साहित्य - संस्कृति

‘ उस्ताद होटल ’: इंसानियत पर भरोसा जगाती एक फिल्म

इंसान के लिए उसके जीवन में सबसे महत्वपपूर्ण क्या होता है ? यह सवाल सिर्फ आज से नहीं बहुत वर्षों से पूरी दुनिया में समय-समय पर पूछ गया है।एक इंटरनेशनल एजेंसी ने इस सवाल के जवाब में कहा कि इंसान के लिए तीन चीज सबसे महतवपूर्ण है- खाना, सोने के जगह और कपड़े। यदि किसी इंसान के पास यह तीनों है तो वह अपना जीवन चला सकता है लेकिन आपको यह जान कर हैरानी होगी कि हमारा देश भुखमरी मापन में 107 देशों में 94 स्थान पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 के अनुसार देश के 14 फीसदी लोगों को सही मात्रा में पोषण नहीं मिल रहा है।

हमारे देश में कई फिल्में बनी हैं जो दर्शको को भोजन के महत्व को समाज से जोड़ती हैं। ‘ स्टैनले का डब्बा ‘ और ‘ दावत-इ-इश्क ‘ जैसी फिल्में इस विषय को छूती हैं। मैं एक ऐसी फिल्म की बात करने जा रहा हूँ, जो इस बात पर तवज्जो देती है कि भोजन क्यों बनाना चाहिए और खाना खिलाने की असली खुशी क्या होती हैं ? फिल्म का नाम है ‘ उस्ताद होटल ’। यह फिल्म 2012 में रिलीज हुई थी। अनवर रशीद ने इसको निर्देशित किया है।

फिल्म केरल के एक मुसलमान परिवार की कहानी है। परिवार में लोग पुत्र के पैदा होने का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि उस घर का भविष्य एक बेटा ही बदल सकता है। आखिरकार चार लड़कियों के बाद इस परिवार में बेटे का आगमन होता है जिसका नाम फैजी रखा जाता है। फैजी की माँ उसके पैदा होने के बाद ही गुजर जाती है। फैजी के पिता अब्दुल रज्जाक का मानना है कि उनका बेटा ही उनकी सारी उम्मीदें पूरा करेगा जो वह पूरा नहीं कर पाए। अब्दुल रज्जाक चाहते हैं कि फैजी उनका दुबई में होटल संभाले। इसके लिए वह उसे होटल मैनेजमेंट की डिग्री लेने स्विटरजलैंड भेजते हैं।

वह सोचते हैं कि जैसे ही फैजी अपनी डिग्री लेकर आएग वे उसे अपने फाइव स्टार होटल की जिम्मेदारी दे देंगे लेकिन फैजी होटल मैनेजमेंट की जगह सेफ की डिग्री ले कर आ जाता हैं। उसके पिता बहुत खफा होते हैं। उनको लगता है कि बावर्ची का टैग उनकी जिंदगी से कभी जाने वाला नहीं है। पिता से हताश हो कर फैजी दुबई से कोझिकोड अपने दादाजी के पास रहने आ जाता है। उसके दादा एक होटल चलते हैं। शहर के लोग उन्हें बिरयानी मास्टर के नाम से जानते हैं। उनकी अपने बेटे अब्दुल रज्जाक से बिलकुल बात नहीं होती क्योंकि वह अपने पिता को जिम्मेदार मानते हैं कि बचपन में उन्होंने उनको ज्यादा समय नहीं दिया। जब वह फैजी को दादा के साथ देखते हैं तो वह बहुत नाराज होते हैं और उससे भी बातचीत बंद कर देते हैं।

फैजी के दादा यह मानते हैं कोई भी कितना बड़ा और अच्छा बावर्ची क्यों ना हो, उसको कुछ इम्तहान पास करने पड़ते हैं जिसके बाद ही वह उस्ताद होटल में बिरयानी बनाना सीख सकता है। फैजी को यह गुर सीखने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं, लेकिन वह अपनी लगन से बिरयानी बनाना सीख लेता है। उसके दादा चाहते हैं कि फैजी अब अब उनके होटल को संभाले क्योंकि वह उस्ताद हो चुका है।

