विचार

सोशल डिस्टेंसिंग, सेल्फ क्वारंटाइन और गांव की बात

इस बार गांव लौटा तो पूरे 41 साल पहले होश संभालने वाली उम्र में लौट गया। कोई 6-7 बरस की उम्र का बचपन। तब दुनिया ग्लोबल नहीं हुई थी। गांव की अपनी दुनिया थी। पूरी तरह सेल्फ क्वारंटाइन और सोशल डिस्टेंस भी। ओह, इस बार ग्लोबल होते गांव में बिल्कुल यही होने की तैयारी।

तब संचार माध्यमों का प्रसार हाथों हाथ नहीं बल्कि गांव-गांव नहीं था। अखबार तो बहुत बड़ी चीज थी। हां, गांव में इक्का दुक्का रेडियो थे। यही एक सशक्त माध्यम था। घर में चाचा जी का नेशनल पैनासोनिक वाला रेडियो था। ऊपर से सुबह शाम बबीसी सुनने के लिए लोगों की बैठकी।

शायद 1979-80 का साल था। सप्ताह भर से एक खबर की दहशत भरी चर्चा थी। फलां दिन स्काइलैब गिरेगा, कोई नहीं बचेगा। सन्नाटे और भय के बीच वह दिन कल के करीब आ गया। कल क्या होगा ? कोई नहीं बचेगा ? ऐसे खौफ के मंजर में तब सिस्टम क्या कर रहा था नहीं पता, जैसे अब नहीं पता। बस, हारे को हरि नाम।

घर-घर भजन-कीर्तन, गांव के शिवाला पर अंखड हरिकीर्तन। शोरगुल, प्रार्थना और विलाप ने आखिरी भयानक रात को भी गुजार दिया। सुबह हुई, दोपहर में अखंड हरिकीर्तन का समापन हुआ। शाम हुई, कुछ नहीं हुआ। बीबीसी ने बताया स्काइलैब हिंदमहासागर में गिरा। सभी बच गए।

स्काइलैब क्या था, क्यों गिरा ? ऐसे बहुत से आम सवाल आम चर्चा के हिस्से नहीं बनते। बने भी कैसे ? बस, संकट का दौर गुजर गया या गुजर जाते हैं। कार्य-कारण या घटनाओं की आम कनेक्टिविटी आम नहीं होती। यह खास बना दी जाती है। और खास इसे ‘ होइहैं वही जो रामरचि राखा…’ जैसी स्थिति में रखना चाहता है।

अब 2020 है। सबकुछ ग्लोबल है। हाथों हाथ सशक्त संचार माध्यम हैं। गांव में घर-घर दृश्य-श्रव्य सूचनाओं की भरमार है। टीवी डिबेट और न्यूज रूम के ज्ञान बम घर-घर के दिमाग में फटे पड़े हैं। पड़ोसी देशों को तो ध्वस्त कर चुके हैं, अब घर के पड़ोसी पर धमक बनाने के काम आ रहे हैं।

यहां ऊपर से नीचे पड़ोसी का परसेप्शन बिल्कुल क्लीयर है। कहीं देशभक्ति के नाम पर तो कहीं जाति, धर्म और नस्ल के नाम पर। पुरानी जेनरेशन तो प्राचीनता से ओतप्रोत है ही। नई जेनरेशन जिसका रहन-सहन, फैशन-स्टाइल तो लगभग ग्लोबल है, पर खुमार पूरा नेशनल है। बात-बात में देशभक्त और गद्दार वाली फीलिंग है।

एप्पल, वीवो, ओप्पो की ज्ञान तकनीकी में रफाले का धौंस है। कमाल, सिर पे भूत सवार कि हमीं तो दुनिया के बॉस हैं। महाकाव्य और गाथाकाल के कथानकों से इस कदर मदहोश हैं कि पड़ोस में ही मध्ययुगीन गजनी, गोरी, बाबर व औरंगजेब की तलाश है।

घर-गृहस्थी, बेकारी अबूझ है पर पड़ोसी और पड़ोसी मुल्क की कंगाली का पूरा हिसाब है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर मुद्दे-मसले पर आपस में ही भिड़े हैं। इधर वुहान से इटली, स्पेन का रिकॉर्ड सबके दिमाग में दर्ज है।

यहां मिसाइल से वायरस तक घर-घर रिसर्च जारी है। बस चले तो कोरोना फैलाने वाले देश को गांव से ही उड़ा दे। फिलहाल बस तो घर के पड़ोसी पर चल रहा है। उसी को लेकर सारी सतर्कता और जागरूकता है। जहां दहशत और भय में नफरत ही फैल रहा है। बस, इंसान और इंसानियत सेल्फ आइसोलेशन में हैं।

