विचार समाचार

लॉकडाउन में राहुल सांकृत्यायन और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का स्मरण

चौदह अप्रैल का दिन प्रख्यात विद्वान, यायावर और महान क्रांतिकारी महापंडित राहुल सांकृत्यायन का निर्वाण दिवस एवं साथ ही सामाजिक परिवर्तन के अग्रणी विचारक डॉक्टर अंबेडकर का जयंती पर्व भी है। दोनों व्यक्तित्व भारतीय समाज के जातीय संरचना के परस्पर विपरीत ध्रुवों से थे। दोनों ने समानता मूलक समाज निर्माण का सपना देखा और उसके लिए विभिन्न स्तर पर बड़े प्रयास किए। दोनों ने देश-दुनिया देखने एवं जानने के क्रम में समाज के अतीत, वर्तमान एवं भविष्य का गहरा अध्ययन किया। दोनों का इतिहास बोध इतिहास निर्माण के लिए था और दोनों विद्वानों ने जन्मना धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

डॉक्टर अंबेडकर के बहुत पहले ही राहुल सांकृत्यायन ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया उनकी तार्किकता एवं बुद्धिवादिता के प्रभाव में। राहुल जी ने डॉ अंबेडकर के पांच लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करने की घटना का स्वागत किया और प्रसन्नता व्यक्त की। उनका मानना था कि जिस भारत के चप्पे-चप्पे पर बौद्ध धर्म के मूर्ति- शिल्प और चिंतन की विरासत फैली है, उसे अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ेगी और हमें अपनी जड़ों से जुड़कर समतामूलक समाज निर्माण के लिए शक्ति हासिल होगी।

राहुल राहुल सांकृत्यायन डॉक्टर अंबेडकर के बौद्ध धर्म विशेष पर चर्चा के संबंध में सिर्फ दो बार उनसे मिले थे।

राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ में कहा था कि डॉक्टर अंबेडकर का रास्ता आखिर में गांधी ,बिरला और बजाज के रास्ते से मिल जाता है ,किंतु उन्होंने बाबा अंबेडकर के बौद्ध धर्म में परिवर्तन का स्वागत किया कि भारतीय संस्कृति में सब कुछ ऐसा नहीं है जिसे अस्वीकार कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो रक्षणीय है उसकी पहचान डॉक्टर अंबेडकर जी को है । वस्तुत: दोनों को याद करने का यह दिवस दरअसल समग्रता में भारतीय चिंतन एवं संघर्ष को याद करने का ऐतिहासिक अवसर है।

बाबा साहब अपनी जीवन यात्रा के आखिर में बौद्ध धर्म तक पहुंचे थे, किंतु राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़ी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म स्वीकार किया था और इसी रास्ते चलते हुए बौद्ध धर्म से भी गुजरे । इस संबंध में उन्होंने घुमक्कड़ शास्त्र नामक पुस्तक भी लिखी। वह बुद्ध के उपदेश से बहुत प्रभावित थे कि ” धर्म की नाव मैंने तुम्हें नदी पार करने के लिए दिया है, नदी पार कर सर पर रख कर ढोने के लिए नहीं ।”

राहुल सांकृत्यायन ने अपने अविश्वसनीय सामर्थ्य , बृहद एवं विविधता पूर्ण सृजन के मूल में घुमक्कड़ी को माना था। उन्होंने नवयुवकों और नवयुवतियों से आह्वान किया कि ” कमर कस लो भावी घुमक्कड़ों दुनिया तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।” उन्होंने कहा कि ” तुम एक घर छोड़कर निकलो दुनिया के तमाम दरवाजे तुम्हारे स्वागत के लिए खुले पड़े हैं।” दुनिया में जितना भी सृजन और ज्ञान दिखाई दे रहा है उसे घुमक्कड़ों ने ही हासिल किया है। उन्होंने ऐसा न सिर्फ लिखा ,बल्कि अपने ही जीवन से प्रमाणित करके दिखाया भी ।

राहुल जी का संकल्पधर्मी और क्रांतिकारी जीवन हमेशा प्रतिकूल स्थितियों में ही गतिशील रहा ,उन्होंने कभी अनुकूल परिस्थितियों की तलाश में अपनी प्राथमिकताओं एवं सृजन को मुल्तवी नहीं किया, जैसा कि पूर्वांचल में जन्में मध्यम वर्गीय जीवन में पाया जाता है।