लेकिन फैजी का मंसूबा दादा के साथ उतने देर तक ही रहने का था जब तक पिता का गुस्सा ठंडा न हो जाए। वह चाहता है कि पिता से पासपोर्ट लेकर लंदन के मशहूर होटल में सेफ की नौकरी कर सके।यह बात जब उसके दादा को पता चलती है तो वह बहुत हताश हो जाते हैं क्योंकि उनका मानना था कि खाना खिलाने को धंधे की तरह नहीं लेना चाहिए। खाना खिलाने में जो खुशी महसूस होती है, वह खाना खाने वाले के पेट भरने से आती है। वह चाहते हैं की फैजी भी उसी लक्ष्य से लोगो के लिए यह होटल चलाये ना कि अपने लिए चलाये।

दादा की सोच से बेपरवाह फैजी पार्ट टाइम के लिए वहां के फाइव स्टार होटल में काम करने लगता है। वह कुछ दिन के अंतराल में बहुत अच्छा बावरची साबित हो कर दिखाना चाहता है। वहां पर उसकी मुलाकात फिलिप्स से होती है जो फैजी को अपने साथ फ्रांस चलने को कहता है जहाँ वह एक रेस्टोरेंट खोलने जा रहा है। इस आफर से फैजी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसको लगता है कि उसकी सारी मेहनत रंग लायी है। जब वह यह बात अपने दादा को बताता है तो उनको धक्का लगता है। उन्हें हार्ट अटैक आ जाता है। फैजी सोचता है कि दादा अपनी बीमारी का हवाला देकर उसे यहां रोक लेंगे लेकिन दादा फैजी को फ्रांस जाने से पहले एक काम सौपते हैं और कहते हैं कि वह इस काम को पूरा करने के बाद ही फ्रांस जाए। फैजी मान जाता है।

दादा के कहने पर फैजी मदुरई में नारायण मूर्ति से मिलने जाता है। नारायण मूर्ति पेशे से बावर्ची हैं जो अपनी सारी दौलत गरीबों को खाना खिलाने में लगाते हैं। उन्हें देख फैजी के मन में सवाल उठता है कि इतना अच्छा बावर्ची अपना होटल चलने के बजाये यह काम क्यों कर रहा है ? इसमें उसका क्या फायदा है ? यह सवाल वह नारायण मूर्ति के सामने रखता है तो वह कहते हैं कि एक बार ट्रैफिक सिग्नल पर उनको दिखा कि एक भूखा आदमी अपना मल्ल खाने पर मजबूर है। तब उन्हें यह एहसास हुआ कि अच्छा खाना लोगों को खिलाने का क्या फायदा जब मेरे ही प्रदेश के लोग भुखमारी से पीड़ित हैं। उस दिन के बाद से वह हर दिन खाना बना कर अपने आस-पास के गरीब लोगांे को खिलाते हैं। फैजी यह बात सुनकर बहुत हैरान रह जाता है। उसको लगता है कि वह फ्रांस जा कर बहुत बड़ी गलती करने वाला है। यदि वह फ्रांस चला जाता है तो उस्ताद होटल बंद हो जाएगा और उसके शहर के लोग जो वर्षों से इस होटल के सहारे जीते हैं , वे भुखमरी के शिकार हो जाएंगे। मदुरई से लौट कर फैजी फ्रांस जाने का इरादा छोड़ देता है और अपने अपने दादा के साथ उस्ताद होटल चलाने लगता है।

यह फिल्म हमे मानवीय मूल्यों को जिंदा रखने के प्रेरणा देती है। यह फिल्म भुखमरी की समस्या के साथ-साथ पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर भी चोट करती है। फिल्म में फैजी की भूमिका सलमान ने निभायी है। फैजी की दादा की भूमिका रोले तिलक ने अभिनीत की है। फिल्म की कहानी अंजलि मेनन ने लिखी है।

About the author

दिव्यल भूषण गुप्ता

लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी के छात्र हैं और कैम्पस पत्रिका ‘ Campus Zephyr ’ से जुड़े हैं

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