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गोरखपुर। कोरोना वायरस के मद्देनजर किए गए लॉकडाउन से जनता जूझ रही है। खाने के लाले पड़े हुए हैं। वहीं शहर के विभिन्न मोहल्ले में पाले जा रहे करीब 700 से 800 विदेशी परिंदे, पर्शियन बिल्ली व विदेशी नस्ल के कुत्तों की खुराक को लेकर समस्या खड़ी होने वाली है। लॉकडाउन बढ़ा तो इन बेजुबान परिंदे व जानवरों की जिंदगी खतरे में पड़ने की संभावना है।

शहर में अफ्रीकन रेडरम पैरेट्स, आस्ट्रेलियन टारकोजिन, हालैण्ड बजरी, इंग्लिश बजरी, जावा स्पैरो, आस्ट्रेलियन अपलाइन रमपैरेट्स, अलबिनो, काकाटील, फैंसी काकटील, क्रस्टर बजरी, अफ्रीकन लव बर्ड, पाइड काकाटील, अफ्रीकन ग्रे पैरेट्स, काका टू, रोजीला आदि विदेशी परिंदे मौजूद हैं। यह परिंदे बेहद खुबसूरत हैं। इनका अलग-अलग रंग, साइज व आवाज है। वहीं तमाम घरों में पर्शियन बिल्ली व विदेशी नस्ल के कुत्ते बहुत शौक व नज़ाकत से पाले जा रहे हैं जिनके लिए बाहर से खाना आता है। लॉकडाउन की वजह से खाना आ नहीं पा रहा है।

विदेशी परिंदे शहर के विभिन्न मोहल्ले में रहने वाले 50 से 60 लोगों के पास हैं। परिंदों को साफ-सफाई का स्पेशल ट्रीटमेंट मिल रहा है। नहाने के लिए सेनिटाइजर युक्त क्वालिटी लेबल का स्प्रे प्रयोग में लाया जा रहा है। विदेशी परिंदों को पालने वालों की असली समस्या परिंदों की खुराक को लेकर सता रही है।

प्रतिदिन इनके देखभाल के लिए दो से तीन घंटे खर्च करने पड़ते है। इनके खाने में मल्टी विटामिन दाने एवं देशी दानों में चना, हरी मूंग, सोयाबीन का दाना, गेहूं का दाना भीगो कर दिया जाता है।

शाहमारुफ के रहने वाले विदेशी पक्षियों के शौकीन मो. शादाब खान ने बताया कि यह परिंदे विदेशी दानों पर निर्भर रहते हैं। जिसे अलीनगर की एक दुकान डिस्कवरी फिश एक्वेरियम व ऑनलाइन आर्डर देकर मंगाया जाता है। ऑनलाइन दाना मंगवा नहीं सकते हैं जबकि दुकान बंद है। अगर लॉकडाउन बढ़ता है और दाने का इंतजाम नहीं हो पाता है तो विदेशी परिंदों की जिंदगी खतरे में भी पड़ सकती है। देशी दानों के जरिए कुछ दिन ही जिंदा रखा जा सकता है। जब लॉकडाउन लगने वाला था तब ही पक्षी प्रेमियों ने परिंदों के एक हद तक दानों का इंतजाम कर लिया था। दाना अब खत्म हो रहा है।

यह समस्या विदेशी बिल्लियों व कुत्तों के साथ भी आ रही है। प्रयागराज जिले में जब ऐसी समस्या आयी तो वहां के डीएम ने कई दुकानों को खोलने का आदेश दिया। हम भी गोरखपुर के डीएम साहब से गुजारिश करते हैं कि ऐसी दुकानों को खोलने का आदेश दें ताकि विदेशी मेहमान यहां की आबोहवा में जिंदा रह सकें।

शादाब के पास करीब 150 विदेशी परिंदे हैं। इनके बर्ड फर्म का नाम एवीजोना है। उन्होंने बताया कि उनके खानदान में परिंदे पालने का शौक करीब डेढ़ सौ सालों से चला आ रहा है। पिता हकीम मोहम्मद अहमद भी इसे अंजाम दिया करते थे। उनके बाद वह इस शौक को परवान चढ़ा रहे हैं। शहर में रजिस्टर्ड गोरखपुर बर्ड सोसाइटी है। जिसमें देश के 100 से अधिक पक्षी प्रेमी जुड़े हुए हैं। शहर में 50 से 60 लोग विदेशी परिंदे पालने के शौकीन हैं। पक्षी प्रेमी इन परिंदों की अपने बच्चों की तरह देखभाल करते है। सर्दी हो या गर्मी उनके लिए हर तरह की सहूलियत मुहैया कराते हैं।

उन्होंने ने बताया कि विदेशी परिंदों, बिल्ली व कुत्तों की साफ-सफाई व खाना पान पर काफी खर्चा होता है। यह बहुत महंगा शौक है। परिंदों व जानवरों की वैक्सीनेसन भी की जाती है। इन परिंदों व जानवरों की देखभाल के लिए खास ध्यान देना पड़ता है। अच्छी खासी रकम खर्च होती है। परिंदों पर दस से पन्द्रह हजार रूपए खर्च आता है। खुराक व दवाईयों का इंतजाम अलग से करना पड़ता है। एक खास बात और परिंदों को उनके वास्तविक परिवेश में रखने का खास इंतजाम किया जाता है। परिंदे खुश रहते हैं। ब्रीडिंग भी होती है। अंडों से बच्चे भी निकलते हैं। यह बहुत महंगे परिंदे होते हैं। इन्हें कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, राजस्थान आदि जगहों से मंगाया जाता है।

By सैयद फ़रहान अहमद

सिटी रिपोर्टर , गोरखपुर

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