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गोरखपुर के 121 उलेमा ने सीएए के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट को लिखा खत

गोरखपुर। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) व राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर जिले के उलेमा (मुस्लिम धर्मगुरुओं) बेचैन हैं। चिंता के माहौल में शहर के 121 उलेमा ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे को खत लिख कर सीएए व एनपीआर पर रोक लगाने की गुहार लगाई है।

खत लिखने वालों में शहर की मस्जिद के इमाम, मोअज्जिन, कारी, हाफिज, मौलाना, मुफ्ती व मदरसा शिक्षक शामिल हैं। खत पर हस्ताक्षर करने का सिलसिला 19 से 24 फरवरी तक चला। मंगलवार को खत स्पीड पोस्ट के जरिए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया।

उलेमा ने खत के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा है कि नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) धर्म के आधार पर बनाया गया है। सीएए भारतीय संविधान की प्रस्तावना के विरुद्ध है। सीएए के पारित होने से विभिन्न धर्म एवं जाति के मध्य नफरत का माहौल पैदा हो रहा है। जो कि देश के विकास में बाधक है। वहीं एनपीआर और एनआरसी भी जनता के खिलाफ व घातक है। देश के कई राज्यों ने सीएए, एनपीआर व एनआरसी का विरोध करते हुए प्रस्ताव पास किया है। देश में जगह-जगह सीएए, एनआरसी व एनपीआर के विरोध में प्रदर्शनों का दौर जारी है। जनता दो माह से भी अधिक समय से सड़कों पर है। जनता की भावना की कद्र करते हुए सीएए, एनपीआर पर तत्काल रोक लगाई जाए। एनआरसी लागू ना करने का आदेश सरकार को दिया जाए। धर्म के नाम पर कानून नहीं बनना चाहिए। सीएए के जरिए समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है। सरकार ने इस कानून को पास करके देशवासियों में भय का माहौल पैदा किया है। देशवासी धर्म के आधार पर लागू होने वाले सीएए का सख्त विरोध कर रहे हैं। मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश की जा रही है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां पर सबको धार्मिक आजादी मिली हुई है, इसलिए सीएए पर रोक लगाकर भारतीय जनता की चिंता व परेशानी को दूर किया जाए। नागरिकता धर्म के आधार पर नहीं संविधान के अनुसार मिलनी चाहिए।

उलेमा ने कहा कि सीएए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 ,15 का उल्लंघन है। सीएए में एक खास धर्म के लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। अनुच्छेद 14  ‘समानता का अधिकार’ के तहत साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समता से या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। अनुच्छेद 15 में कहा गया है, ‘राज्य किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा।’ सीएए संविधान की आत्मा के खिलाफ है। सीएए, एनपीआर व एनआरसी को किसी भी रुप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

खत लिखने में वालों में खुर्शीद निज़ामी, कुतबुद्दीन, तनवीर अहमद, जाहिद, अजीम अहमद, मो. ताहिर, जमील अख्तर, जावेद अहमद, मो. निजामुद्दीन, जहांगीर अहमद, मो. असलम, मो. अफजल, मोहम्मद अहमद, मो. शाबान, रहमत अली, महमूद, अली अहमद, रज्जब अली, अंसारुल हक, मो. सद्दाम, रेयाज अहमद, मो. शमीम, फिरोज अहमद, शराफत, गुलाम खैरुलवरा, मो. मोहसिन, मकसूद, अब्दुल खालिक, आमिर हुसैन, हकीकुल्लाह, हुसैन आलम, नूर मोहम्मद, हिदायतुल्लाह, मो. हदीस, कलीमुल्लाह आदि शामिल हैं।

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