साहित्य - संस्कृति

जन संस्कृति का 15वां राष्ट्रीय सम्मेलन 29-31 जुलाई को पटना में

– सामाजिक विभाजन, हिंसा और अविवेक के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज मुखर करेंगे संस्कृति कर्मी
-200 से अधिक प्रतिनिधि भाग लेंगे
-उद्घाटन सत्र में बोलेंगे प्रो चमन लाल, ज्यां द्रेज, कविता कृष्णन, प्रो मैनेजर पांडेय, प्रो अफसा जफर और महबूब आलम

नई दिल्ली / पटना, 26 जुलाई। जन संस्कृति मंच का 15वां राष्ट्रीय सम्मेलन 29-31 जुलाई को पटना में आयोजित हो रहा है। सम्मेलन को ‘ सामाजिक विभाजन, हिंसा और अविवेक के खिलाफ प्रतिरोध और जन एकता के लिए ’ विषय पर केन्द्रित किया गया है। इसमें पूरे देश से 200 से अधिक प्रतिनिधियों के अलावा साहित्य, संस्कृति, कला, सिनेमा और जन आंदोलन की जानी-मानी शख्सियतें भाग लेे रही हैं।
जन संस्कृति मंच के संगठन सचिव मनोज कुमार सिंह ने बताया कि त्रिलोचन-मुक्तिबोध और भोजपुर के संग्रामी कवि रमता जी की जन्मशती वर्ष में आयोजित हो रहा जन संस्कृति मंच का सम्मेलन 29 जुलाई की दोपहर 3.30 बजे से शुरू होगा। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रोफेसर चमन लाल हैं। इस सत्र को  उनके अलावा प्रो मैनेजर पांडेय, ज्यां द्रेज, प्रो अफसा जफर, कविता कृष्णन, महबूब आलम, प्रो राजेन्द्र कुमार सम्बोधित करेंगे। उद्घाटन सत्र के बाद शाम छह बजे से कवि गोष्ठी का आयोजन है जिसमें प्रख्यात कवि आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल, अरूण कमल, मदन कश्यप, बल्ली सिंह चीमा, निर्मला पुतुल, पंकज चतुर्वेदी, अनुज लुगुन, महादेव टोप्पो कविता पाठ करेंगे। सम्मेलन के पहले दिन के सभी कार्यक्रम विद्यापति मार्ग पर स्थित विद्यापति भवन में होंगे।
सम्मेलन के दूसरे दिन सुबह दस बजे से दो बजे तक प्रतिनिधि सत्र होगा जिसमें संगठन की गतिविधियों के साथ-साथ वर्तमान दौर व सांस्कृतिक आंदोलन की स्थिति पर विचार किया जाएगा। इसी सत्र में नई राष्ट्रीय परिषद व पदाधिकारियों का चुनाव होगा। इसके बाद 3.30 बजे से काव्य गोष्ठी होगी जिसमें राजेन्द्र कुमार, अमिताभ बच्चन, अजय कुमार, घनश्याम त्रिपाठी, कृष्ण कुमार निर्मोही, सुरेश कांटक, कौशल किशोर, शंभू बादल, शहंशाह आलम, जितेन्द्र कुमार, मृत्युंजय, ऋचा सहित कई युवा कवि कविता पाठ करेंगे। दूसरे दिन का कार्यक्रम आर ब्लाक चैराहे पर स्थित इंजीनियर्स इस्टीट्यूशन सभागार में होगा।
सम्मेलन के तीसरे दिन ‘ आज का समय और प्रेमचन्द ’ पर बिहार चेम्बर्स आफ कामर्स सभागार में संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।
श्री सिंह ने कहा कि पिछले दो-तीन वर्षों में संस्कृति कर्मियों ने कई मायनों में राजनीति से आगे बढ़कर प्रतिरोध किया है लेकिन सामाजिक विभाजन, हिंसा और अविवेक की ताकतों के पीछे पूंजी और राजसत्ता खड़ी है, उनके हौसले अभी भी बुलदियों पर हैं। आज नागरिक समाज की तमाम आवाजें सारे दमन को झेलते हुए लोकतंत्र की बहाली के लिए, सामाजिक विभाजन, हिंसा और अविवेक की संस्कृति के खिलाफ प्रतिरोध के लिए, जनता की एकजुटता के लिए संघर्षरत हैं। सम्मेलन में इन सभी आवाजों को एक संगठित आंदोलन में बदल देने के लिए संकल्प लिया जाएगा।