साहित्य - संस्कृति

‘ अपनों की याद ’ कार्यक्रम में कवि सुरेश चन्द्र और शरद चन्द्र श्रीवास्तव को याद किया गया

गोरखपुर। जन संस्कृति मंच द्वारा आज शाम प्रेमचंद पार्क में आयोजित ‘ अपनों की याद ’ कार्यक्रम में कोरोना से दिवंगत हुए गोरखपुर के दो युवा कवियों-सुरेश चंद और शरद चन्द्र श्रीवास्तव को शिद्दत से याद किया गया। वक्ताओं ने इस मौके पर कहा कि दोनों के असामयिक निधन से गोरखपुर के साहित्यिक जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। दोनों कवि समाज को बेहतर बनाने के लिए चल रहे संघर्ष को बड़े सांस्कृतिक योद्धा थे।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में कवि व दलित एवं संस्कृति मंच के अध्यक्ष सुरेश चंद की याद में श्रवण कुमार ने उनकी कविता ‘ हम उन्हें अच्छे नहीं लगते ‘ के अलावा निधन के पूर्व कोराना पर उनकी लिखी गई कविता पढ़ी।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे मनोज कुमार सिंह ने शरद चन्द्र श्रीवास्तव की दो कविताओं- ‘ दूसरी भाषा तलाशना चाहता हूं ’ और ‘ पत्थर वाकिफ हैं ’ का पाठ किया।

इसके बाद कवि विनय कुमार, रंगकर्मी राजाराम चौधरी, सुजीत कुमार श्रीवास्तव, लेखक आनन्द पांडेय, कवि वेद प्रकाश, जय प्रकाश नायक, श्रवण कुमार, श्याम मिलन एडवोकेट, महेन्द्र गौतम, मनोज मिश्र, जेएन शाह, स्व. सुरेश चंद की पत्नी गीता, जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष जय प्रकाश मल्ल, सचिव प्रमोद कुमार, दलित विचारक-लेखक अलख निरंजन ने दोनों कवियों को याद किया। कई वक्ता बोलते वक्त भावुक हो गए।

वक्ताओं ने कहा कि सुरेश चंद लम्बे समय से गोरखपुर के साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिवधियों के केन्द्र में थे। उनकी कविताएं हाशिए के समाज की पीड़ा की आवाज थीं। वे अच्छे बांसुरी वादक भी थे और उन्होंने प्रेमचंद पार्क में कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

कवि प्रमोद कुमार ने कहा कि सुरेश चंद को वे छात्र जीवन से जानते थे। वे भले इंसान थे और लोगों की मदद के लिए तत्पर रहते थे। कवि शरद चंद्र श्रीवास्तव को याद करते हुए उन्होंने कि उन्होंने अल्प समय में गोरखपुर में अपनी छाप छोड़ी थी। दोनों बेहद उत्साही व सक्रिय थे। दलित लेखक अलख निरंजन ने भारतीय जीवन बीमा निगम में सुरेश चन्द की साहित्यिक सक्रियता का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उनका निधन सामाजिक क्षति है।

वक्ताओं ने कोविड की दूसरी लहर में लोगों की जान की रक्षा करने में सरकार की विफलता का उल्लेख किया और कहा कि सरकार इस दौरान पूरी तरह अनुपस्थित थी। इस स्थिति ने हमको दिखाया कि पूंजीवादी व्यवस्था कितनी निर्मम और क्रूर हो सकती है और उसने इस आपदा में भी अपने अवसर की तलाश की।

वक्ताओं ने सुरेश चंद की याद में सलाना सांस्कृतिक उत्सव आयोजित करने और शरद चन्द्र की याद में युवा कविता पर कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया।

कार्यक्रम के अंत में कवि सुरेश चंद्र की कविता -हंसो कि हंसने से से पिघलता है दुःख का पहाड़, बर्फ बनकर जम गई है जो वेदना हमारे दिलों मे, आंसू बनकर झरता है मोती की तरह ’ का पाठ हुआ। बैजनाथ मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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गोरखपुर न्यूज़ लाइन

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