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राप्ती नदी के प्रवाह को बदलने की योजना राप्ती नदी की हत्या की योजना है-राजेन्द्र सिंह

गंगा पहले से और प्रदूषित हुई, प्रदेश सरकार ने नदियों, जलाशयों के सीमांकन, चिन्हीकरण का कार्य नहीं किया
कोई भी राजनीतिक दल पर्यावरण के सवालों पर गंभीर नहीं
पानी का निजीकरण और बाजारीकरण नहीं सामुदायीकरण होना चाहिए
देश में जल संकट बढ़ रह है लेकिन सरकारों को चिंता नहीं

गोरखपुर। मशहूर पर्यावरणविद् एवं जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कार्य करने के नाते जल पुरूष के नाम से विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह ने कहा कि राप्ती नदी के प्रवाह को बदलने की योजना राप्ती नदी की हत्या की योजना है। इसके सिर्फ और सिर्फ दुष्परिणाम सामने आएंगे। नदी पर राज्य, समाज और संत यानि नदी को बनाने वाली प्रकृति का साझा अधिकार है। नदी के दोनों तटों पर रहने वाले समाज की सहमति के बिना नदी के प्रवाह में दखल देना पर्यावरण की दृष्टि से गलत तो है ही, संवैधानिक व कानूनी रूप से भी गलत है। श्री सिंह ने पर्यावरण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों को संवेदनशील नहीं होने का आरोप लगाया और कहा कि मां गंगा के बेटे का दावा करने वाले नरेन्द्र मोदी के राज में गंगा और प्रदूषित हुई है और नमामि गंगे जैसे योजना सिर्फ सुन्दरीकरण का कार्य कर रही हैं न कि गंगा को निर्मल व अविरल बनाने का। विकास के नाम पर नदियों को बर्बाद किया जा रहा है।

 

श्री सिंह ने यह बातें बेलीपार क्षेत्र के करंजही गांव में आयोजित राप्ती नदी पंचायत और बाद में गोरखपुर प्रेस क्लब में आयोजित जन संवाद कार्यक्रम में कही। श्री सिंह राप्ती नदी की धारा मोड़ने से प्रभावित ग्रामीणों के संगठन ‘ नदी बचाओ-गांव बचाओ संघर्ष समिति ‘ और ‘ पूर्वांचल नदी मंच ‘ के आमंत्रण पर आए हुए थे।

करंजही गांव में राप्ती नदी के तट पर नदी पंचायत

जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने करंजही गांव में नदी बचाओ-गांव बचाओ संघर्ष समिति द्वारा आयोजित नदी पंचायत में कहा कि कहा कि भारत का संविधान नदी के साथ छेड़छाड़ की इजाजत नहीं देता है। राज्य का कर्तव्य है कि वह जल संसाधान के साथ जीने वाले समाज पर किसी भी प्रकार का दुष्परिणाम न होने दे। बिना पर्यावरणीय समझ के नदी की धारा को मोड़ने से गहरे संकट उत्पन्न होते हैं। नदी की धारा को मोड़ना नदी के साथ भ्रष्टाचार जोड़ने की योजना है।

 

उन्होंने कहा कि राप्ती नदी आजादी के साथ बह रही है। उसकी आजादी में दखल देने को किसी को अधिकार नहीं है। सरकार कह रही है कि वह बाढ़ मुक्ति के लिए यह योजना ला रही है जो सरासर गलत है क्योंकि यहां पर नदी सात मीटर गहरे में बह रही है। सात मीटर गहरे में बहने वाली नदी की धारा को बदलने से बाढ़ की विकरालता और बढ़ेगी, बाढ़ मुक्ति का तो कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा कि नदी की धारा मोड़ने से नदी की कटान भी बढ़ेगी।

 

जल पुरूष ने जार्डन में जार्डन नदी को मोड़ने का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे फिलीस्तीन में पानी का भारी संकट खड़ा हो गया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। 19वीं और 20वीं शताब्दी में नदियों के डाइवर्जन के जितने भी प्रयोग हुए हैं उसके घातक दुष्परिणाम सामने आए हैं और यह समाज के लिए शुभ नहीं रहा है। नदी की धारा में अवरोध करना नदी की हत्या के समान है। यह विकास के नाम पर विनाश की योजना है।

श्री सिंह ने कहा कि इस तरह का अनर्थ जहां भी हुआ है, वह इलाका बेपानी हो गया है। नदी के पेट में पानी होता है तो वह भूजल का रिजार्ज करती है। नदी के डाइवर्जन से भूजल के रिजार्च करने की प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। नदी की प्राकृतिक बहाव को अवरूद्ध करने से सूखा और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

