विचार

भारतीय अर्थवयवस्था पर कोरोना संकट का प्रभाव

कोविड-19 ने पिछले कुछ समय में हमारे लिए ‘नार्मल ‘ क्या होता है, उसकी परिभाषा ही बदल दी है. इस महामारी से पहले हमारी युवा पीढ़ी ने हाउस अरेस्ट शब्द का प्रयोग होते हुए कई बार युद्धों के दौरान सुना था, लेकिन इस महामारी ने उनको हाउस अरेस्ट असल ज़िन्दगी में कैसा होता है, उससे हमको रूबरू करा दिया। अगर गौर करें तो युद्ध भी मानव प्रजाति को भी इतने समय तक घर के अंदर नहीं धकेल पाये  लेकिन 2020 के आगमन में कोरोना ने यह कर दिया.

देश के सारे बुद्धिजीवी आजकल सिर्फ इसी काम में अपना ज़्यादा समय खर्च कर रहे कि इस महामारी का कितना दूर तक हमारी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा. इनमें से कुछ ने अनुमान लगाया है कि डिजिटल और फार्मा जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा मिल सकता है. वहीं हम इस बात को भी नहीं नकार सकते की कई क्षेत्रों जैसे कि हॉस्पिटैलिटी और मैन्युफैक्चरिंग की तो कमर ही टूट गई है.

स्थिति और नीतिगत प्रभाव

जबसे हमारे देश लॉकडाउन में लगाया गया है, सेंटर फॉर मानीटरिंग आफ इंडियन इकोनॉमी के अनुसार 11 से 12 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां गवा दी है. इसमें से 75 % मजदूर और छोटे उद्यमों में काम करने वाले कामगार हैं.  लॉकडॉउन में कारखानों के बंद हो जाने से फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों और फैक्ट्री मालिक दोनों ही काफी परेशान होते नज़र आ रहे हैं. अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि लॉकडाउन में रियात देने के बाद भी फैक्ट्रियों का खुलना काफी धीरे- धीरे होगा क्योंकि ज़्यादातर मज़दूर पहले ही अपने घर जा चुके हैं.

अंतरराष्ट्रीय नज़रिए से देखने तो  निर्यात बाज़ार यदि सामान्य भी हो जाए तभी हमारे देश के निर्यात करने वाले लोगों की स्थिति इतनी खराब है, कि वह दूसरे देशों से मिलने वाली मांग को पूरा नहीं कर पाएंगे. माना जा रहा है कि यदि ऐसा होता है तो वैसे देश जो भारत पर चीज़ों के लिए निर्भर थे, वह दूसरे देशों की तरफ रुख कर लेंगे और शायद भारत हमेशा के लिए उन देशों के बाज़ार से वंचित रह जाएगा.

देश का घरेलू क्षेत्र तेज़ी से आगे बढ़े इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में देश लघु और छोटे उद्यमों जो घरेलू क्षेत्र की जान माने जाते हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की बात कही है. जब इस विषय पर बात छिड़ी ही है, तो हमें एक और बात का ध्यान देना चाहिए कि चीन जो दुनिया का ‘एक्सपोर्ट हब’ माना जाते है, उसके यहाँ कोरोना के कारण निर्यात में कमी देखने को मिल रही है. इस उल्टे वैश्वीकरण को डेविड रिकॉर्ड कि कंपरेटिव एडवांटेज थियरी से समझा जा सकता है. यह थियरी कहती है, जिस देश को जो भी चीज की जरूरत होती है और वह उसके देश में नहीं बन सकती है, तो ऐसे में उसे दूसरे देश से सस्ते दाम में ख़रीद लेना चाहिए। इस थियरी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का आधार माना जाते है। लेकिन इस महामारी ने उसको उलट दिया है, अब देश वैश्वीकरण की जगह आत्मनिर्भर होने पर ज़्यादा ध्यान देने की बात कही जा रही है.

मोदी सरकार ने अर्थिक पैकेज की घोषणा की है. सरकार ने एक पॉलिसी बानायी है कि 200 करोड़ के टेंडर सिर्फ घरेलू उद्योगपतियों को दिया जायेगा.  भारत सरकार ने 10,000 करोड़ का फंड माइक्रो फूड एंटरप्राइजेज के लिए दिया है और उसका अनुमान है कि इससे कम से कम दो लाख माइक्रो फूड इंटरप्राइजेज को फायदा होगा. सरकार ने लोगों की नौकरियां ना जाए इसके लिए  लघु और माध्यम उद्योगों के लिए तीन लाख करोड़ का लोन दिया है. माना जा रहा है कि इस योजना से 45 लाख यूनिट फैक्ट्रियों को काम शुरू करने में मदद मिलेगी.