आज जब हम राहुल जी को याद कर रहे हैं तो उनके द्वारा दिखाए गए घुमक्कड़ी के प्रेरणाप्रद मार्ग पर चारों तरफ अभूतपूर्व संकट दिखाई दे रहे हैं। दुनिया की बात छोड़ दी जाए तो देश में भी विचरण करने का संवैधानिक अधिकार रद्द किया जा चुका है । कोरोना महामारी के नाम पर जहाज, ट्रेन और सड़क मार्ग को तो बंद किया ही गया है बल्कि पैदल यात्रा पर भी प्रतिबंध है। आज देश में सब के दरवाजे सबके लिए बंद करा दिए गए हैं। अजनबी के लिए ही नहीं बल्कि सभी जानने वालों के लिए भी, रिश्तेदारों के यहां छोड़िए पड़ोसियों के यहां भी आवागमन पूरी तरह बंद है. बड़ी ही आतुरता और अपनत्व बस किसी तरह दूर देश से तमाम यातना सहकर घर पहुंचे लोगों को उनके गांव के बाहर कोरंटाइन के नाम पर पंद्रह दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। उन्हें पता ही नहीं कि उनका गुनाह क्या है ।

“लाकडाउन”के तीन सप्ताह बीत जाने के बाद स्थितियां अब जड़ एवं अनिश्चित लगने लगी हैं ।जेल की कैद से भी बदतर है या सब ,और अनिश्चित भी।

आज संकट है कि राहुल जी के उस घुमक्कड़ी का और डॉ अंबेडकर के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकारों भविष्य क्या है ?

ऐसा प्रतीत होने लगा है कि अब देश दुनिया घूमने का अधिकार सिर्फ नौकरशाहों और बड़े व्यवसायियों को ही होगा और आम जनता से उसके अबाध विचरण का अधिकार भी छीन लिया जाएगा।

ऐसे में अब नागरिक स्वतंत्रता की तलाश आखिर कहां की जाएगी । अब उस आजादी को खोजने कहां जाना होगा जो हमारे मनुष्य बने रहने की पहली शर्त है।

तमाम अमीर देशों द्वारा आयातित और डव्ल्यूटीओ तथा डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रमाणित इस कोरोना बीमारी को, जिससे होने वाली मौतें और प्रभाव फ्लू के ही स्तर की हैं, एम्स के अनुसार इसके 80% मरीजों को इलाज के लिए अस्पताल तक नहीं जाना पड़ता। इस बीमारी की आड़ में हमें नागरिक और जीवन के सभी अधिकारों से वंचित करा दिया गया है। आज देश के सभी अस्पतालों की ओपीडी बंद कर दी गई है। लोग इलाज के अभाव में मर रहे हैं। फ्लू , मलेरिया ,हार्ट, कैंसर ,टीवी निमोनिया और कुपोषण से प्रतिवर्ष मरने वालों की संख्या कई लाख है। उन्हें इलाज और चर्चा से बाहर कर दिया गया है। लोगों की न्याय के लिए उठने वाली सभी तरह की आवाजों को सत्ता द्वारा बंद कर दिया गया है।

यह ऐसा समय है कि डॉक्टर और न्यायधीश दोनों की शक्तियां पुलिस के डंडे में निहित हो गई हैं।लोगों पर कानूनी कार्यवाही न करते हुए क्रूरता पूर्वक पिटाई की जा रही है और मानवीय गरिमा को अपमान के सागर में डुबो दिया गया है।

पुलवामा हमले की घटना की तरह ही लगभग समूचे विपक्ष ने कोरोना और लाकडाउन के मुद्दे पर मोदी सरकार के सामने समर्पण कर दिया है। पूरे मामले पर विपक्ष की भाषा एवं नीति वही है जो मोदी ने उसके सामने प्रस्तुत किया है। जरूरत इस समय नागरिक अवज्ञा की है किंतु विपक्ष आज आज आज्ञाकारी बच्चा बना हुआ है।

घुमक्कड़ी को विश्व के सबसे बड़े धर्म का दर्जा देने वाले राहुल सांकृत्यायन के स्मरण दिवस पर आज के भारत में कितना बड़ा संकट है इसे महसूस करना और इस कोरोना वायरस की बीमारी के मोदी सरकार द्वारा राजनीतिक इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए सभी जागरूक और मनुष्यता में आस्था रखने वाले लोगों को उठ खड़े होने की जरूरत है । यदि आज हम खड़े नहीं होते तो विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन की कारपोरेट परस्त और घोर जनविरोधी नीतियों और उसके अनुचर बन चुकी भारत सरकार की गिरफ्त से निकल पाना और भी कठिन होता जाएगा।

आज समाज में कोरोना का संकट गौड़ है और वैश्विक आर्थिक मंदी से उत्पन्न राजनीतिक संकट प्रमुख है। इसकी गिरफ्त को तोड़े बिना हम राहुल और अंबेडकर के सपनों का सर्व सुखद और घुमक्कड़ी धर्म के अनुरूप स्वाधीन चेतना के साथ भारत भूमि और विश्व में विचरण करने के नैसर्गिक अधिकार को नहीं बचा सकते ।

जरूरत महापंडित राहुल सांकृत्यायन के उस आह्वान को महसूस करने की है कि ” कमर कस लो भावी घुमक्कडों दुनिया तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।”

About the author

डॉ चतुरानन ओझा

डॉ चतुरानन ओझा सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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