स्मृति

कब तक तेरा जगना अगोरुंगा वर्मा जी

मैं काल बैक करता हूं तुझको ए ज़िंदगी
कुछ देर सो लूं आंख लगी है अभी अभी

सो लो !
नींद में व्यवधान नहीं डालूंगा ।
पर यह तो चिर निद्रा है !

हाल ही में जब यह शेर कहा था तो पता न था कि मेरे भीतर बैठा मेरा अध्यापक , कामरेड डा. लालबहादुर वर्मा
अपनी बात मेरे मुँह से कहलवा रहा है ।

ज़िंदगी भर अपनी पाजिटिविटी से लाखों की निगेटिविटी दूर करने वाला तब ख़ुद निगेटिव अर्थों में पाजिटिव हो चुका था ।
उनके अस्पताल जाने की ख़बर के बाद दिल धक् से रह गया । लौटेंगे नहीं । इस कलमुहीं ज़बान को जितना मरोड़ सकता था , मैने मरोड़ा । मगर !

कविता कहानी सिद्धांत बहस मुबाहसे में भले हो पर ज़िंदगी में इस मगर का कोई जवाब आज भी नहीं है ।
मगर हुआ वही जो नहीं होना था । चले गए । हमेशा के लिए चले गये ।
मैं बेटे देवांश का जाना अभी बर्दाश्त भी न कर पाया था कि मेरे वैचारिक पिता ने भी मुझ से विदा ले ली ।
उफ़ !

मैने अपनी किताब ‘ जो पीवे नीर नैना का ‘ उन्हें समर्पित करते हुए लिखा था :

” डाॅ. लालबहादुर वर्मा को सादर जिनसे मैने अच्छा बच्चा न बनने की शिक्षा ग्रहण की ”

किताब मिलने पर उनका फोन आया -” देवेंद्र इस तरह तो मुझे आज तक किसी ने याद नहीं किया ।
क्या काम्प्लीमेंट दिया है तुमने ।”

वर्मा जी ने न जाने कितने बच्चों को यूं ही बिगाड़ कर अच्छा बनाया । पर हक़ीक़त यही है कि ‘ बुत परस्ती मेरा ईमान नहीं ‘ कहने वाला परले दर्ज़े का बुत परस्त था । देखो न कैसे बुत की तरह पड़ा है ।

हमें बिगाड़ कर अच्छा बनाने वाला बिगड़ैल, आज अच्छे बच्चों की तरह ख़ामोश पड़ा है ।

पिछले चालीस साल उनकी यादों से भरे पड़े हैं । अब तो बस याद ही करना है । उन्हीं से सीखा फूल बनना । उन्हीं से सीखा पत्थर बनना । प्यार का हुनर उन्हीं से सीखा । उपेक्षा का गुर भी उन्हीं से सीखा । किसी की याद आख़िरी नहीं होती , याद करने का यह अंदाज़ भी उन्हीं से सीखा ।

वो मुझको इस तरह से याद आए
कि जैसे कोई आंसू मुस्कुराए

मुस्कुराते उस आंसू को आख़िरी सलाम !

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देवेन्द्र आर्य

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