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विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा है कुशीनगर का जिला अस्पताल

कुशीनगर। कुशीनगर जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज व अन्य स्थानों पर जाना पड़ रहा है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होकर जिला अस्पताल आए मरीजों को तुरंत बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर भेज दिया जाता है। इससे मरीजों को समय पर इलाज न मिलने से जान का खतरा तो होता ही है, इलाज व आने-जाने में काफी पैसा भी खर्च होता है। अपनी स्थापना के डेढ़ दशक बाद भी जिला संयुक्त अस्पताल स्वास्थ्य सुविधाएं देने के मामले में बहुत बहुत पीछे है।

कुशीनगर जिले में 14 ब्लॉक, 1003 ग्राम पंचायत ,10 नगर पंचायत , तीन नगरपालिका है और आबदी करीब 40 लाख है। 13 मई 1994 को जिला बनने के 12 वर्ष बाद 14 नवंबर 2006 को सदर अस्पताल बना। यहां पर बुनियादी सुविधाएं काफी देर बाद उपलब्ध हो पायीं। आठ वर्ष बाद एक्सरे तथा सिटी मशीन मिली लेकिन इसको संचालित करने के लिए तकनीशियन काफी समय बाद मिल पाए। जिला अस्पताल का ओपीडी मात्र एक फिजीशियन , एक बाल रोग , एक महिला डॉक्टर तथा एक हड्डी रोग विशेषज्ञ के बल पर चलता है। ओपीडी में मरीजों की संख्या एक से डेढ़ हजार प्रतिदिन होती है।

जिला संयुक्त अस्पताल में आईसीसीयू , डायलिसिस , सीटी स्कैन तथा अल्ट्रासाउंड तकनीशियन की कमी है। इसके अलावा सीनियर फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट , न्यूरोलॉजिस्ट , यूरोलॉजिस्ट, महिला सर्जन , एनेस्थीया , नेत्र सर्जन नहीं हैं। इसी तरह पैथोलॉजी में थायराइड प्रोफाइल , ग्रोथ हार्मोन , विटामिन डी , विटामिन बी12, ट्यूमर मार्कर की जांच के लिए मरीजों को बाहर जाना पड़ता है।

पूर्व मंत्री राधेश्याम सिंह का कहना है कि जिला अस्पताल में जो कुछ है वह सपा सरकार की देन है। भाजपा सरकार गरीब तबके के लोगों के लिए जिला संयुक्त अस्पताल पर ध्यान न देकर अपने वोट बैंक बनाने में लगी है।

पूर्व विधायक डॉक्टर पूर्णमासी देहाती ने कहा कि भाजपा सरकार में स्वास्थ्य पर बजट की घोषणा कर खूब वाहवाही लूटी गई लेकिन संयुक्त जिला अस्पताल की हालत यह है कि यह दुष्कर्म की शिकार बच्ची को इलाज देने में असफल साबित हुआ। बच्ची के इलाज के लिए सत्ता पक्ष के विधायक को सीएम से गुहार लगानी पड़ी।

कांग्रेस के जिला अध्यक्ष राज कुमार सिंह का कहना है कि जिला अस्पताल बनने के 15 वर्ष बाद भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के अभाव में जिले के लोग गंभीर रोगों के इलाज के लिए गोरखपुर मेडिकल कॉलेज का शरण लेते हैं। जिसमें समय वह धन दोनों की बर्बादी होती है । प्रदेश सरकार द्वारा सभी को स्वास्थ्य की सुविधा देने की कहना बेमानी है।

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