विचार

गैस चैम्बर में तब्दील होता गोरखपुर

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(गोरखपुर में बढ़ते प्रदूषण की अनदेखी पर लेखक -कवि प्रमोद कुमार का आलेख)  

गोरखपुर में विकास नगर मोहल्ले के मेरे एक मित्र को एक मध्य रात्रि में लगा कि उनका दम घूंट रहा था। नींद टूटी तो अनुभव किया कि पूरा घर एक अज्ञात दमघोंटू गैस से भर गया था। उन्होंने बाहर निकल देखा कि एक चिमनी से निकला काला धुआं उनके मोहल्ले में गीध चील सा तीक्ष्ण चोंच बाए उतर रहा था।
देश की राजधानी नई दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण को देखकर सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि वहां रहनेवाले किसी गैस चैम्बर में रह रहे हैं। गोरखपुर के हालात भी नई दिल्ली की तरह बनते जा रहे हैं। दिल्ली में प्रदूषण ने अचानक गैस चैम्बर का रूप नहीं ले लिया। इसे नीति-निर्धारक इंडस्ट्रियल व कामर्शियल चैम्बरों, विकास के नाम पर अनियंत्रित औद्योगिक विकास, मोटरवाहन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बैंकों के कर्ज-मेलों आदि ने एक-एक ईंट जोड़कर खड़ा किया हैं।
यह गोरखपुर भी एक गैस चैम्बर बनता जा रहा है। यहां पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) के अलावे सल्फर डायआक्साइड व कार्बन मोनोआक्साइड जैसी गैसें व दिल्ली के सारे प्रदूषणकारी कारण बेलगाम काम कर रहे हैं। ऊपर से यहां के स्थानीय कारण भी बहुतेरे हैं। यहां प्रदूषण को नकारने वाले भी उसी तरह सक्रिय हैं जैसे कभी दिल्ली में थे। जब दिल्ली के आवासीय क्षेत्रों में बहुत सारे उद्योग चलाये जा रहे थे तब सबके पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त ‘नो आब्जेक्शन सार्टिफिकेट’ (एनओसी) भी थे। जब सार्वजनिक स्थलों पर सेंसर और माॅनिटर लगाये गये और उन्होंने पारदर्शी ढंग से प्रदूषण स्तर को जनसामान्य को स्क्रीन पर दिखाना शुरू किया तब भी उद्योगों के प्रवक्ता नेताओं ने सत्य को झूठलाने का प्रयास जारी रखा। लेकिन विज्ञान प्रदत्त सेंसरों के दबाव में वहां से उद्योगों को बाहर जाना पड़ा। गोरखपुर में पीएम 10 के सबसे बड़े स्रोत प्रदूषण नियंत्रक मानकों की अवहेलना करने वाले फर्नेस भट्टी युक्त कल कारखानें ही हैं, वे ‘‘सइंया भये कोतवाल तो डर काहे का’’ जैसी मनःस्थिति के साथ काले धुएं व प्रदूषक गैसें उत्सर्जित कर रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी उसी तरह निडर हैं, पर जनता जान रही है कि वे सुविधा शुल्क लेकर बगैर कारखानों की जांच किये एनओसी बांट रहे हैं।
इधर देखा जा रहा है कि कई दिशाओं, विशेषकर पश्चिम से आ रहे धूम्र-बादलों से सूर्यास्त के बहुत पहले ही शहर में अंधेरा छा जा रहा है। गोरखपुर में पीएम 10 रोकने हेतु कड़ाई से मानकों को पालन नहीं कराया गया तो वह दम घोंटने वाला बन जाएगा। जगह-जगह एवं विशेषकर कारखानों के आसपास सेंसर लगाकर गोरखधंधे को बंद कराना चाहिए तथा जनता को सत्य से अवगत कराया जाना चाहिए।
गोरखपुर गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित है, यहां की मिट्टी साल भर उच्च व निम्न तापमानों, तेज हवा व बरसात को झेलती है, इन कारणों से अपक्षयण प्रक्रिया (वेदरिंग) से इसकी ऊपरी परत टूट-टूटकर महीन कणों -धूल व गर्द में परिवर्तित हो जाती है, इस कारण यहां धूल उड़ना एक सामान्य परिघटना है। (सम्पूर्ण गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान में दक्षिण भारत की तुलना में धूल कई गुनी अधिक मात्रा में उड़ती है।) लेकिन, यहां जमीन पर पड़े कारखानों व सड़कों पर बिखरे हानिकारक रसायनिक कणों, कार्बन, ट्रकों व अन्य वाहनों से बहे पेट्रोलियम युक्त कचरे, महापालिका व नागरिकों द्वारा जलाये गये कूड़ों से उत्पन्न गैस व राख आदि भी हवा या मोटर वाहनों द्वारा उड़ायी धूल के साथ आसमान में उठते एवं पूरे