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चमड़े का रेट गिरने से मदरसों का आर्थिक निज़ाम बिगड़ा

अवाम की पहल से अबकी मदरसे वालों को चमड़े के साथ मिली कुछ रकम भी

गोरखपुर। कुर्बानी के जानवर का चमड़ा (खाल) कभी मदरसों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का बड़ा जरिया हुआ करता था जो अब नहीं है। मदरसों वालों की माने तो मौजूदा सरकार की नीतियों की वजह से चमड़े की कीमत बेहद कम होती चली गई और यह केवल तीन से चार साल के अंदर हुआ है।

पहले जहां एक मदरसे की चमड़े से आमदनी डेढ़ से दो लाख हो जाया करती थी, अब महज 25 से 30 हजार रुपये के करीब पहुंच चुकी है जिस वजह से मदरसों का आर्थिक निज़ाम बिगड़ चुका है. इसी वजह से अबकी चमड़ा दफन करने की एक मुहिम भी चली थी। जो कारगर साबित न हो सकी. इस मुहिम में चमड़े के बदले मदरसों को बेहतर रकम देने की गुजारिश की गई थी. शरई नुक्ते नज़र से चमड़े को दफन करने को उलेमा ने गैर मुनासिब करार दिया. बाद में यह तय पाया गया कि चमड़े के साथ एक अच्छी रकम मदरसे को दी जाए. जो इस बार थोड़ी कारगर होती नज़र आई. अवाम ने मदरसे वालों को चमड़े के साथ सौ, पचास व दौ सौ रुपये भी दिए. जो आगे चलकर मदरसे वालों के लिए और भी कारगर साबित हो सकती है.

इस बार बकरे का चमड़ा 20 रुपये व बड़े जानवर का चमड़ा 70 रुपये में बिका. चमड़ा व्यापारी बड़े जानवर का चमड़ा लेने से इंकार कर रहे हैं. बहुत मान मनोव्वल के बाद लेने को तैयार हो रहे हैं. कई जगहों पर चमड़ा खराब हो गया तो उसे काटकर अपशिष्ट पदार्थों के साथ फेंका गया.

बताते चलें कि कुर्बानी के जरिए चमड़ा उद्योग को बड़ी मात्रा में एक साथ जानवरों की चमड़ा मिल जाता है और उनका कारोबार चलता रहता है। बड़े जानवरों का चमड़ा बकरे के चमड़े की अपेक्षा ज्यादा रेट पर बिकता है. चमड़ा यहां के लोकल व्यापारी खरीदते हैं. इसके बाद चमड़ा फैजाबाद, चौरीचौरा व कानपुर भेजा जाता है. बड़े जानवर का चमड़ा कोलकाता भेजा जाता है.

वर्ष 2017 में जब आर्थिक मंदी का दौर शुरु हुआ था तो उस वक्त बकरा का चमड़ा करीब 45 व बड़े जानवर का चमड़ा करीब 250 रुपये में बिका था वहीं 2018 में बकरे का चमड़ा 20 से 32 रुपये व बड़े जानवर का चमड़ा 150 से 300 रुपये में बिका था।

एक अनुमान के मुताबिक जिले में तीन दिनों के अंदर छोटा-बड़ा जानवर मिलाकर 45 हजार के ऊपर कुर्बानी होती है। इससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कभी लाखों रुपये की आमदनी कुर्बानी के चमड़े के जरिए हुआ करती थी।

मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के प्रधानाचार्य हाफिज नजरे आलम कादरी कहते हैं कि चमड़े की बिक्री से मदरसों का खर्च चलता है। इससे मदरसे में पढ़ने वाले बाहर के बच्चे दीनी तालीम हासिल करते हैं। चमड़ा व्यवसाय अधिकतर जगहों पर मदरसों के जरिए से हो रहा है। उनके मदरसे में वर्ष 2017 में कुर्बानी के तीन दिनों में बकरे का करीब 600 व बड़ें जानवर का करीब 250 के आस-पास चमड़ा जमा हुआ था। वहीं वर्ष 2018 में बकरे का करीब 765 व बड़े जानवर का करीब 219 चमड़ा मदरसे को मिला था।

