स्मृति

गोदी मीडिया के दौर में ज्ञान बाबू की याद

(बाबू ज्ञान प्रकाश राय गोरखपुर के प्रसिद्ध पत्रकार रहे. वह गोरखपुर की छठे दशक की पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तम्भ थे. उन्होंने नेशनल हेराल्ड, समाचार एजेंसी यूपीआई, आज में काम किया. 21 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि है. इस मौके पर उनकी स्मृति में लिखा यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं. यह लेख बाबू ज्ञान प्रकाश राय के पुत्र कथाकार रवि राय ने लिखा है . गोदी मीडिया के दौर में ज्ञान बाबू को याद करना जन सरोकार की पत्रकारिता की परम्परा  को याद करना है और उसको सलाम करते हुए संकल्पबद्ध होना है. सं.   )

ज्ञान बाबू पत्रकार.पूर्वांचल के पुराने लोगों को शायद यह नाम याद हो . स्थानीय सेंट एंड्रूज़ कालेज से स्नातक होने के बाद 1942 में 20 वर्ष की आयु से ही बाबा राघव दास और शिब्बनलाल सक्सेना के संपर्क में आए और सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों में सक्रिय हो गए. पिता श्री गोपाल नारायण राय स्थानीय महात्मा गांधी हाई स्कूल ( वर्तमान में इंटर कालेज ) के प्रधानाध्यापक थे . बहुत चाहा कि घर के बड़े लड़के को सरकारी नौकरी मिले . उनकी कोशिशों से मिली भी – रेलवे की बाबूगिरी .

ज्ञान बाबू कई महीने आफिस टाइम पर घर से निकलते  और देर रात लौटते .लगा कि  बड़ी मेहनत से काम में मन लगा कर नौकरी कर रहे हैं मगर पता चला कि रेलवे तो कभी ज्वाइन ही नहीं किया . गांव-देहात में सक्सेना जी के साथ दौरे पर रहते थे. वर्ष 1946 में लखनऊ के ‘ नेशनल हेराल्ड ‘ अंग्रेजी अखबार के गोरखपुर संवाददाता हुए . बाद में यू.पी.आई. समाचार एजेंसी के जिला संवाददाता भी हो गए.

घर में टेलीफोन लगा. नंबर था वन जीरो यानी 10. गोरखपुर एक्सचेंज में की बोर्ड सिस्टम का पहला नंबर क्योंकि दहाई से ही नंबर शुरू होता था . बनारस से ‘आज’ अखबार ने ज्ञान बाबू को अपना गोरखपुर प्रतिनिधि नियुक्त किया. पूर्वांचल में 1977 तक दैनिक ‘आज’ अखबार का वर्चस्व रहा . बनारस से छप कर त्रिवेणी एक्सप्रेस से रोज गोरखपुर आने वाला यह ‘आज’ अखबार ही गोरखपुर की सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक, सांस्कृतिक सभी तरह की गतिविधियों का प्रमुख सूचना केंद्र था .

साठ के दशक में आन्दोलन के दौरान गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्रों के जुलूस पर गोली चली और नागेन्द्र सिंह शहीद हुए तो लगभग एक माह तक उद्द्वेलित छात्रों की आवाज बनकर ज्ञान बाबू ने अपनी खबरों से सरकार और प्रशासन की नाक में दम कर दिया. त्रिवेणी एक्सप्रेस के गोरखपुर  पहुँचने पर ‘आज‘ अखबार के बंडल ट्रेन से उतारते समय भोर में ही प्लेटफार्म पर ही लोग खरीदने के लिए जुट जाते . कई बार तो छात्रों की भीड़ ने अखबार के बंडल ही उठा लिए और हॉस्टल में कमरे-कमरे जा कर बांटा .

‘आज ‘ पढ़ने का ऐसा जूनून पैदा हुआ कि हिंदी न जानने वाले भी भी इसे घर ले जाते और किसी से बंचवाते.  पुराने लोग बताते हैं कि ‘आज ‘ पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्दी सीखी.

चुनार् पूर्व सर्वेक्षणों की उनकी शत प्रतिशत समीक्षा सटीक रहती .एक-एक सीट पर उनका विश्लेषण राजनीतिक दिग्गजों को भी आश्चर्य में डाल देता . मानीराम के उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री टी एन सिंह के खिलाफ पंडित रामकृष्ण द्विवेदी की जीत का उनका आकलन चुनाव परिणाम आने तक लोगों के गले नहीं उतर रहा था. महंथ अवेद्यनाथ  ने टी एन सिंह के लिए  इस्तीफा देकर अपनी सीट खाली की थी . प्रदेश के मुख्यमंत्री से सीधा मुकाबला था . मगर द्विवेदी जी जीते.

‘ आज ‘ अखबार में रेस के मैदान में घोड़ा मय सवार को गिरते हुए और साइकिल सवार को को दोनों हाथ छोड़ कर जीतते हुए कांजी लाल का कार्टून इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. यह कार्टून ज्ञान बाबू की रिपोर्टिंग के आधार पर कांजी लाल जी ने पहले से तैयार रखी थी. गोरखपुर में देर रात परिणाम के बावजूद बनारस से छप कर सुबह सबेरे ‘आज’ के पहले पेज का यह कार्टून देख देख कर लोग भौंचक्के हो गए थे .

अपने कार्यकाल में ज्ञान बाबू ने पूर्वांचल के दूरदराज इलाकों में अपने संपकों का बहुत शक्तिशाली और विश्वसनीय सूचना तंत्र गठित कर लिया था जो अक्सर बड़े-बड़े अखबारों के सुविधासंपन्न तंत्र पर अक्सर भारी पड जाता .बाढ़ या सूखे की आपदा में उनकी रिपोर्टिंग कई बार शासन की आंकड़ेबाजी को ध्वस्त कर देती थी .

