवाद स्थापित किया | वे बच्चों को बम्बइया मनोरंजक सिनेमा के अलावा एक नए तरह के सिनेमा की दुनिया में ले गए जो सूचना, ज्ञान-विज्ञान, जैव विविधता, सांस्कृतिक विविधता, अस्मिता और संघर्ष की विविध सतरंगी दुनिया है| उन्होंने अध्यापकों को अपने पठन-पाठन में इस तरह की फिल्मों को शामिल करने को प्रेरित किया |

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सिनेमा सत्र के बाद की अनौपचारिक बातचीत में बच्चों ने बहुत उत्साहपूर्वक भाग लिया, दिखाई गई फिल्मों के बारे में अपनी राय व्यक्त की और सवाल किए | विद्यालय की छात्रा आफ़रीन ने अपनी सहपाठियों सबा, सना, नेहा, सविता आदि के साथ ‘ गाँव छोड़ब नाहीं ’ गाकर सुनाया |
रुकैया , फ़िरदौस , ख़ुशबू , दीपमाला , हुश्ना , शबीना आदि छात्राओं ने फिल्मों पर अपनी राय व्यक्त की | दो पड़ोसियों के झगड़े के अन्तराष्ट्रीय सन्दर्भ, एक छात्र की एक गुब्बारे से दोस्ती की कहानी, सफाई कर्मचारियों की स्वास्थ्य चिंताओं से लेकर सूक्ष्म जीवों की दुनिया ने इन छात्राओं प्रभावित किया, जिसे इन लड़कियों ने विद्यालय प्राचार्य रूचि दीक्षित से साझा किया | विद्यालय प्राचार्य रूचि दीक्षित ने ‘ प्रतिरोध का सिनेमा ’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी से बातचीत में बताया कि जगदीशपुर में इस तरह का यह पहला आयोजन है और आगे भी इस तरह के आयोजन की श्रृंखला को आगे बढ़ाया जाएगा |

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