तीन साल पहले जहां तीन से साढ़े तीन लाख की आमदनी हो जाया करती थी। अब महज 45 से 50 हजार रुपये के करीब रह गई है। अबकि बार कई लोगों ने चमड़े के साथ रकम भी दी है, जिससे मदरसा चलाने में कुछ मदद मिलेगी। बाकी जरुरत के लिए चंदा किया जायेगा। पिछली बार बकरे का चमड़ा 20-22 रुपये व बड़े जानवर का चमड़ा 140-150 रुपये में बिका था। अबकी बार भी रेट घटने की ही आशंका है।

मदरसा जियाउल उलूम पुराना गोरखपुर के प्रधानाचार्य मौलाना नूरुज्जमा मिस्बाही ने कहा कि कुर्बानी के जानवर के चमड़े, जकात व सदके से मदरसों के सालभर का खर्च चलता है। यही मदरसे की तरक्की का जरिया भी है। शरीयत में कुर्बानी के जानवर के चमड़े की राशि को गरीबों में बांटने या दीनी मदरसों की मदद करने का हुक्म है। ताकि मदरसों में तालीम हासिल करने वाले बच्चों के खानपान व मदरसे के दीगर खर्च पूरे हो सकें। अमूमन 90 फीसद लोग कुर्बानी का चमड़ा मदरसों में बतौर मदद देते हैं। इसी से ही मदरसे सालभर अपना खर्च चलाते हैं। पिछली बार बकरे का 850 व बड़े जानवर का 250 चमड़ा मदरसे में जमा हुआ था। बकरे का चमड़ा 32 व बड़े जानवर का चमड़ा 300 रुपये में बिका था। तीन साल पहले डेढ़ से दो लाख रुपया आमदनी होती थी। अब महज 25 से 30 हजार रुपया रह गई है।

अबकी अवाम ने नई पहल की है, चमड़े के साथ कुछ रकम भी दी है। जो आने वाले वक्त में और कारगर साबित हो सकती है। सरकार को भी चमड़ा व्यवसाय के लिए बेहतर योजनाएं बनानी चाहिए। इंटरनेशनल मार्केट में अब भी चमड़े की अच्छी डिमांड है।

जामिया रजविया मेराजुल उलूम चिलमापुर के प्रधानाचार्य मौलाना शौकत अली नूरी ने कहा कि सरकार की नीतियों से ही चमड़ा व्यवसाय चौपट हुआ है। जिसका सीधा असर मदरसों पर पड़ा है। चमड़े का रेट घटने से मदरसा चलाने वाले, मदरसे में पढ़ने वाले और मदरसे में पढ़ाने वाले तीनों पर असर पड़ा है। कुर्बानी के तीनों दिन मदरसे का पूरा अमला कुर्बानी का चमड़ा जमा करने में जुट जाता है। तीन साल पहले एक बेहतर रकम मिल जाया करती थी। आज चमड़े का का कोई पूछने वाला नहीं है। पिछली बार मदरसे को बकरे का करीब 400 व बड़े जानवर का करीब 75 चमड़ा मिला था। वहीं बकरे का चमड़ा 20-30 रुपये व बड़े जानवर का 150-300 रुपये में बिका था। सरकार की नीतियां बेहतर हो जाएं तो चमड़ा व्यवसाय में काफी सुधार हो सकता है

मुफ्ती मो. अजहर शम्सी कहते हैं कि कुर्बानी का चमड़ा मदरसों के लिए आमदनी का जरिया है। उन्होंने बताया कि जिले में करीब 300 मदरसे हैं। जिनमें करीब 288 पंजीकृत हैं। इनमें मात्र 10 को सरकारी अनुदान मिलता हैं। उलेमाओं की माने तो सभी मदरसों का दारोमदार कुर्बानी के चमड़े, ईद-उल-फित्र के सदका-ए-फित्र व जकात पर है, हालांकि कुछ लोग दीगर तरीके से भी मदरसों की मदद करते हैं।

मुफ्ती अख्तर हुसैन ने बताया कि रमज़ान में जकात और ईद-उल-अजहा में कुर्बानी के चमड़े से मिलने वाली रकम से मदरसा छात्र-छात्राओं की किफालत (पालन पोषण) में मदद होती है। ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी के बाद सभी मुसलमान इन चमड़ों को मदरसों को चंदे के तौर पर अदा करते है। चमड़े का रेट गिर जाना बहुत ही सोचनीय है। मदरसों पर इसका काफी बुरा असर पड़ा है। मदरसों में आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है।

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