Friday, January 27, 2023
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वरिष्ठ पत्रकार के एम अग्रवाल के उपन्यास ‘प्रोफेसर रामनाथ’ का लोकार्पण

गोरखपुर। आजकल रचनाओं के समक्ष पठनीयता का घनघोर संकट है, मगर के एम अग्रवाल का उपन्यास ‘ प्रोफेसर रामनाथ’ खुद को पढ़वा लेने में सक्षम है। हालांकि उपन्यास के कई पात्रों में विकास की जो संभावनाएं थीं वो पूरी नहीं हो पायी हैं।

ये बातें आलोचक एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने कही।  प्रो. राय रविवार को प्रेमचंद पार्क में वरिष्ठ पत्रकार के एम अग्रवाल के उपन्यास ‘प्रोफेसर रामनाथ’ के लोकार्पण अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। या आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच ने मिलकर किया था।

प्रो अनिल राय ने कहा कि किताबों के लोकार्पण के अवसर पर अक्सर लोग यही कहते हुए सुने जाते हैं कि इस मौके पर लेखक की कृति की आलोचना करने का नहीं, बल्कि लेखक को सराहने का है। यह विचार कहीं से भी उचित नहीं है। कृति पहली हो या दूसरी यदि लेखक ने उपन्यास जैसी विधा में अभिव्यक्ति की चुनौती स्वीकार की है तो उपन्यास के विषय से लेकर रूप, उपन्यासिक ढांचे आदि की चर्चा सम्यक रूप से होनी चाहिए।

अध्यक्षता कर रहे प्रो. अनंत मिश्र ने बहुत ही चुटीले अंदाज में कहा कि आदमी अपनी चेतना का ही गुणनफल होता है। इस उपन्यास में प्रोफेसर रामनाथ के जीवन के ढेर सारे पेंच खुलते नहीं दिख रहे हैं।

कवि/गीतकार वीरेंद्र मिश्र दीपक ने महराजगंज निवासी लेखक की रचनाधर्मिता और उनके सामाजिक -सांस्कृतिक सरोकारों से उपस्थित समुदाय को अवगत कराया।
उपन्यास पर बातचीत की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ कवि प्रमोद कुमार ने अपने संबोधन में उपन्यास लेखन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि इस संग्रह में जिस तरह घटनाओं का चित्रण किया गया है, वे रिपोर्टिंग की तरह ही हैं। जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह ने इस उपन्यास को विवरणात्मक करार दिया और कहा कि लेखक की अनुभूति का दायरा बहुत व्यापक है लेकिन उपन्यास उसके अनुरूप उभर नहीं सका है।

कथाकार रवि राय ने कहा कि जिस तरह डूबकर केएम अग्रवाल ने तथ्यों को बड़ी ही सादगी से देशकाल के हिसाब से जोड़ा है, वह अद्भुत है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने कहा कि स्मृतिविलोप के इस दौर में जिस तरह से सन 1947 से लेकर 2022 तक की घटनाओं को जोड़ा गया है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। जनवादी लेखक संघ, गोरखपुर के अध्यक्ष जेपी मल्ल ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए उसमें तथ्यगत कमियों की ओर सबका ध्यान खींचा।

वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी कृति के लोकार्पण के समय विचारकों को उसके चीर-फाड़ से बचना चाहिए। अपने संबोधन में वरिष्ठ सुख्यात भोजपुरी साहित्यकार रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी जी ने कहा कि इस कृति को पढ़कर मुझे यही महसूस हुआ कि यह ठेठ बांसगांव की किताब है। महानगर के वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि यह यथार्थपरक कृति है लेकिन इसमें घटनाओं की गहराई में नहीं जाया गया है।  उन्होंने कहा कि कि श्री अग्रवाल की इस कृति में मध्यवर्गीय विचार की झलक दिख रही है।
डा. वेद प्रकाश पांडेय ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी लेखक की कृति की मीमांसा कलात्मक अनुभूति के साथ ही की जानी चाहिए। उन्होंने उपन्यास को महराजगंज जनपद का प्रथम उपन्यास के बतौर रेखांकित करते हुए कहा कि आलोचना रचनाकार के लिए खाद-पानी का काम करती है।

कार्यक्रम के अंत में प्रगतिशील लेखक संघ, गोरखपुर के महासचिव भरत शर्मा ने आगत लेखक-साहित्यकारों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर साहित्यकार /पत्रकार अरुण आदित्य, इप्टा के डा. मुमताज खान, अरुण ब्रह्मचारी, चेतना पांडेय, डा. आनंद पांडेय, भोजपुरी संगम के संयोजक कुमार अभिनीत, कवि निखिल पांडेय, वरिष्ठ कवि अकिंचन, आनंद पांडेय, बैजनाथ मिश्र उपस्थित थे।

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