छोटेकाजीपुर में ज्ञान बाबू के घर के पास कूड़ा उठाने वाला दलित कर्मचारी रहता था. किसी गलती पर सफाई इंस्पेक्टर ने उसे अगले दिन से काम पर आने से मना कर दिया. दलित सफाई कर्मी  का परिवार भूखों तड़पने लगा. न जाने किसने उसे ज्ञानबाबू के पास जाने के लिए कह दिया .ज्ञान बाबू ने उसकी व्यथा सुनी और उसे ले कर सीधे तत्कालीन जिलाधिकारी फरहत अली के पास पहुाँच गए. कल्पना करिए क्या हुआ होगा . नगर पालिका के सारे अधिकारीयों की जिलाधिकारी के सामने परेड हो गयी . सफाई कर्मी को नौकरी मिली तब जा कर अधिकारीयों का पिंड छूटा.

बख्शीपुर से पहले ‘आज ’ कार्यालय गोलघर में फैजाबाद सीड कंपनी के ऊपर खुला था. शाम को तमाम राजनीतिककों और बुद्धिजीवियों का वहां जमावड़ा होता था. मौक़ा खोज कर एक नाई अकसर अक्सर आने लगा. लोग उससे दाढी बनवाते . नाई को कहीं स्थाई ठौर की बात उठी . टाउनहाल गेट के सामने पहले शहर का चुंगी घर हुआ करता था जो तब खाली पडा था .नाई की उसी में सैलून खुलवा दी गयी. बाद में भालोटिया मार्किट बना जिसमें एमसन्स डिपार्टमेंटल स्टोर खुला मगर नाई का सैलून ठीक सामने पड़ने की वजह से स्टोर की बिक्री प्रभावित हो रही थी . सेठों ने सोचा था कि नाई को जब चाहेंगे उखाड़ कर फेंक देंगे देंगे. जोर जबरदस्ती हुई तो नाई ज्ञानबाबू की शरण में पहुंचा . नेताओं का जत्था जिलाधिकारी के सामने खडा हो गया . जबतक नाई को नई जगह नहीं मिलेगी पुरानी जगह नहीं खाली होगी . नाई का सैलून विधिवत अन्यत्र स्थापित  हुआ तभी नगरपालिका की वह पुरानी चुंगी हट सकी.

न जाने कितने ऐसे किस्से हैं . ज्ञान बाबू व्यवस्था के विरुद्ध और आम लोगों के साथ रहे . सुविधा  उन्हें भाती ही नहीं थी . बदहाली और दुश्वारियों को हमेशा जैसे आमंत्रित करते रहते थे. खुद्दार इतने कि कभी किसी का एहसान न मााँगा न स्वीकार किया . जो ठीक समझा वही किया चाहे अंजाम कुछ हो .बहती हवा के खिलाफ खडा होना उनका शगल था , जैसे कि उन्हें इसी में प्राण वायु मिलती थी .

छोटे काजीपुर का किराये का मकान मुकदमेबाजी की भेंट चढ़ गया . आर्थिक विपन्नता के कारण पैरवी नहीं हो सकी . मित्रों ने समय रहते शिफ्ट करने की राय दी मगर बात नही माने और 1978 से लेकर 18 वर्ष तक इसी गोरखपुर शहर में दर बदर होते रहे . वर्ष 1979 में कल्पनाथ राय के साथ दिल्ली  स्टेशन पर तिनसुकिया मेल में चढ़ते समय फिसलकर प्लेटफार्म और पटरी के बीच गिर गए.  दाहिने हाथ की तीन उंगलियां कट गईं और लगभग छह माह तक इरविन  ( अब जेपी ) अस्पताल में इलाज के बाद जान बची .

गोरखपुर लौटकर ज्ञान बाबू ने सक्रिय पत्रकारिता से संन्यास ले लिया . जिले के सूचनाधिकारी श्री त्रिपुरारी भास्कर एक दिन राप्तीनगर के पत्रकारपुरम में ज्ञान बाबू को मकान अलाटमेंट का तत्कालीन मुख्य मंत्री वीर बहादुर सिंह का फरमान लेकर अलीनगर की गली वाले किराये के मकान में खोजते हुए पहुंचे . एक फार्म पर सिर्फ उन्हें दस्तखत करना था मगर यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पूरी जिन्दगी व्यवस्था से लड़ने के बाद इसी व्यवस्था का कृपापात्र नहीं बनूाँगा . त्रिपुरारी भास्कर रोने लगे मगर ज्ञान बाबू अपनी जिद पर अड़े ही रहे .कोई भी उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई बात नहीं मनवा सका , मैं भी नहीं . मेरे पिता थे ज्ञान बाबू .

2 Comments

  • ज्ञान बाबू की पत्रकारिता
    पुरानी बात, पुरानी याद और एक वसूल की जिंदगी, इन महापुरुष की यही पहचान है।
    हम लोग इस बात के चश्मदीद हैं । 1978 में गोरखपुर दैनिक जागरण में जब हम लोगों ने पत्रकारिता का प्रशिक्षण शुरू किया था तब ज्ञान बाबू जिंदा थे । वे और मुन्ना लाल जी हम लोगों के बीच में “लिविंग लीजेंड “थे। अंग्रेजों के शासन काल में इन लोगों से हुए टकराव की कहानियां हमलों के बीच में चर्चा का विषय हुआ करती थीं। हम लोगों को भी उन्हें देखने, उनके पत्रकारीय धर्म को अपनाने का अवसर मिला । आज जब उनका जिक्र आया है तो उनकी तस्वीर मानस पटल पर दस्तक दी गई और उस गौरवशाली परंपरा के प्रति मन श्रद्धानत हो गया।

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