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‘ बाज़ुओं को बचाते हैं तो पर कटता है/ कितनी मुश्किल से परिंदों का सफर कटता है ’

गोरखपुर। मशहूर शायर रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी की 35 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर फ़िराक़ लिटरेरी सोसायटी, गोरखपुर के तत्वाधान में फ़िराक़ लिटरेरी अवॉर्ड 2021 साथ ही कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर फ़िराक़ लिटरेरी सोसायटी द्वारा फ़िराक़ लिटरेरी अवॉर्ड 2021, नरसिंह बहादुर चंद को दिया गया। मोहम्मद हामिद अली अवार्ड डॉ संजीव गुलाटी को, एम कोठियावी राही अवार्ड डॉ मुमताज़ ख़ान को,  प्रोफेसर अफ़ग़ानुल्लाह ख़ान अवार्ड मसरूर हसन बहार को और मंज़र ज़िया अवार्ड मोहम्मद अली को दिया गया ।

अतिथियों का स्वागत करते हुए फ़िराक़ लिटरेरी सोसायटी के अध्यक्ष एवं मियां साहब इस्लामिया इंटर कॉलेज के प्रबंधक महबूब सईद हारिस ने बताया कि फ़िराक़ गोरखपुरी का गोरखपुर से पुराना नाता है और हमेशा रहेगा। फ़िराक़ गोरखपुरी जैसी हैरतअंगेज और दिलचस्प और हाज़िर जवाब शख्सियतों को याद करना अपने आप में सुखद अनुभव है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ आरके राय ने कहा कि फ़िराक़ साहब की आपकी यादों का सिलसिला बहुत लंबा है । उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को जो स्थान दिलाया वह और किसी शायर के बस से बाहर था। फ़िराक़ की शायरी में पूरे हिंदुस्तान की तस्वीर उभरकर सामने आती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नरसिंह बहादुर चंद ने कहा कि फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे कि कविता को डिक्शनरी लेकर पढ़ना पड़े तो कौन पढ़ेगा। भाषा वह होनी चाहिए जो आम आदमी से लेकर साहित्यकारों तक आसानी से समझ में आ सके। इस अवसर पर डॉ एहसान अहमद ने कहा कि वैसे तो फ़िराक़ साहब ने जीवन का लंबा समय इलाहाबाद में बिताया , परंतु उनकी नाल गोरखपुर में ही गड़ी है और वह गोरखपुरी हैं। इंजीनियर मोहम्मद रफी अहमद ने बताया कि मैंने फ़िराक़ गोरखपुरी का वह दौर देखा है कि जब वह स्टेज पर कलाम पढ़ने खड़े होते थे तो किसी की मजाल नहीं थी कि चूं-चा कर सके । फ़िराक़ साहब के पढ़ने का अंदाज़ निराला था।

 

 

कवि गोष्ठी और मुशायरे में इन शायरों और कवियों ने कलाम पढे

( 1 )

कुछ जरूरी तो नहीं पत्थर का हो पत्थर जवाब
आगे बढ़ना है तो अपना सर झुकाते जाइए

– जालिब नोमानी

( 2 )

बनके इंसान पहले निखर जाइए
ओढ़ कर दिनों ईमान संवर जाइए
फिर तो मंज़ूर है हर शर्त आपकी
आइए मेरे दिल में उतर जाईये।

-नरसिंह बहादुर चंद

(3)

आप कमज़ोरों को इतना ना सताए हज़रत
वो कफन बांध के तैयार भी हो सकता है

– मोहम्मद अनवर ज़िया

( 4 )

यक़ी करो अंधेरा मिटायेंगे इक दिन
बदन तराश के सूरज का लाएंगे इक दिन
-डॉ ज़ैद कैमूरी

( 5)

तुमहीं को गुनगुनाना चाहतीं हैं
मेरी ग़ज़लें बहाना चाहतीं हैं

– डॉ चारुशिला सिंह

( 6 )

प्यार का रंग दिल से ना छूटे कभी
सिलसिला चाहतों का ना टूटे कभी

-प्रतिभा गुप्ता

( 7 )

बाज़ुओं को बचाते हैं तो पर कटता है
कितनी मुश्किल से परिंदों का सफर कटता है
-फरीद क़मर

(8)

मोहब्बत क्या है इसको मां से बेहतर कौन समझे
जो अपने सांवले को चांद का टुकड़ा बताती है

 

( 9 )                                                                        – शाकिर अली शाकिर

 

दिल जो मेरा आज बहुत घबराया है कौन
हजारों में यह मेरे याद आया है

– वसीम मज़हर

 

कार्यक्रम में मुख्य रूप से मोहम्मद इफ्राहीम , डॉ ताहिर अली , एडवोकेट अरमानुल्लाह, शोएब अहमद , सैयद इक़बाल अहमद , समेत काफी संख्या में लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ आर के राय थे जबकि अध्यक्षता नरसिंह बहादुर चंद ने की।  कार्यक्रम का संचालन मोहम्मद फर्रुख़ जमाल ने किया।

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