साहित्य - संस्कृति

‘  मैं इतना मनुष्य कभी भी नहीं बन पाया/ की समझूं तुम्हारी सांस हमेशा क्यों घुटती रहती है ’

 

मैं स्वीकार करता हूं 

(कविता -राजेश मल्ल)
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मैं स्वीकार करता हूं कि
मैं इतना मनुष्य कभी भी नहीं बन पाया
की समझूं तुम्हारी सांस हमेशा क्यों घुटती रहती है।
यह कि बात करते समय तुम हमेशा छोटे क्यों दिखते हो।

 

मैं स्वीकार करता हूं कि
सारे प्रयासों के बावजूद
तुम गालियां और गलबहियां वाले साथी नहीं बन पाए।
सारी किताबें और कवायद निष्फल रहीं
इतनी सी बात जानने में कि मैं जन्मना श्रेष्ठ हूं
और बहुत बड़ी खाईं है हमारे बीच।
मैं यह ठीक से जानता हूं कि
इतना लिख भर देने से मै मनुष्य नहीं बन जाऊंगा
लेकिन और क्या बचा है स्वीकार करने के अतिरिक्त।

 

मैं स्वीकार करता हूं कि
बहुत देर हो चुकी है जब कि
बहुत सारा कालिख पोत चुकां हूं
अपने चेहरे पर
उनके हाथों से जो जन्मना हमारे अपने पाए गए थे।
बावजूद इसके मैं कोई दावा नहीं कर सकता
की तुम्हारे हाथों का संकोच
मेरे कंधों तक धरती में गाड़ दिया है
और मैं निष्कलुष हो गया हूं।

 

मैं स्वीकार करता हूं कि
बराबरी और आजादी की तमाम लड़ाई
बाहर से बहुत ज्यादा भीतर धंसी हुई है।

 

मैं स्वीकार करता हूं कि
कहना, लिखना और जीना एक साथ मुश्किल है
और तुम्हारी घुटती हुई सांस को
अपने भीतर की आत्मग्लानि से तुलना करना बेमानी है।

 

मैं स्वीकार करता हूं कि
फिर भी कुछ न कुछ ऐसा होगा
कि मैं भी मनुष्य बन सकूंगा सारे अपराधों के बावजूद।

 

(राजेश मल्ल दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं )

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