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मियां साहब इमामबाड़ा स्टेट : पुरानी इमारत की छत हुई नई, दरो दीवार, खिड़की, दरवाजों की मरम्मत भी

पर्यटन विभाग ने नहीं की मदद,  अवध के स्थापत्य कला की निशानी है इमामबाड़ा

गोरखपुर। मियां बाजार स्थित मियां साहब इमामबाड़ा स्टेट की ऐतिहासिक पुरानी इमारत नई हो रही है लेकिन डिजाइन पुरानी है। इमारत के पूर्वी गेट या मुख्य द्वार की छत दरकने से नवतामींर की नौबत आयीं। नई छत बनकर तैयार है। तीन माह से तामीरी काम जारी है और अब अंतिम चरण में है।

इमामबाड़ा का पश्चिमी गेट, दक्षिणी गेट, मर्सिया खाना, मस्जिद, धूनी की इमारत कुछ वर्षों पहले दुरुस्त करा ली गयी थीं। इमामबाड़ा स्टेट के प्रशासनिक अधिकारी जुल्फेकार अहमद ने बताया कि पूर्वी गेट की छत डैमेज हो गयी तो छत की नवतामींर करायी गयी और पूरी इमारत की मरम्मत भी की गई। तामींर में इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है इमामबाड़ा की पुरानी डिजाइन बरकरार रहे। यहां तक कि खिड़की, दरवाजों के डिजाइन से भी छेड़छाड़ नहीं की गईं है।

इमामबाड़ा में लगी लकड़ी आज भी अच्छी हालत में थी। उसे ही रंग रोगन कर इस्तेमाल किया गया है। करीब दस लाख रुपये की लागत आयी है। सूर्खी चूने व लखौरी ईटों से बने पूर्वी गेट या मुख्य द्वार की छत अब सीमेंट, कंक्रीट व पक्की ईटों से नई हो चुकी है। उन्होंने बताया कि करीब साल भर पूर्व पर्यटन विभाग की एक टीम इमामबाड़ा में आयी थी और इसे पर्यटन के रुप में विकसित करने की योजना बनायी थी, लेकिन योजना आज तक परवान नहीं चढ़ी।

यह इमामबाड़ा सामाजिक एकता व अकीदत का मरकज है। इमामबाड़े के दरों दीवार व सोने-चांदी की ताजिया में अवध स्थापत्य कला व कारीगरी रची बसी नजर आती है। इमामबाड़ा के पश्चिमी गेट पर अवध का राजशाही चिन्ह भी बना हुअा है। करीब तीन सौ सालों से हजरत सैयद रौशन अली शाह द्वारा जलायी धूनी आज भी जल रही है।

ऐतिहासिक तथ्य

मियां साहब इमामबाड़ा स्टेट के संस्थापक हजरत सैयद  रौशन अली शाह ने सन् 1717 ई. में इमामबाड़ा तामीर किया। विकीपीडिया में भी इमामबाड़ा  की स्थापना तारीख 1717 ई. दर्ज है। वहीं ‘मसाएख-ए-गोरखपुर’ किताब में इमामबाड़ा की तारीख सन् 1780 ई. दर्ज है। इसी समय मस्जिद व ईदगाह भी बनीं।

सूफी संत सैयद रौशन अली शाह बुखारा के रहने वाले थे। वह मोहम्मद शाह के शासनकाल में बुखारा से दिल्ली आये। इतिहासकार डा. दानपाल सिंह की किताब गोरखपुर-परिक्षेत्र का इतिहास (1200-1857 ई. ) खण्ड प्रथम में गोरखपुर और मियां साहब नाम से पेज 65 पर है कि यह एक धार्मिक मठ है जो गुरु परम्परा से चलता है।

दिल्ली पर अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय इस परम्परा के सैयद गुलाम अशरफ पूरब (गोरखपुर) चले आये और बांसगांव तहसील के धुरियापार में ठहरे। वहां पर उन्होंने गोरखपुर के मुसलमान चकलेदार की सहायता से शाहपुर गांव बसाया। इनके पुत्र सैयद रौशन अली अली शाह की इच्छा इमामबाड़ा बनाने की थी। गोरखपुर में उन्हें अपने नाना से दाऊद-चक नामक मोहल्ला विरासत में मिला था। उन्होंने यहां इमामबाड़ा बनवाया। जिस वजह से इस जगह का नाम दाऊद-चक से बदलकर इमामगंज हो गया। मियां साहब की ख्याति की वजह से इसको मियां बाजार के नाम से जाना जाने लगा।

उस समय अवध के नवाब आसफ-उद्दौला थे। जिन्होंने दस हजार रुपया इमामबाड़ा की विस्तृत तामीर के लिए हजरत सैयद रौशन अली शाह को दिया। हजरत रौशन अली शाह की इच्छानुसार नवाब आसफ-उद्दौल ने छह एकड़ के इस भू-भाग पर हजरत इमाम हुसैन की याद में मरकजी इमामबाड़े की तामीर करवाईं। करीब 12 साल तक तामीरी काम चलता रहा। जो 1796 ई. में मुकम्मल हुआ। अवध के नवाब आसफ-उद्दौला की बेगम ने सोने-चांदी की ताजिया यहां भेजीं। जब अवध के नवाब ने गोरखपुर को अंग्रेजों को दे दिया तब अंग्रेजों ने भी इनकी माफी जागीर को स्वीकृत कर दिया। इसके अतिरिक्त कई गुना बड़ी जागीर दी।

इमामबाड़ा पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में गोरखपुर की शान बन सकता है बशर्तें कि इसे करीने से संवारा जाए।

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