मैं भी छोटे शहर में जीवन-यापन की जुगाड़ में थक चुका था। 16 मार्च को महानगर प्रस्थान का टिकट कन्फर्म था। 17 मार्च को गांव आ गया। कोई गाना है न- जाना था चीन पहुंच गए जापान…। गांव की गृहस्थी तो बिखरी ही थी। अब 22 मार्च को जनता कर्फ्यू। हालत खराब थी।

अंदाजा लग गया मामला लंबा खिचेगा। फिर भी शहर की अनिश्चितता से गांव पर गेहूं चावल की डेहरी (ड्रम) के बगल में सोना सुकूनदायक लगा। संचार माध्यमों के इस ज्ञान बम और खास सतर्कता वाले माहौल में मन असहज था। उधर गांव में बड़े और बच्चों को मास्क बांधे देख सम्यक बाबू (बेटे) का मेरी तैयारी पर सवाल उठाना और व्यग्र कर दिया।

दहशत और भय के महौल में 22 मार्च को पीएम के 8 पीएम से कुछ उम्मीद का सुरूर चढ़ा। गांव में लोगों ने जमकर थाली बजाई। घर की लक्ष्मण रेखा तोड़ शिवाला में घंटा भी बजाया। मानो एक दिन की बात है सब निपट जाएगा। पर अगले 8 पीएम पर 21 दिन के लाकडाउन ने इस उम्मीद के सुरूर को भी उतार दिया।

अब इतना तो तय हो गया व्यवस्था या सिस्टम से कोई सवाल नहीं है। सवाल तो नियति का है। नियति ने जिसको जो दिया है उसी में सबकी अपनी-अपनी व्यवस्था है। कहीं फुरसत में घर की रंगाई पुताई है तो कोई खेत में सब्जी की निराई गुड़ाई में व्यस्त है। कोई सब्जी का ठेला लगा लिया तो कोई अब भी रोज के दिहाड़ी की खोज में है।

सबकी संतुष्टि यही है कि यही ऊपर वाले की व्यवस्था है। इस संकट और आपदा की स्थिति में भी। मेरा पड़ोस दलित टोला है। सुबह की पारिवारिक चर्चा में कुछ युवक बता रहे थे- कोरोना संक्रमण लाइलाज है, इटली जैसा संपन्न देश फेल कर गया। किसी ने कहा- तब बताओ, सरकार बेचारा क्या करे? ट्रेन, जहाज तो सब बंद कर दिया। अब ई ससुरे बीमारी ले के भाग रहे हैं, तब ऊ का करे। (गाली के साथ) ये गांव आकर महामारी फैलाएंगे, सबको मारेंगे।

शाम में उन्हीं में से दो युवक इशारे से मुझे बुलाने लगे। वह बेहद घबराए हुए थे। कुछ कह रहे थे लेकिन मुंह पर मास्क था। नजदीक जाने पर इतना ही बोल पा रहे थे- बगल में भी आ गया, यहां भी आ गया! मैंने तसल्ली देते हुए पूछा- क्या हुआ?  फिर उन्होंने बताया- बगल के घर में बाहर से फलाने का लड़का आ गया है, बीमार है। जरूर कोरोना ही है, घर वाले छिपा लिए हैं। कुछ करिए !

हम लोगों ने दरवाजे के सामने लगा इंडिया मार्का नल उखाड़के घर में रख दिया- उन्होंने यह भी बताया। मैं तो आवाक ! यह तो दहशत का मंजर है। कुछ भी हो सकता है- नफरत, लड़ाई-झगड़ा कुछ भी। मैंने कहा- भाई आपात स्थिति में मूलभूत सुविधाएं नहीं रोकी जा सकतीं। पानी तो टोले भर की जरूरत है। पहले नल लगाओ। खैर, वह मान भी गए।

अब उनसे कुछ कहने का भी मौका मिल गया। मैंने कहा- सरकार बेचारा नहीं है, उसके पास पूरा सिस्टम है। गांव में प्रधान, सचिव, चौकीदार, आशा, एएनएम, आंगनबाड़ी से लेकर स्कूल, पंचायत भवन, विकास भवन का पूरा नेटवर्क है। आखिर इनको कुछ करना चाहिए?

