विचार

जे़हन में दबे सवाल अब छीन रहे आंखों से नींद

‘अब राती कs नींद नाहीं आवत बा। पता नहीं कुलहिन का खात-पियत होइहं। एतना दिन से तs सब एहर-वोहर से खइले-पियले क जुगाड़ बनवलंs। बाकिर अब डर लागत बा। बियाहो तs टरि गईल।’

बेटों का हालचाल पूछने पर गांव के रामबचन का यही जवाब है। उनके दो बेटे, दामाद और छोटे भाई समेत आधा दर्जन लोग लॉकडाउन में लुधियाना में फंसे हैं। सभी एक साथ एक ही कमरे में हैं।

सेठ से मिले पैसे और राशन के दुकान की उधारी अब भारी पड़ने लगी है। स्थानीय व्यवस्था में उनके लिए राशन का जुगाड़ टेढ़ी खीर रही। किसी पुलिसवाले की रहमदिली से बमुश्किल लॉकडाउन की पहली किस्त की अवधि का राशन जुटा पाए।

जनता कर्फ्यू के हफ्ता भर पहले गांव आने पर रामबचन ने छोटे बेटे की शादी की पूरे गर्मजोशी से चर्चा की थी- ’15 मई के बराते चले के बा। आठ बलेरो बन्हले हईं, जहाजी वाला कैमरा (ड्रोन) भी बा।’

बाजार की धमक और दिखावे की चाहत गांव-गिराव के उस वर्ग को भी अपने चपेट में ले लिया है जो दो जून की व्यवस्था में हर दिन खटते हैं।

इस मंशा का भी असर रहा कि उसने 18-19  साल के छोटे बेटे को भी कुनबे के साथ पहली बार रोजी कमाने परदेस भेज  दिया। जिसकी इसी महीने की 15 तारीख को शादी होनी तय थी।

परिवार को देर-सबेर शासन-सत्ता से पूरी उम्मीद थी। कभी योगी बाबा के बस भेजने की बात तो कभी मोदीजी जी के ट्रेन चलवाने की बात।

कभी मन में उठने वाले असल सवाल की जगह खबरों में कोरोना के हिंदू-मुस्लिम एंगल से उन्हें तसल्ली मिल जाती। या फिर तमाम अजीबोगरीब चर्चाओं जैसे- रेल,बस इसलिए बंद है कि सरकार चुपके से मंदिर निर्माण करा रही है, से सुकून।

हद तो ये कि थाली-घंटा बजाने या दीया-मोमबत्ती जलाने के पीछे राम-सीता की मूर्ति स्थापना की कहानी गढ़ ली जाती।

छत की छतरी से टपककर दिन-रात दिमाग पर हथौड़ा पीटने वाले मीडिया जिन्न को भी अंदाजा नहीं होगा कि उसकी क्रोनोलोजी पर इतने अतिरेक भरे (मनमाफिक) चर्चा और निष्कर्ष निकाल लिए जाएंगे।

उधर वास्तविक दुश्वारियां परदेस में उनके बच्चों के हौसले पस्त कर रही थीं। लॉकडाउन की पहली किस्त के बाद ही सभी ने ट्रक से निकल आने का प्लान बना लिया। पर ऐन वक्त पर प्रदेश और जिले की सीमाएं सील हो गईं।

इधर  लॉकडाउन की तीसरी किस्त बीतने को है। सड़क पर प्रवासी मजदूरों की बदहली और मर-खप जाने की त्रासदी सामने है। ऐसे में अब न तो मां-बाप उन्हें रिस्क उठाकर घर आने का हौसला दे सकते हैं और न ही बच्चे ऐसा करने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं।

अब उनके लिए सिस्टम की सुविधा में रजिस्ट्रेशन कराकर लंबा इंतजार ही एक चारा है। जो वह पिछले 15 दिन से कर रहे हैं। मगर यह सब अब आसान नहीं रहा। छोटा बेटा बीमार पड़ चुका है।

फोन पर हर दिन की हाल-खैरियत अब बोझिल हो चुका है। दिन तो काम-धाम में कट जाता है पर रात की नींद आंखों से गायब है।

चिंता और भय के बहुत से सवाल अब भी जेहन में दबे हैं। जो बाहर आने से पहले नियति के सहारे आस्था की वेदी काफूर हो रहे हैं।

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ओंकार सिंह

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