अपने देश में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य नया नहीं है. यह लक्ष्य 2010 से ही चला आ रहा है. उस समय इस लक्ष्य को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने विजन 2020  में देश से साझा किया था और भारत आज भी उसी सपने को साकार बनाने के लिए आगे कदम  बढ़ा रहा है.

कोरोना का असर देश पर बाहर से

कोविड-19 के कारण भारत की सप्लाई चेन को काफी नुकसान हुआ है. ऐसी वस्तुएं जैसे कि फार्मास्यूटिकल्स, रॉ मैटेरियल और ऑटोमोबाइल स्पेयर/पार्ट्स  बाहर से आने बंद हो गए हैं. यह सारी वस्तुएं चीन से आयात की जाती हैं. इनमें फार्मास्यूटिकल्स का आयात हिस्सा लगभग 70% है.  जो दूसरी वस्तु जिस पर बंदी का काफी प्रभाव पड़ा है, वह ऑटोमोबाइल स्पेयर व पार्ट्स हैं, जिनकी हिस्सेदारी 40 % हैं. अगर हम भारत के व्यापार को देखे तो निर्यात में 61% की गिरावट थी वहीं आयात में 59% की गिरावट दर्ज की गई। यह रिकॉर्ड अप्रैल, 2020 में  कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनीस्ट्री ने जारी किया था। चीन की आयात में गिरावट को भारत को अच्छे से अनुसंधान करना चाहिए, क्योंकि फिर वह जान सकता है कि किस तरह वह आयत की गई वस्तुओं को भारत में बना सकता है। इसका उदाहरण यह है कि भारत को फार्मास्यूटिकल्स इंडस्ट्रीज को कैसे विस्तार किया जाए की उसका ट्रेड डेफिसिट चीन से कम हो जाए। ट्रेड डेफिसिट तब पैदा होता है जब हमारा आयात, निर्यात से कम होता है।

दूसरी तरह हम यह देख सकते हैं, की आजकल सारे देश डीग्लोबलाइजेशन की तरफ बढ़ रहे है. सभी  देश अपनी आत्मनिर्भरता पर ध्यान दे रहे हैं और दुसरे देशों पर निर्भरता कम कर रहे हैं। आजकल सारे देश इसी ओर बढ रहे हैं. इस स्थिति में भारत को रीजनल कोऑपरेशन बढ़ाने पर ज़ोर देना चाहिए, ताकि एशियायी देशों का वह भरोसा जीत सके. ऐसा वह यदि कर पाता है तो उसके लिए काफी फायदेमंद होगा क्योंकि दुनिया के आधे व्यापार की हिस्सेदारी में एशियाई देशों का बोलबाला है। एक और ज़रूरी चीज है कि भारत को इस समय अपने ‘ मेक  इन इंडिया’ कैंपेन के तहत अपने देश का इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट बढ सके.

जब हम सभी यह सोच रहे हैं कि चीजें कब नॉर्मल होंगी तो सोचने के बजाए हमें इस समय का सुपयोग करके नए नार्मल के लिए तैयार होना चाहिए. थोड़े समय के लिए सरकार का आर्थिक पैकेज मददगार साबित होगा लेकिन भारत को आर्थिक पैकेज के बाद की स्थिति के बारे में सोचना चाहिए. उस स्थिति में हम क्या करेंगे इसको समझने के लिए मैं एपीजे अब्दुल कलाम के सपने का ज़िक्र फिर से करूंगा. इसमें उन्होंने देश के स्वास्थ्य , शिक्षा, व्यापार और शांति पर ध्यान देने की बात कही है. वह कहते हैं कि हमें अपने देश की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की जरूरत है, जो की शहरों और गांवो में प्राथमिक विद्यालयों को बनाने से होग. देश के नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का होना जरूरी है और साथ भारत को लघु उद्योगों क्षेत्र को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि वह रोज़गार दे सके.  और अंत में देश को विश्वशांति की ओर ध्यान देने की जरूरत हैं, जो इस विचारधारा से पनपती है कि असली शक्ति देश के गोली और मिसाइलों से नहीं देखी जा सकती बल्कि स्वास्थ्य , शिक्षा, व्यापार और शांति के सशक्तीकरण से ही प्राप्त की जा सकती है.

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी के छात्र हैं और कैम्पस पत्रिका ‘ Campus Zephyr ’ से जुड़े हैं )

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