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आठवीं मुहर्रम पर निकला लठिया सलार का जुलूस, गेहूं की ताजिया की आज से होगी जियारत

गेंहूं की ताजिया

गोरखपुर। आठवीं मुहर्रम को बिंद टोला, पहाड़पुर, इस्माईलपुर, तुर्कमानपुर, पुर्दिलपुर, कोतवाली रोड, अंबेडकर नगर, सूरजकुंड, बहरामपुर से जुलूस निकला।

पहाड़पुर, तुर्कमानपुर से निकलने वाले लठिया सलार के जुलूस की परम्परा रही है यहां से समीर की मेंहदी के साथ ही बांस पीटते हुए नौजवान निकले। जुलूस को देखने वालों का तांता लगा रहा। लठिया सलार का जुलूस जैसे ही सड़क पर आया, बांस और लठियों की तड़तड़ाहट गूंजने लगी। यह तड़तड़ाहट ही यह बताने के लिए काफी थी कि लाठिया सलार का जुलूस सड़क पर आ गया है। लोग पूरी रात सड़कों पर जमे रहे।

जगह-जगह अकीदतमंदों में शर्बत, पानी, खिचड़ा, बिरयानी व जर्दा बांटा गया। मदरसा जियाउल उलूम पुराना गोरखपुर में कुरआन ख्वानी हुई और दास्ताने कर्बला बयान हुई। रात में बसंतपुर स्थित आगा मुख्तार हुसैन के आवास से दुलदुल का मातमी जुलूस निकाला गया। यह जुलूस बसंतपुर, हाल्सीगंज, उर्दू बाजार, घण्टाघर, रेती चौक होता हुआ गीता प्रेस रोड स्थित इमामबाड़ा आगा साहेबान पर खत्म हुआ।

जुलूस में हजरत इमाम हुसैन की सवारी जुलजेनाह (दुलदुल) तो थी ही, अंजुमन हुसैनिया के मातमदारों ने नौहा ख्वानी, सीनाजनी व मातम भी किया। मुर्हरम की आठवीं तारीख को मियां साहब ने परम्परागत तरीके से गश्त किया।

नौवीं मुहर्रम के कार्यक्रम

सोमवार को रात करीब 9:30 से मियां साहब इमामबाड़ा इस्टेट से शाही जुलूस निकलेगा। इसके अलावा हुमायूंपुर, गोरखनाथ, बक्शीपुर, घंटाघर, बहरामपुर, सुमेर सागर, बनकटी चक, सिविल लाइन, घोषीपुरवा, बिछिया (17 जुलूस), चक्शा हुसैन, रेलवे बौलिया कालोनी सहित करीब 85 जुलूस निकलेंगे। गोलघर में लाइन की ताजिया का जुलूस सभी के आकर्षण का केंद्र होगा।

शाम को ही इमाम चौकों पर छोटी-बड़ी ताजिया रख दी जायेंगी। हजरत सैयदना इमाम हुसैन व शोह-दाए-कर्बला के इसाले सवाब के लिए नियाज-फातिहा घरों, मस्जिदों व इमाम चौकों पर होंगी। शर्बत, खिचड़ा व मलीदा पर विशेष फातिहा दिलायी जायेगी। वहीं तंजीम कारवाने अहले सुन्नत की ओर से तुर्कमानपुर रशीद मंजिल के मैदान में शाम 6:16 बजे सामूहिक रोजा इफ्तार होगा।

गेहूं की ताजिया की आज से होगी जियारत

नाजिया इमामबाड़ा साहबगंज में तीसरी मुहर्रम से बन रही गेहूं की ताजिया मुकम्मल हो गई है। सोमवार (नौवीं मुहर्रम) को शाम 6:30 बजे से इस ताजिया की जियारत की जा सकती है। इस ताजिया के निमार्ण में करीब पच्चीस किलोग्राम गेहूं के दानों का प्रयोग किया गया है।

गेहूं की ताजिया कारीगरी और विज्ञान का उम्दा नमूना है। सैकड़ों सालों से इस गेहूं की ताजिया का निमार्ण तीसरी मुहर्रम से किया जाता है। नौवीं मुहर्रम को जियारत करवायी जाती है। ताजिया साढ़े पांच फीट ऊंची है। इस इमामबाड़ा के मुतवल्ली हाजी जान मोहम्मद ने बताया कि गेहूं की ताजिया के निर्माण में बांस का एक ढांचा तैयार किया जाता है, फिर बांस पर कपड़ा चढ़ाया जाता है, उसके बाद गेहूं के दानों को एक खास पदार्थ से सेट किया जाता है, तत्पश्चात् हरे रंग का कपड़ा चढ़ाया जाता है। हर दो घंटे में इस ताजिया को पानी व लोहबान का धुंआ दिया जाता है।

जहां अन्य ताजियों को बनाने में काफी समय लगता है वहीं यह ताजिया महज पांच दिनों में जियारत के लिए मुकम्मल हो जाती है। एक बात और काबिले गौर है कि इसमें मिट्टी का प्रयोग नहीं किया जाता है। सैकड़ों वर्षों से बन रही यह यह ताजिया हिंदू-मुस्लिम एकता का केंद्र है। यहां बराबर इमाम हुसैन उनके जानिंसारों के इसाले सवाब के लिए फातिहा ख्वानी होती रहती है। इस ताजिया को मुहर्रम की दसवीं तारीख को राप्ती नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसे लोग इको फ्रेंडली ताजिया भी कहते है।

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