उन्होने ग्रामीणों से राप्ती संसद गठित कर उसकी अगुवाई में आंदोलन करने का आह्वान किया और कहा कि राप्ती नदी की शुभ के लिए वह ग्रामीणों के आंदोलन के साथ हैं।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर राधेमोहन मिश्र ने कहा कि वे स्थानीय जनता के साथ हैं और हर लड़ाई में हमेशा मौजूद रहेंगे। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में ले जा रहे हैं। वे एनजीटी द्वारा गठित मानिटरिंग कमेटी के सामने भी इस मामले को रखेंगे. उन्होंने कहा कि यह योजना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है।

जल जन जोड़ो अभियान बुन्देलखंड के संजय सिंह ने कहा कि नदियों के स्वरुप में परिवर्तन विकास के नाम पर विनाश का आमंत्रण है। इसके खिलाफ खड़ा होना हमारी नागरिक जिम्मेदारी है।

आमी बचाओ मंच के अध्यक्ष विश्व विजय सिंह ने कहा की धारा मोड़ने के लिये आई मशीनों के हटा लेने भर से जनता शासन के झांसे में आने वाली नहीं है। पूरी योजना निरस्त हुए बिना यह आन्दोलन रुकने वाला नहीं है।

बुन्देलखंड से आये जल जन जोड़ो अभियान के संजय सिंह

बासगांव के पूर्व ब्लाक प्रमुख चतुर्भुजा सिंह ने इस योजना को सरकार का अदूरदर्शी और तुगलकी कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह आन्दोलन अब दो चार गांवों का नहीं है, अब इसमें जिले भर को जोड़कर और व्यापक बनाया जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि इस विनाशकारी योजना की किसी ने मांग नहीं की थी। इसे ऊपर थोपा गया हैं। इस योजना के लिए ग्रामीणों से न कोई बात की गई न जनसुनवाई का आयोजन किया गया। उन्होंने इस योजना कओ गोपनीय बनाये रखने पर सवाल उठाया. उन्होंने राप्ती नदी में पानी की हो रही कमी की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि प्रदेश सरकार इसकी चिंता किए बगैर नदी की धारा को बदलकर राप्ती को सुखा देने की तरफ बढ़ रही है।

नदी बचाओ-गांव बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष पूर्व प्रधान ओम प्रकाश शुक्ल ने कहा कि यह इलाके के जीवन मरण और अस्तित्व बचाने की लड़ाई है जिसमें यहां का बच्चा बच्चा हर कुर्बानी देने को तैयार है।

महापंचायत में नागरिक मोर्चा के अध्यक्ष राजन शाही, असपा के राजन सिंह, बेला के प्रधान वृजेश सिंह, समाजिक कार्यकर्ता मारकन्डेय मणि, इंकलाबी नौजवान सभा के नेता सुजीत श्रीवास्तव, देवेन्द्र निषाद महरा, बुद्धि सागर शुक्ल, पूर्व प्रधान वृजवल्लभ सिंह, वीरेंद्र दूबे आदि ने विचार व्यक्त किया जबकि सुरेन्द्र दूबे, हाकिम ओझा, अनिल तिवारी, ट्विंकल पति त्रिपाठी, घनश्याम विश्वकर्मा, राम प्रसाद निषाद, माधो पासवान, सुदर्शन चौहान (सभी पूर्व प्रधान), कृष्ण मोहन शुक्ल, राघवेन्द्र शुक्ल, सोमनाथ शुक्ल, सर्वेश शुक्ल, राहुल यादव, शिव दूबे, रामकिशुन चैहान, बबलू गुप्ता, अजय तिवारी, श्यामू तिवारी, चिंटू यादव, दिलीप यादव, सन्तोष सिंह, वृजेश निषाद व रजनीश निषाद, अशर्फी आदि समेत कड़जही, अइमा, कतरारी, नवापार, बिलरहा, उंचगांव, बेला के अतिरिक्त सेनुआपार, बेनुआटीकर, बरईपार, भस्मा, भिटहा, कटया, बेलीपार, भीटी, घनसही, बिस्टौली, कसिहार, मलांव आदि गांवों के लोग बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। महा पंचायत का संचालन पूर्वांचल नदी मंच के आलोक शुक्ल ने किया.

