विचार

कपड़े में अटका ‘ ईमान ’

नासिरुद्दीन, वरिष्ठ पत्रकार

एक फोटो है. फोटो में एक नौजवान लड़का और लड़की हैं. दोनों सज-धज कर बैठे हैं. साथ में उनकी छोटी सी बेटी है. आम आंखों को इस तस्वीर में दिलकश जोड़ी दिख रही है. एक नन्हीं प्यारी सी बच्ची दिख रही है.

लेकिन, कुछ खास लोगों की खास आंखों को सिर्फ लड़की का खुला चेहरा, उसकी बांहें, उसका गला, उसके कपड़े दिखने लगे …और वे उसकी जिंदगी के मालिक बन गये. लगे नसीहत देने. धर्म की दुहाई देने लगे. कपड़े का सही नाप बताने लगे. क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं पहनना चाहिए- यह समझाने लगे. जहन्नम की आग का खौफ दिखा कर डराने लगे. और हां, ये सब किसी बंद कमरे में नहीं हो रहा था. ‘पुख्ता ईमान वाले’ ये सब दुनिया के सामने कर रहे थे.

जिस फोटो की बात हो रही है, वह भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी, उनकी पत्नी और बेटी की है. शमी ने यह फोटो चंद रोज पहले फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर अपने चाहनेवालों के बीच साझा किया. उन्हें क्या पता था कि उनके ‘खूबसूरत पल’, कई लोगों का ईमान ही खतरे में डाल देगा. नतीजतन, इसे देखने के बाद कुछ लोग ‘ईमान’ का डंडा लेकर खड़े हो गये. मुमकिन है, हम में से अनेक लोगों ने अब तक वे नसीहतें देख ली हों. फिर भी, ईमान वालों की तरफ से शमी को जो कहा गया, उसका लब्बोलुवाब यह है-

‘मुसलमान हो; अल्लाह से डरो; इसलाम को बदनाम न करो; बीवी इसलामिक सभ्यता से भटकी हुई है…; वह घर की जीनत है, उसे पर्दे में रखना चाहिए; औरत को किस तरह रखना चाहिए, आपको पता होना चाहिए; मुसलमान होने के नाते बीवी को पर्दे में रखें; लगता है तुम्हारे घर में कपड़ों की कमी है; हिजाब पहनायें; बीवी को नुमाइश बना रहे हैं; शर्म करो; आपकी बीवी ने ठीक से कपड़े क्यों नहीं पहने हैं; देह दिख रही है; बुर्का में रखें; सब लालची निगाह से देख रहे हैं; पर्दे की चीज पर्दे में अच्छी लगती है; आप हराम काम कर रहे हैं; यह इसलामी ड्रेस नहीं है; बीवी को कैसे रखा जाता है, सीखो… वगैरह-वगैरह.’

अब हम कल्पना करें कि अगर हममें से किसी शख्स को सिर्फ एक फोटो या कपड़ा या किसी बात की वजह से इतनी सारी दुहाइयों का सामना करना पड़े, तो हमारी क्या हालत होगी.

मोहम्मद शमी ने इन ‘ईमान वालों’ का सामना किया. शमी ने कहा, ये दोनों मेरी जिंदगी और लाइफ पार्टनर हैं. मैं अच्छी तरह जानता हूं कि क्या करना है, क्या नहीं करना है. हमें अपने अंदर देखना चाहिए, हम कितने अच्छे हैं.’ मगर सवाल यह नहीं है कि शमी ने कितनी बहादुरी के साथ इस हमले का सामना किया है. सवाल इससे बड़ा है. कल सानिया मिर्जा थी. आज शमी हैं. कल कोई और हो जायेगा. सवाल जहनियत का है. इसलिए इस मर्दाना जहनियत को जानना और समझना जरूरी है.

यह मर्दाना जहनियत, स्त्री को मर्द के बराबर का इंसान ही नहीं मानती है. इसलिए इसे माननेवाले, स्त्री को ‘चीज’ मानते हैं. उसे निजी जायदाद समझते हैं. उसे काबू में रखना चाहते हैं. इसलिए वे उसे सात पर्दे में छिपा कर रखने के हिमायती हैं. वे उसे दुनिया की नजरों से कितना बचाना चाहते हैं, पता नहीं. मगर इतना तय है कि वे उसे सिर्फ अपने इस्तेमाल के सामान से ज्यादा नहीं समझते हैं.