नगर के ऊपर छा जाते हैं। फिर वही सब धीरे-धीरे अपने कई जानलेवा हथियारों से सज्जित हत्यारों की तरह घरों व कार्यालयों में घुस आते हैं और आप अनजाने इनके शिकार हो जाते हैं। शीत काल में तापमान घटने पर कोहरा, धुआं और रसायन मिश्रित धूल आपस में मिलकर स्माॅग (धूम कोहरा) बना लेते हैं। इसी स्माॅग, जिसमें पीएम 10 व पीएम 2.5 दोनों होते हैं, के कारण विगत जाड़े के शुरूआती दिनों में गोरखपुरवासी श्वांस, खांसी, गले, हृदय व फेफडों के रोगों से परेशान रहे। वैसे तो पूरा नगर इससे प्रभावित है, पर बरगदवां, विकास नगर विस्तार, भगवानपुर, फर्टिलाइज़र का क्षेत्र व नौसढ़ ऐसे प्रदूषण से सर्वाधिक पीडि़त हंै।
ट्रकों, टेम्पो, अन्य डीज़ल चालित वाहनों, डीजी सेट आदि का पीएम 2.5 उत्पन्न करने में भारी योगदान है। गोरखपुर में कुछ लोगों के लिए दो और चार पहिया वाहन दूरी तय करने के साधन कम, मर्दानगी प्रदर्शन व स्वास्थ्य से दूरी बढ़ाने के साधन अधिक बन गये हैं। मोटर साईकिलों के विज्ञापनों में इन्हें चलाना तेजी व स्मार्टनेस प्रदर्शन का साधन बताया जाता है। दो हजार सीसी से अधिक क्षमता के चार पहिया डीज़ल वाहन स्टेट्स सिम्बल ही नहीं, उसमें बैठे लोगों के दमनकारी होने के उद्घोषक भी होते हैं। प्रतिदिन शहरी व देहाती क्षेत्रों के हजारों ऐसे वाहन राजनीति, ठेकेदारी, व्यापार, प्रशासन पर दबाव के उद्देश्यों से सड़कों व गलियों में शेर से दहाड़ इस शहर को जंगल में ही नहीं; गैस चैम्बर में भी तब्दील कर रहे हैं। वैसे तो पूरा नगर पीएम 2.5 की चपेट में है, पर गोलघर, धर्मशाला, मोहद्दीपुर, गोरखनाथ, कचहरी, बेतियाहाता, स्टेशन बस अड्डा, पूरा मेडिकल व राजघाट रोड पीएम 2.5 के खजाने हैं।
स्ंाक्रमित लोग फेफड़े, दिल, न्यूरो, किडनी आदि के रोगों से ग्रसित हो जा रहे। वे जब ऊपर से स्वस्थ दिखते भी हैं तब भी उनके कामकाजी दिनों की संख्या में कमी आ रही है। वे श्रमसाध्य कार्य, खेलकूद, एकाग्रता युक्त पढ़ाई नहीं कर पाते। यहां के हर व्यक्ति की उम्र का कुछ प्रतिशत प्रदूषण लूट ही ले रहा, आगे लूट-प्रतिशत का चक्रवृद्धि विकास निश्चित है। डब्ल्यूएचओ की रपट के अनुसार 1915 में प्रदूषण से भारत में 6.45 लाख लोगों की जान चली गई।
हमारे मंत्रियों, जन प्रतिनिधियों को बड़ी-बड़ी गाडि़यों के लम्बे-लम्बे काफिले लेकर चलने की आदत त्याग कर बड़ा आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। इन्हें अपने फायदे में पीएम 2.5 फैलाकर जन स्वास्थ्य पर हमला करने का हक इस जनतंत्र मे कत्तई नहीं है। इस मामले में छोटी गाड़ी में अकेले चलने वाले गोरखपुर के एक विधायक अनुकरणीय हैं। वैसे भी नेताओं को जान लेना चाहिए कि शिक्षा बढ़ रही है, शिक्षित मनों को अब काफिले नहीं रौंद सकते, बल्कि भविष्य में इसकी विपरीत प्रतिक्रिया ही होगी।
प्रदूषण संबंधी चेतना के अभाव में नागरिक घर के कूड़े-कचरे को अन्दर बाहर जला रहे हैं, वह पैदा होने वाली हानिकारक गैसों के कुप्रभाव से अपरिचित अपराधी हैं। लेकिन, अधिक गंभीर बात यह है कि महापालिका भारी मात्रा में कूड़े इकट्ठा कर बड़े स्तर पर जलाती है, जबकि वह हानिकारक गैसों से परिचित है और इस कारण एक अक्षम्य अपराधी भी। महापालिका को नगर में कचरा निस्तारण के लिए कई इंसिनेरटरों की स्थापना करनी चाहिए थी। इंसिनेरटरों में उच्च ताप पर कूड़े ही नहीं भस्म होते, निकलनेवाली हानिकारक गैसें भी आक्सिकृत हो अप्रभावी यौगिकों में बदल जाती हैं। पर, गोरखपुर महापालिका शुरू से ही आधुनिक प्रबंधन के प्रति अपढ़ रही है। स्वस्थ आधुनिककरण के लिए यहां माॅलों, मार्टाें व होटलों से पहले इंसिनेरटरों की स्थापना आवश्यक थी। इस नगर के पास व दूर के ईंट भट्ठों में भी टायर, प्लास्टिक व अन्य शहरी कचरे इंधन के रूप में फूकें जाते हैं, वहां की विषैली गैसें भी हवा की दिशा पाकर इस नगर में प्रवेश करती हैं।

