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कुल शरीफ की रस्म अदा कर लगाया पौधा, बांटा लंगर

गोरखपुर। शहर में आला हज़रत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमां का 101वां उर्स-ए-पाक मनाने का सिलसिला जारी है। शुक्रवार को नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर, मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजाने मुबारक खां शहीद नार्मल, मदीना मस्जिद रेती चौक, बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर में उर्स-ए-आला हज़रत अकीदत के साथ मनाया गया। कुरआन ख्वानी व फातिहा ख्वानी की गई। तंजीम कारवाने अहले सुन्नत ने आला हज़रत की याद में गौसिया मस्जिद छोटे काजीपुर के पास पौधारोपण किया।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में सुबह फज्र की नमाज के बाद कुरआन ख्वानी हुई। जुमा की नमाज के बाद कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। सलातो सलाम पढ़कर दुआ मांगी गई। इसके बाद अकीदतमंदों में लंगर बांटा गया। कुल शरीफ से पहले तकरीरी प्रोग्राम हुआ। जिसमें मस्जिद के इमाम मौलाना मो. असलम रज़वी ने कहा कि आला हज़रत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमां बहुत बड़े मुजद्दिद, मुहद्दिस, मुफ्ती, आलिम, हाफिज़, लेखक, शायर, भाषाविद्, युग प्रवर्तक तथा समाज सुधारक थे। सिर्फ 13 साल की कम उम्र में मुफ्ती बने। दीन-ए-इस्लाम, साइंस, अर्थव्यवस्था और कई विषयों पर एक हजार से ज्यादा किताबें लिखीं। आला हज़रत को पचपन से ज्यादा विषयों पर महारत हासिल थी। उनका एक प्रमुख ग्रंथ ‘फतावा रजविया’ इस सदी के इस्लामी कानून का अच्छा उदाहरण है। उर्दू जुबान में कुरआन का तर्जुमा ‘कंजुल ईमान’ विश्वविख्यात है। उलेमा-ए-अरब व अज़म सबने आप की इल्मी लियाकत का लोहा माना। आला हज़रत चौदहवीं सदी हिज़री के मुजद्दिद हैं। जिन्हें उस समय के प्रसिद्ध अरब व अज़म के विद्वानों ने यह उपाधि दी।

मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजाने मुबारक खां शहीद नार्मल में तिलावत व नात शरीफ के बाद मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही व कारी शराफत हुसैन ने आला हज़रत की शख्सियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि आला हज़रत ने तेरह साल की उम्र से ही फतवा लिखना और लोगों को दीन-ए-इस्लाम का सही पैगाम पहुंचाना शुरू कर दिया। पूरी उम्र दीन की खिदमत में गुजारी। रसूल-ए-पाक अलैहिस्सलाम से सच्ची मोहब्बत आपका सबसे अज़ीम सरमाया था। आपकी एक मशहूर किताब जिसका नाम ‘अद्दौलतुल मक्किया’ है। जिसको आपने केवल आठ घंटों में बिना किसी संदर्भ ग्रंथ के मदद से हरम-ए-मक्का में लिखा। आला हजरत दीन-ए-इस्लाम, विज्ञान, अर्थव्यवस्था, गणित, जीव विज्ञान, भूगोल, दर्शनशास्त्र, शायरी, चिकित्सा, रासायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान सहित 55 से अधिक विषयों के विशेषज्ञ थे।

बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर में कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि आज पूरी दुनिया में आला हज़रत का चर्चा है। आला हज़रत ने हिंद उपमहाद्वीप के मुसलमानों के दिलों में अल्लाह और रसूल-ए-पाक हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के प्रति प्रेम भर कर रसूल-ए-पाक की सुन्नतों को जिंदा किया। आप सच्चे समाज सुधारक थे। आला हज़रत द्वारा किया गया कुरआन पाक का उर्दू में तर्जुमा ‘कंजुल ईमान’ व ‘फतावा रजविया’ बेमिसाल है। आप मुल्क से बहुत मोहब्बत करते थे। जंगे आजादी में आपने और आपके पूरे खानदान ने महती भूमिका निभाई।

मदीना मस्जिद रेती चौक में मौलाना अब्दुल्लाह बरकाती ने कहा कि आला हज़रत को अल्लाह व रसूल-ए-पाक हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और गहरा इश्क था। जिसको आपने ‘हदाइके बख्शिश’ में नातो मनकब के जरिए बयान किया है। आपने विभिन्न विषयों पर एक हजार से ज्यादा किताबें लिखीं।

उर्स में शाबान अहमद, मनोव्वर अहमद, उमर कादरी, कारी नियाज, अलाउद्दीन निज़ामी, नूर मोहम्मद दानिश, कारी अंसारुल हक, फैसल, शाकिर अली, इं. सेराज अहमद, अब्बास अली, मिनहाज अली सिद्दीकी, कारी महबूब रज़ा, मो. शहजादे, अशरद खान, नबी अहमद, अशरफ निज़ामी, अब्दुल अजीज, अशरफ रज़ा, नबी शेर, आतिफ रज़ा, गुलाम वारिस, गुलाम गौस, अलाउद्दीन, मो. आशिक खान, सदरे आलम, असद रज़ा, शहाबुद्दीन, अशरफ रज़ा, ताहिर रज़ा, नूर आलम, हाजी मो. फैज अली, सैयद शाहिद शम्सी, परवेज खान, हाजी अख्तर हुसैन, मो. कलीम अशरफ, शहबाज चिश्ती, शुएब अहमद सहित तमाम अकीदतमंद शामिल रहे।

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