उस पर काबू रखना चाहते हैं. यह सब करने के लिए, वे नाम भले ही मजहब का लेते हों, पर इनका नजरिया ही मर्दाना है.जब हम स्त्री को सिर्फ गोश्त का टुकड़ा मानेंगे, तो उसका जिस्म ही दिखेगा. उसकी ड्रेस का महज चौड़ा गला दिखेगा. कपड़ा और उसे पहननेवाला नहीं, बल्कि स्लीवलेस पहनी सिर्फ बांह दिखायी देगी. यह खोट न तो उस कपड़े का है, न ही उसे पहननेवाले का है. यह खोट उस शख्स का है, जिसकी आंखें स्त्री को बस इसी रूप में देख पाती हैं. इसीलिए ऐसे मर्दों को वे ‘चॉकलेट’ नजर आने लगती हैं.

इनकी कल्पना से परे है कि शमी की पत्नी भी जीती-जागती बराबर की इंसान है. उसकी अपनी एक शख्सीयत है. इनकी सोच में इसकी जगह नहीं है कि वह भी अपने तरीके से जी सकती है. अपनी मर्जी के पहन और ओढ़ सकती है.

शमी और उसकी पत्नी के पीछे पड़े लोग न तो मजहब समझते हैं और न ही मजहब के माननेवालों को. दुनियाभर के मुसलमान न तो एक जैसा सोचते हैं, न ही एक जैसा पहनते और खाते-पीते हैं. हमारे मुल्क में ही अलग-अलग जगह रहनेवाले मुसलमानों की तहजीब एक जैसी नहीं है. टोपियां एक जैसी नहीं हैं. मजहब के नाम पर तहजीब को एक जैसा करने की कोशिश, एक बड़ा सोचा-समझा खतरनाक विचार है.

जैसा कि हमें खबरों से पता चलता है कि शमी की पार्टनर का नाम हसीन जहां है. जब कोई तसवीर देखता है, तो उसका मुस्कुराता पुरसुकून चेहरा दिखाई देता है. वह तस्वीर देखनेवाले हर शख्स की आंखों में आंखें डाल कर देखती नजर आती है.

कितनी है, पता नहीं पर आत्मविश्वास से लबरेज दिखती है. आत्मविश्वास से लबरेज आंखों में आंखें डाल कर देखनेवाली लड़कियां, अब भी ज्यादातर मर्दों को अच्छी नहीं लगती हैं. वे बराबर होने का एहसास कराती हैं. चूंकि वे काबू में नहीं दिखतीं, इसलिए ऐसे मर्दों को ऐसी लड़कियों से डर भी लगता है. उन्हें तो डरी-सहमी, सकुचाई सी लड़कियां अच्छी लगती हैं. लेकिन, जो डराता है, वह मर्द तो हो सकता है, पर इंसान नहीं.

हालांकि, ऐसे डरानेवाले लोग अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए जब धर्म का हवाला देने लगते हैं, तो बहुत सारी आवाज खुल कर सामने नहीं आ पाती है. कई बार चुप कराने के लिए भी धर्म का सहारा लिया जाता है.

इन सबके बावजूद सबसे अच्छी बात है कि शमी के साथ बड़ी तादाद में आम मुसलमान नौजवान खड़े दिखे. उन्होंने न सिर्फ शमी का हौसला बढ़ाया, बल्कि ऐसे कुंद जहन मर्दाना सोच को लताड़ भी लगायी.

ऐसा माना जाता है कि इसलाम में ईमान के लिए नीयत का होना बहुत जरूरी है. सब काम के पहले नीयत की जाती है. जिनकी नीयत ही किसी तस्वीर को देखते ही गड़बड़ाने लगे, उन्हें दूसरों को नसीहत देने से पहले अपनी नीयत के साथ-साथ अपने ‘ईमान’ के बारे में भी गौर करना चाहिए.

(प्रभात खबर से साभार)

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