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सिनेमा हर तरह के विषयों को जनता के बीच रखने का सबसे अच्छा माध्यम है। हमारे देश में हर वर्ष  करीब 1800 फिल्में बनती हैं। इनमें से ज़्यादा फिल्में  हिंदी भाषा में होती है। इसीलिए जब विदेश में लोग भारत की फिल्मों का जिक्र करते हैं तो ज़्यादातर  बॉलीवुड में बने वाली फिल्मों की बात होती है लेकिन देश के विभिन हिस्सों में बनने वाली रीजनल सिनेमा की देश के स्तर पर उतनी बात नहीं होती। हालांकि कई बार यही फिल्में देश का नाम रोशन करती है जब उन्हें राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए चुना जाता है।

ऐसी ही एक फिल्म के बारे में मैं यहाँ बात करने जा रहा हूँ। यह फिल्म मलयालम भाषा की छोटे बजट की फिल्म है | फिल्म का नाम है ‘ नजन  प्रकाशन ‘ और  इसे सथ्यन अँठिकड़ ने बनाया है।  यह वर्ष 2018 में रिलीज़ हुई थी। यह फिल्म कुछ कार्यों के प्रति हमारे मन में बैठी हीन भावना को सामने लाती है।

फिल्म का नायक प्रकशन एक स्कूल के अधयापक का पुत्र है। वह डॉक्टर बनाना चाहता है, लेकिन ख़राब अंक पाने  के कारण उसका मेडिकल में दाखिला नहीं मिलता है। उसे नर्सिंग की डिग्री से संतोष करना पड़ता है। प्रकाशन के पिता की मृत्यु हो चुकी है। उसकी माँ और और उसका बड़ा भाई घर के सारे काम करते हैं।  लेकिन जब भी वह प्रकाशन से कोई नौकरी करने को कहते हैं, तो वह कहता है कि इस देश में नर्स की कोई इज़्ज़त नहीं करता। इसीलिए मैं ऐसी नौकरी नहीं करूँगा| इस हीन भावना के कारण वह कोई काम नहीं करता है। साथ ही वह अपने नाम से इतना चिढ़ने लगता है कि वह नाम  बदल कर प. र. आकाश कर लेता है क्योंकि वह मनाता है कि इस नाम के कारण ही उसको इज्जत नहीं मिल रही है।

प्रकाशन की ज़िंदगी अचानक तब एक मोड लेती है जब उसके घर उसकी एक पुरानी दोस्त उससे मिलाने आती है।  प्रकाशन इस लड़की से तब अलग हो गया था जब उसको पता लगा की इस लड़की के पास बिलकुल धन- दौलत नहीं  है। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। लड़की के पास जर्मनी में नर्स की जॉब है और वह जर्मनी जाने से पहले प्रकाशन से मिलने आयी है। प्रकाशन का दिमाग अब इस बात में लग जाता है की वह किसी तरह इस लड़की से शादी कर ले और जर्मनी चला जाए। पर असल बात यह रहती है कि उस लड़की के पास जर्मनी जाने के लिए पैसा नहीं रहता है।  इसीलिए वह प्रकाशन की मदद लेकर पैसा इकट्ठा करती है और उसको वादा करती है वह अगली बार जब भारत आ गई तो वह उससे शादी करेगी। प्रकाशन उसका इंतज़ार करता रहा लेकिन वह नहीं आयी और उसने एक जर्मन नागरिक से शादी कर ली | इससे प्रकाशन की पूरी दुनिया पलट जाती है। उसने पैसे एकत्र करने के लिए बहुत गलत काम किये थे। इसी सिलसिले में उसने  एक कांट्रेक्टर गोपालजी से क़र्ज़ लिया था। जब वह कर्ज चुका नहीं पाता  तो काम करने लगता है ताकि वह उनके पैसे वापस कर सके।

प्रकाशन की ज़िंदगी का हर मकसद खत्म हो जाता है। इसी हताशा के बीच उसको नर्सिंग की का एक काम मिलता है। उसमें बस उसको एक लड़की की देख भाल करनी रहती है जिसके बदले में उसको अच्छा पैसा और रहने की जगह मिलती है। बस उसकी एक ही प्रॉब्लम रहती है कि जिस लड़की की उसको देख भाल करनी है, वह किसी को घर में रहने नहीं देती है। वह प्रकाशन को भी भगाने की कोशिश करती है लेकिन प्रकाशन की लगन देख कर वह प्रभावित हो जाती है। उसकी देख भाल करते हुए प्रकाशन को यह एहसास होता है कि नर्सिंग एक पुण्य का काम है।  लेकिन उसकी यह खुशी ज़्यादा दिन नहीं रहती क्योंकि उस लड़की की दिमागी बीमारी से अंततः मृत्यु हो जाती है। प्रकाशन लड़की की मौत से बहुत दुखी होता है। वह उस दिन प्रण करता है कि अब वह लोगों की मन लगा कर सेवा करेगा। अंत में वह एक अस्पताल में नौकरी करने लगता है जहां उसके अच्छे व्यवहार और प्रेम के कारण लोग उससे बहुत खुश रहते हैं।

यह फिल्म मुझे इसलिए दूसरी फिल्मों से अलग लगी क्योंकि यह हमारे समाज पर सवाल उठती है कि वह क्यों कुछ ही कार्यों को महतवपूर्ण मानती है और बहुत से कार्यों को हीन मानती है। अक्सर हम लोगों का महत्व धान-दौलत से जोड़ कर देखते हैं। फिल्म में फहाद फॉसिल ने प्रकाशन की भूमिका अदा की है। देश की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड की अधिकतर फिल्में हमारे जीवन के सवालों से कटी रहती हैं लेकिन इसी समय मलयालम सिनेमा समाज के सवालों , अंतर्विरोधों , जटिलताओं से टकरा रहा है। इसका एक सुन्दर उदाहरण है फिल्म ‘ नजन  प्रकाशन ‘।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी के छात्र हैं और कैम्पस पत्रिका ‘ Campus Zephyr ’ से जुड़े हैं)

By दिव्यल भूषण गुप्ता

लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी के छात्र हैं और कैम्पस पत्रिका ‘ Campus Zephyr ’ से जुड़े हैं

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