साहित्य - संस्कृति

दसगज्जा

चित्र -सगीर खाकसार

डॉ सुरेन्द्र लाभ 

‘तुम कौन हो भाई ?’ 
‘आदमी’.
 ‘जात?’
 ‘मनुष्य’.
 ‘ धर्म ?’
 ‘मानवता’.
– ‘ऐसे गोल गोल घुमाओ मत..अपना परिचय, अपनी पहचान ठीक से बतलाओगे कि नहीं ?’
– ‘बतला तो रहा हूं।और कैसे बतलाउं ?’ 
‘देखो भाई मैं ठहरा पत्रकार. कैसों कैसों से तो बातें निकलवा लेता हूं. तुम्हारी क्या औकात ? ‘ 
‘ सत्य कहा बंधु , इस संसार में मनुष्य की कोई औकात नहीं.’ 
‘फिर पुछ रहा हूं, तुम नेपाली हो या इंडियन? और यहां बोर्डर पर क्यों खड़े हो ?’ 
‘ इस भीषण महामारी में इंडिया ने इधर धकेल दिया और नेपाल बोला उधर जाओ. नेपाल जब सीमा की ओर धकेलता है तो इंडिया गरजता है: खबरदार ! इधर मत आना. अब तुम्ही बोलो बंधु मैं किधर जाऊं? किधर का हूं? कौन हूं? बाध्य होकर इस दसगज्जा अर्थात नो मैन्स लैंड पर आ गया हूं. यह जगह भी पता नहीं कब तक सुरक्षित रह पाती है ? सदियों से यही होता आया है. दोनों देशों के शासक आपस में कोई संधि करते हैं और बोर्ड कभी इधर तो कभी उधर हो जाता है. बोर्डर के किनारे रहने वालों के मन मे क्या चल रहा है , कहां कभी पुछा जाता है? रातोंरात हम कभी नेपाली हो जाते हैं तो कभी इंडियन!’ –
‘तब तुम्हारी पहचान कैसे हो ?’
– ‘फिर वही प्रश्न ? अरे महाराज मैं मनुष्य हूं , सिर्फ मनुष्य ! क्या केवल मनुष्य होना काफी नहीं है?’ 
‘फिर भी कुछ परिचय तो बतलाओगे कि नहीं ?’ 
‘तो सुनो बंधु! इस माहामारी के समय भारत और नेपाल में जो हजारों हजार लोग हजारों हजार किलोमीटर पैदल चल रहे थे, वे पांव मेरे थे. दोनो देशों के राजपथ जो लहुलुहान हुए थे, वो मेरे ही तलवों से रिसते खून थे. चालीस किलोमिटर पैदल चलने के बाद सुनसान पड़ी हुई पटरी पर थके हारे जब सोलह लोगों की आंखें थोडी लग गईं थीं और धड़धड़ाती हुई मालगाड़ी सभी के गर्दन काटते हुए आगे बढ गई थी तो जानों बंधु वे गर्दनें मेरी ही थीं. इस कत्लेआम का कारण भी रोटी थी और परिणाम भी रोटी ही रोटी था. सो रेल पटरी पर बतौर सबूत मैंने रोटी ही बिखेर दिया था. इतना ही नहीं बंधु , अपने मरे हुए शिशु की लाश कोपुलिस के डर से चार दिनों तक मैंने ही अपने कंधों पर ढोया था.
सप्तरी जिले में जिस ‘सदा’ ने भूख से तडपकर जान दे दी थी, वह मैं ही था. काठमांडू की सडक पर जो ‘सूर्य ‘ मरा था भूख से, वह भी मैं ही था.’ ‘और सुनोगे परिचय तो सुनो. सूरत से भूख और प्यास से लड़ते लड़ते अपने गांव, अपनी मातृभूमि लौटने के लिए पंद्रह दिनों तक चलते चलते जब युवक बीरेन्द्र इस बोर्डर पर पहुंचा तब थक कर चूर और बीमार हो गया था. पर अपनी मातृभूमि को दूर से ही देखकर वह बच जाने की उम्मीद कर बैठा था. एम्बुलेंस की प्रतीक्षा में अपनी मातृभूमि की ओर टुकुर-टुकुर देखते जा रहा था. एकटक. पर सहोदर लोग प्रशासनिक अवरोध के कारण एम्बुलेंस भी न ला सके. भरोसा टूट गया. प्राण छूट गया. सीमा पर सदा सर्वदा के लिए सो गया. वो बीरेंद्र भी मैं ही था.’
‘एक और परिचय देता हूं. एक ईंट भठ्ठा पर एक गरीब दंपत्ति मजदूरी कर रहा था. माता के पेट मे एक शिशु पल बढ रहा था. माहामारी आई. पुलिस आई और गर्जी: ‘ नागरिकता प्रमाणपत्र है ? अगर नहीं है तो इंडिया भाग.’ वे लोग दौडते हुए सीमाना की ओर भागे.’ बोर्डर पर इंडियन पुलिस कडकी: ‘आधार कार्ड है ? ‘ ‘ नहीं हुजुर हम लोग मजदूर हैं और मेरी बीवी पेट से है. अपनी जलम धरती में हमें जाने दीजिए हजूर.’ पति द्वारा की गई खुशामद काम न आई और कानों को तोहफा मिला: ‘भाग साले उधर.’ महीनों तक दोनों बोर्डर पर पडे रहे बेबस. इसी अवस्था में मजदूर महिला ने एक शिशु को जन्म दिया. बोर्डर पर भूख प्यास से लडने वाले और अपनी मातृभूमि के लिए तरसने वाले और भी मजदूर भाई लोग थे. उन्होंने ही हर्षोल्लास के साथ बच्चे का नामकरण किया: ‘बोर्डर.’ जानते हो वह बोर्डर मैं ही हूं. बोर्डर पर बोर्डर खडा है..कहो तो और परिचय दूं बंधु?’
‘यह कैसा परिचय और कैसी पहचान ?
‘इसीलिए तो कहता हूं, मुझ से जादा मत पुछो..बस मनुष्य को मनुष्य समझो’.
‘मनुष्य ? इसका तो कोई अर्थ ही नहीं निकलता!’
‘हां मुझे पता है! यह पहचान, यह परिचय आप लोगों को भाता नहीं. मात्र मनुष्य बनना अपराध सा हो गया है..पर मुझे यह अपराध करने दो.
‘ यह तो शुद्ध पागलपन है.’
‘मनुष्यता का परिचय मिटाने वाले नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी हो गए और मैं पागल ? वाह रे दुनिया !
‘ हे मनुष्य तुम शुद्ध पागल हो. मैं हारा. चलता हूं. नमस्कार !’
आज मुझे पागल होने पर गर्व है..मेरा बस चले तो अपनी तरह के पागलों की एक बस्ती बसा लूं. पर क्या करूं? अभी तो एक ही पागल से आप परेशान हैं. पागलों की बस्ती बस गई तब क्या होगा? बंधु जाईए , नमस्कार !
( डा. सुरेन्द्र लाभ नेपाल के चर्चित प्रगतिशील साहित्यकार हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं )

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