दूसरे दिन की सुबह एक बुजुर्ग महिला को अपने घर के पास से गुजरते देख उस युवक ने डपट दिया जिसके घर में एक बीमार बुजुर्ग की वह खास तीमारदार थी। कारण यह कि उसका महिला का पड़ोसी बाहर से आया था। बुजुर्ग महिला इस व्यवहार से आहत थी।

शाम को एक अलग घटना से रूबरू हुआ। पास के कस्बे में राशन लेने पहुंचा। दुकानदार ने बताया- सुबह ही बेटा हैदराबाद से आया है, लोग आफत मचाए हैं, मानो मैं अछूत हूं। मैंने पूछा- जांच नहीं हुआ? बोले- नहीं, आज मैं ही भेजूंगा। कहां है इस समय? यह पूछने पर उन्होंने तपाक से कहा- सामने दुकान में बैठा है। अब मैं भी सहम गया, उनसे कहा- नहीं यह ठीक नहीं है। इसका जांच करवा कर घर पर रखिए।

जनता कर्फ्यू और लाकडाउन के चार-पांच दिनों तक अफरातफरी का आलम यही रहा। क्योंकि तब तक बाहर से चल चुके लोग गांव और आस-पास के कस्बों में दो-चार की संख्या में पहुंच चुके थे। वाकई, गांव स्तर पर सिस्टम की कोई खास सक्रियता नहीं दिखी। कोई हफ्ता भर बाद नालियों के किनारे ब्लीचिंग या चूने का छिड़काव दिखा।

इधर नये बाहरियों को स्कूल में रखने की व्यवस्था भी शुरू हो गई। पास में कस्बे के मास्टर जी ने बताया कि उनके स्कूल में रखे गए बाहरी रात में फरार हो गए। गांव में डर-भय, शक-सुबहा और अफवाह का बाजार गर्म है। कानाफूसी यही है- फलां के घर कोई आया है, यहां छुपा है, वहां छुपा है, पलिस को बताना चाहिए।

इधर जमात और मरकज की चर्चा है। दूध वाले यादव जी बता रहे थे- सरकार ने तो कंट्रोल कर लिया था ‘इन्होंने’ ने सब खेल खराब कर दिया। एक सुबह गांव में सब्जी लेकर कोई गाड़ीवाला आता है। सस्ती सब्जी दे रहा था। प्याज सिर्फ़ 22 रुपए किलो। घर से बाहर निकला, किसी ने कहा- हां आया है, लेकिन दाढ़ी वाले से कुछ लेने में डर लग रहा है। सामने से गुजर रहे 12 साल के बच्चे ने कहा- चाचा उहां सब्जी न लीहा। मैंने पूछा- क्यों? उसने कहा- ऊ त कटुआ है।

गांव में पछुआ चल रहा है। खेत में गेहूं की फसल पीली हो रही है। बालियां खनखनाने लगी हैं। पिछले कुछ सालों से इस समय अगलगी आम और भयावह होती है। जान-माल की भी तबाही हुई है।लोगों का बसाव खेत-खलिहान तक हो चुका है। एहतियातन दिन में बिजली कट होती है। बहुतों का दरवाजा सहन (बालकनी) खेत में ही खुलता है।

ऐसे में मोमबत्ती और दीया जलाने की पीएम की अपील समझ के परे है। घंटा और थरिया बजाते-बजाते लोग लक्ष्मण रेखा लांघ गए थे। ऐसे में डर लाजिमी है

मन तो विचलित है। ये भी मन की ही बात है। गांव तो पहले से ही क्वारंटाइन है। अब औपचारिक रूप से क्वारंटाइन रहेगा, जाने कब तक? गांव में पढ़े-लिखे युवाओं की भरमार है। उन पर मीडिया ज्ञान का ही भूत सवार है। सतर्कता इतनी भर कि डर, भय में सिर्फ जाति, धर्म, संपन्नता और विपन्नता में सनी नफरत की सोशल डिस्टेंसिंग है।

संकट, आपदाएं आती रही हैं आती रहेंगी। प्रकृति परिवर्तनशील है। इंसान इससे लड़कर आगे बढ़ा है। इंसनी सोच और वैज्ञानिकता ने हर मुश्किल का समाधान ढूंढा है। बस, सवाल उठना चाहिए। परसेप्शन इंसनी होना चाहिये, तार्किक होना चाहिये। प्लेग, पोलियो, चेचक को भी पूजा गया। शीतला माई भी स्थापित हुईं। घंटे भी बजे, दीया भी जले। दुआ, भभूत और ताबीज भी बांधे गए। अंततः टीके का ईजाद हुआ और इंसान ने ही इंसान को बचाया।

बावजूद इसके परसेप्शन/अवधारणा प्राचीनता और श्रेष्ठताबोध में लिपट रही हैं। तमाम घटनाओं की कनेक्टिविटी मरकज में सिमट रही है। बड़ी विभिषिका में केदार बाबा कैसे बचे ? अगर सवाल समाधान ऐसे होंगे तो तय है वैज्ञानिकता, इंसान और इंसानियत लंबे समय के लिए सेल्फ आइसोलेशन में होंगे।

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