गोरखपुर की सड़कों की डिजाइन 18वीं सदी की है तो इन संकरी सड़कों पर चलनेवालों की मानसिकता 16वीं सदी के सामंतों-सी संकरी। ऊपर से धर्मस्थलों व ‘धर्मो रक्षित रक्षितः’ दुकानदारों का अतिक्रमण है ही। सारे संकरों को चैड़ा कर सार्वजनिक यातायात व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। यहां जाम में फंसे लोग अपने फेफड़ों में सल्फर के आक्साइडों व कार्बन मोनो आक्साइड, हैवी मेटल तथा पीएम 2.5 भरते चलते है।
चीन की राजधानी में प्रदूषण स्तर पीएम 150 पहुँचने पर रेड अलर्ट जारी कर स्कूल, दफ्तर, कारखाने, वाहन बंद कर दिये जाते हैं, पर दिल्ली में उसका स्तर 500 से ऊपर रहने पर भी लोग चुपचाप झेलते रहते हैं, गोरखपुर अपने रोगियों की बड़ी संख्या के लिए प्रसिद्ध है, पर यहां प्रदूषण की पारदर्शी जांच व उससे फैले रोगों की माप की व्यवस्था नहीं है।
यदि इस शहर को माॅडल बनाने की योजना में प्रभावकारी प्रदूषण नियंत्रण को नहीं अपनाया गया तो यहां के नागरिक नई दिल्ली की अपने को गैस चैम्बर में कैद पाएंगें।

(लेखक प्रमोद कुमार से मोबाइल नम्बर 9415313535 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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