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भाजपा विधायक ने स्कूलों की फीस माफ करने की आवाज विधानसभा में उठायी   

डॉ राधा मोहन दास अग्रवाल (फाइल फोटो )

लखनऊ। गोरखपुर नगर के विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल ने आज प्रदेश की विधानसभा में प्रदेश के प्राथमिक, अपर प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की फीस माफी का विषय उठाते हुए माध्यमिक शिक्षा मंत्री तथा उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा तथा बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री सतीश द्विवेदी से मांग किया कि सरकार एक बार पुनः फीस माफी या कम से कम, कम करने पर विचार करे।

विधायक ने कहा कि कोरोना-काल में प्रदेश के सभी विद्यालय पूरी तरह से बंद चल रहे हैं। इस दौरान नागरिकों की आय बुरी तरह प्रभावित हुई है तथा अधिकांश गरीब तथा मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन आर्थिक रुप से दूभर हो गया है। बहुत से परिवारों का घरेलू – खर्च नहीं चल पा रहा है। ऐसे में अभिवावकों की इच्छा थी कि अगर विद्यालय बंद है तो सरकार विद्यालयों को फीस-माफी के लिए निर्देशित करे।

डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि शासन की ओर से निर्देश भी दिए गए कि कोई भी विद्यालय फीस जमा करने के लिए दबाव नहीं बनायेगा, एक बार में एक माह से अधिक की फीस नहीं लेगा और वार्षिक फीस, लाईब्रेरी फीस, बिल्डिंग फीस, खेलकूद फीस, परिवहन फीस तो बिल्कुल ही नहीं लेगा, सिर्फ शिक्षण शुल्क ही लिया जायेगा। यहाँ तक कि यदि अभिवावक लिखित आवेदन करे तो एक माह की फीस भी किश्तों में ली जाये।

उन्होंने कहा कि लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकांश जिला विद्यालय निरीक्षकों तथा बेसिक शिक्षा अधिकारियों ने सरकार की मंशा के विरुद्ध जाते हुए सरकार के आदेशों का अनुपालन ही नहीं कराया। विद्यालयों मैसेज करके अभिवावकों को धमकाकर तीन महीने की 12000-16000 हजार फीस एक साथ वसूलने के साथ ही 10000 तक की वार्षिक फीस भी वसूल लिये। यहाँ तक कि अभिवावकों को स्कूल बुलाकर जबरन महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया गया।

शिशु-रोग विशेषज्ञ डा अग्रवाल ने कहा कि स्कूलों की जगह शुरु कराई गई आन-लाईन शिक्षा निहायत अनियोजित तथा निम्नस्तरीय थी। स्थानीय आधार पर अनुभवविहीन शिक्षकों के द्वारा अधोमानक पाठ्यक्रम तैयार किए गए और छोटे-छोटे बच्चों को इसके कारण बहुत से मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा।

गोरखपुर विधायक ने कहा कि विद्यालय प्रबन्धकों की यह बात पूरी तरह से अतार्किक है कि अगर फीस नहीं लेगें तो शिक्षकों को वेतन कंहा से देगें। आज विद्यालय खोलना सबसे लाभ का व्यवसाय माना जाता है। कतिपय छोटे किराये के भवनो में चलने वाले विद्यालयों को को छोड़कर अधिकांश प्रबंधक करोड़पति हैं। उन्होंने कहा कि सच तो यह है कि सिर्फ 25 % फीस से विद्यालय अपने शिक्षकों को वेतन दे सकते हैं

डा अग्रवाल ने सरकार से मांग किया कि सरकार एक बार पुनः अभिवावकों के आग्रह पर पुनर्विचार करें और विद्यालयों को फीस माफ करने या कम करने के लिए निर्देशित किया है।

विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायन दिक्षित ने डा अग्रवाल की मांग पर सरकार का ध्यानाकृष्ट किया है।

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