महापंचायत में राप्ती संसद गठित करने का फैसला

महापंचायत में आन्दोलन जारी रखने और इसे गांव से लेकर जिला मुख्यालय तक ले जाने का निर्णय हुआ। तय किया गया कि राप्ती को बचाने के लिये गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर राधे मोहन मिश्र के संरक्षण में राप्ती संसद गठित किया जाएगा जिसमें राप्ती तट के निवासियों और पर्यावरण विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। महापंचायत में आये ग्रामीणों ने एक स्वर से कहा कि नदी के स्वरुप से कोई छेड़छाड़ किसी भी सूरत में वर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पंचायत में पहुंचे तहसीलदार बासगांव ने मशीनों के हटाये जाने की जानकारी दी और कहा कि ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए फ़िलहाल इस योजना का काम रोक दिया गया है. एक उच्च स्तरीय कमिटी इस पर विचार कर रही है. इस पर  ग्रामीणों ने योजना को पूरी तरह निरस्त करने की मांग की।

जन संवाद कार्यक्रम

गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में पूर्वांचल नदी मंच द्वरा ‘ पर्यावरण, नदी और जल संरक्षण ’ पर आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने कहा कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र को देखा है। कोई भी राजनीतिक दल पर्यावरण के मुद्दों के प्रति गंभीर नहीं हैं। राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में सिर्फ भरमाने वाले शब्द लिखे हैं। इसलिए हमने जल जन जोड़ो अभियान एवं जल विरादरी द्वारा भारत की जनता की तरफ से चुनाव घोषणा पत्र जारी किया है।

श्री सिंह ने कहा कि आज देश के 362 से अधिक जिले सूखे से प्रभावित हैं। 16 राज्यों में जल संकट की समस्या गहराती जा रही है। देश की 90 फीसदी छोटी नदियां या तो सूख गईं हैं या सिर्फ बरासात के दौरान ही उनमें पानी रहता है। नदियां गंदे नाले में तब्दील हो रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमाम वादों और नमामि गंगे योजना के बावजूद गंगा नदी और अधिक प्रदूषित हुई हैं। गंगा की निर्मलता और अविरलता की अनदेखी कर सिर्फ सुन्दरीकरण की बातें की जा रही हैं। गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए सत्याग्रह कर रहे तीन संतों की जान चली गई। एक संत को गायब कर दिया गया और एक संत 180 दिन से अनशन कर रहे हैं लेकिन उनकी गुहार सुनी नहीं जा रही है।

उन्होंने कहा कि वर्षा के दिन घट रहे हैं और सतही जल भडार में कमी आ रही है। आने वाले दिन में जल संकट बढने वाला है। देश के पहाड़ी राज्य भी बेपानी हो रहे हैं।

श्री सिंह ने कहा कि भारत का संविधान कहता है कि नदियों, जलाशयों पर न तो कब्जा किया जा सकता है, न अतिक्रमण किया जा सका है और न उसकी स्थिति बदली जा सकती है लेकिन आज सभी नदियां व जलाशय अवैध कब्जा, प्रदूषण और जल शोषण की शिकार हो रही हैं। मैने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से दो बार मिलकर प्रदेश की सभी नदियों, जलाशयों, तालाबों के चिन्हीकरण, सीमांकन और उन्हेे नोटिफाइड करने का अनुरोध किया लेकिन किसी भी जिले में यह कार्य नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकारें और राजनेता नदियों, जलाशयों के मुद्दे पर गंभीर नहीं हुए तो उन्हें जनता के क्रोध का सामना करना पड़ेगा क्योंकि जनता जाग गई है।

उन्होंने पत्रकारों और कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि पानी का निजीकरण और बाजारीकरण आज का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। आज आरओ प्लांट से 60 फीसदी पानी प्रदूषित और 40 फीसदी पानी बर्बाद हो रहा है। भूजल रिजार्च नहीं हो रहा है और भूजल भंडार कम होता जा रहा है। बडी कम्पनियां पानी पर हमारे अधिकार को छीन नहीं हैं। पानी का निजीकरण और बाजारीकरण नहीं सामुदायीकरण होना चाहिए।

इस अवसर पर पूर्वांचल नदी मंच के संयोजक पूर्व कुलपति प्रो राधे मोहन मिश्र, आमी बचाओ मंच के अध्यक्ष विश्व विजय सिंह, बुंदेलखंड से आए जल जन जोड़ो अभियान के संजय सिंह मौजूद थे। जन संवाद का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने किया.

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