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बाहरी खरीदार नहीं आ रहे, केला उत्पादकों को नहीं मिल पा रहा लागत का दाम

कुशीनगर. छितौनी कस्बे सहित ग्रामीण अंचलों की किसानों ने नगदी फसल गन्ना के बाद केले की व्यापक पैमाने पर खेती की जाती है. इस समय केले की फसल पक कर तैयार होने की यह स्थिति में है लेकिन अभी तक बाहरी खरीदारों के नहीं आने से केला उत्पादक कम कीमत पर केले बेचने पर मजबूर हैं.

किसानों को उम्मीद थी कि लाक डाउन ज्यादा दिन नहीं चलेगा पर लाक डाउन के लम्बा खींचने से किसान मायूस हो गया है क्योंकि केले के उत्पादन में इनकी लागत से कम दाम पर स्थानीय खरीदार केला खरीदने को तैयार हैं जिससे इनकी पूंजी भी नहीं लौट रही है ऊपर से लाखों रुपए की कर्जदार हो जा रहे हैं

विजय कुशवाहा क्षेत्र के बड़े केला उत्पादकों में से एक हैं. उन्होंने लगभग 14 एकड खेत 30 से 35 हजार रुपया प्रति एकड़ पर लेकर केले की खेती की है. उन्होंने जी-9 प्रजाति का केला लगाया है. इसमें देसी खाद देनी होती है और 5 से 6 बार सिंचाई करने के अलावा कीटनाशक का भी छिड़काव करना होता है. केले के खेत की रखवाली में भी अच्छी-खासी रकम खर्च करनी होती है.

श्री कुशवाहा ने बताया कि केले की एक घरिया की लागत 120 रूपये आयी है जबकि स्थानीय खरीदार 100 रूपया घरिया खरीद रहे हैं. उन्होंने बताया कि एक एकड़ में 1200 पौधे होते हैं. इस तरह 14 एकड़ में 17 हजार पौधे तैयार किए गए हैं. आंधी-बारिश में 1000 पौधे का नुकसान हो गया फिर भी 16 हजार केले के पौधे तैयार हुए हैं. यदि 120 रूपया प्रति पौधा का लागत आता है तो साल भर के ब्याज सहित 150 प्रति पौधा बिकेगा तो उनकी जमा पूंजी वापस कैसे लौटेगी ?

उनका कहना है कि उन्हें केले की खेती में 8 लाख रुपए से ज्यादा का नुकसान हो रहा है. यदि जून-जुलाई तक केले का बाजार नहीं खुला तो नुकसान और बढ़ जाएगा। इनको भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा.

विजय कुशवाहा अकेले केला उत्पादक नहीं हैं जिन्हें नुकसान हो रहा है. केला उत्पादक किसान बृज किशोर कुशवाहा, सुनील गुप्ता, स्वामीनाथ चौहान, पप्पू चैरसिया, पिन्टू चौधरी, गिरजा शकंर गुप्ता ने बताया कि अच्छी पैदावार के बावजूद खरीद का दाम नहीं मिलने से काफी नुकसान हो रहा है.

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