विचार

जीवन के अंत के खतरे और खतरों का अंत

प्रमोद कुमार

प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री  व  आस्ट्रो-वैज्ञानिक स्टेफन हॉकिंग ने विगत दिनों पृथ्वी पर जीवन  के अंत के समीपस्थ खतरों  एवं उससे मानव प्रजाति को बचाने का जैसा तात्कालिक व दीर्घकालिक रास्ता बताया  हैं, वे दोनों विचलित कर देने वाले हैं. हिंदी समाचार-पत्रों के अनुसार इस महान वैज्ञानिक ने सुझाव दिया है कि मनुष्य को चाँद और मंगल ग्रह पर जल्द से जल्द केंद्र खड़ा कर लेना चाहिए. हिंदी अखबारों में विज्ञान की शब्दावली को समझ सकने वाले पत्रकार नहीं हैं.  इस कारण हिंदी के पाठक विज्ञान की खोजों और इस क्षेत्र में घट  रही बड़ी घटनाओं से नावाकिफ ही रह जाते हैं. अंग्रेजी अखबारों और विज्ञान सम्बन्धित वेब साइट्स पर वैज्ञानिक शब्दावली व पदों में  स्टेफन हॉकिंग के  वक्तव्य को सही ढंग एवं पूरे परिप्रेक्ष्य के साथ प्रस्तुत किया गया है, उन्हें पढ़ने से बातें साफ हुई हैं. स्टेफन हॉकिंग की प्रस्तावना है कि चाँद या मंगल पर ऐसे केंद्र (प्रयोगशाला) बनाये जाएँ जहाँ मनुष्य प्रजाति को नमूनों के रूप में संरक्षित रखा जा सके और वहां उस  प्रजाति के नमूनों के बचाव (conserve) करने के साजो सामान भी अवश्य उपलब्ध हों. वह केंद्र वैसे ही होंगे जैसे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच  चुके या विलुप्त प्राय हो चुके कुछ बीजों और जीवों की प्रजातियों (Endangered species) को सुरक्षित रखने के लिए कई देशों ने spicies bank  बना रखे हैं.  मानव जाति के समाप्त होने की धीमी या तीव्र  प्रक्रिया कभी भी शुरू हो सकती है या किसी  खगोलीय विष्फोट से अचानक भी  मनुष्य प्रजाति विलुप्त हो सकती है. चाँद या मंगल के किसी बैंक/ प्रयोगशाला में इस प्रजाति के कुछ नमूने  सुरक्षित बचे रहेंगे तो वे ब्रह्माण्ड में जीवित रहने योग्य ग्रहों उपग्रहों की खोज कर वहां जा बसेंगे और वहां उनके पुनर्विकसित होने से अगले दस लाख वर्षों तक मानव प्रजाति की उत्तरजीविता बनी रहेगी.

स्टेफन हॉकिंग पृथ्वी पर अंतरिक्षीये और स्थानीय खतरों पर सचेत हैं. पहले वह भी अन्य वैज्ञानिकों की तरह पृथ्वी पर मनुष्य प्रजाति को लाखों वर्षों तक सुरक्षित मानते थे , फिर जब उन्होंने खतरों को बढ़ते देखा तो उसके भविष्य को घटा कर हज़ार वर्ष कर दिया , लेकिन अब तो वह उसकी शेष उम्र को मात्र दो सौ वर्षों की ही मान रहे हैं. अमेरिका द्वारा  प्रदूषण नियंत्रण संधियों को नकारने से वह बेहद दुखी हैं.

MNS News में छपे उनके  वक्तव्य से उनकी चिंता को देखा जा सकता है-

 “President Trump’s decision to pull the United States out of the Paris climate agreement on June 1 has only upped the stakes, Hawking said in a talk delivered by Skype at the Starmus science and art festival on Tuesday.”

“Unlike Donald Trump, who may just have taken the most serious and wrong decision on climate this world has seen, I am arguing for the future of humanity and a long-term strategy to achieve this,” Hawking, now 75 and still a professor at the University of Cambridge, said.

उम्मीद थी कि दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत के प्रधान मंत्री मोदी डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात में जलवायु  सुरक्षा पर गंभीरता से बातें करेंगे, लेकिन दुर्भाग्य है कि ट्रंप के डर से वह उनके  ‘सच्चे दोस्त’  बन  गए  और अपनी इतनी बड़ी आबादी की सुरक्षा का प्रश्न उठाया ही नहीं. ट्रंप को ऐसे सच्चे दोस्त’ मिलते रहेंगे.

पहले उन्होंने पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि, क्लाइमेट चेंज  जैसी जितनी भी  भविष्यवाणियाँ की थीं, वह सब सही निकली हैं.  उनके इस ताज़े भविष्यवाणी को एकदम से नकारा नहीं जा सकता.

 जब वैसे  खतरे आ जायेंगे तो मनुष्य का क्या होगा- जरा सोचिये. जिस तरह हमारे देखते-देखते पृथ्वी से अनेक प्रजातियों के पशु, पंछी, वनस्पति आदि विलुप्त हो गए, उसी तरह मनुष्य भी विलुप्त होने लगेंगे.  वनस्पति, पशु, पंछी आदि तो कुछ बोल भी नहीं पाए. मनुष्य तो छटपटायेगा, चीखेगा चिल्लाएगा. उसे बचाने उसका  बनाया  कोई भगवान, अल्ला, गॉड खड़ा  नहीं होगा.  कोई दवा, कोई दुआ काम नहीं करेगी. सारी कलाएं, कविता-कहानियां मौन हो जाएँगी.

मान लीजिये कि पृथ्वी पर परिसमापन के पहले कुछ लोग चाँद या मंगल पर बनी बस्तियों में चले गए तो उनका क्या होगा ?  अंतरिक्ष यात्रा की शारीरिक व मानसिक योग्यता के लिए बहुत कठिन जांचों से गुजरने के बाद हजारों में दो-एक चयनित  होते  हैं.  अभी तक अंतरिक्ष यात्रियों की उम्र औसत 34 वर्ष की ही रही है. ऐसी यात्रायें बेहद खर्चीली भी होती हैं. गंतव्य तक भारी भरकम कई यंत्र, कुछ वैज्ञानिक, कुछ इंजिनियर व कुछ प्रयोज्य  मनुष्य ही ले जाये जायेंगे.  चाँद या मंगल पर मनुष्य जीवन के लिए न्यूनतम आवश्यकताएं ऑक्सीजन, और तापक्रम भी नहीं हैं. एक  तो वहां कोई आदमी  जाना नहीं चाहेगा, दूसरे,  जो आदमी चला गया, उसे किसी तरह की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी. उसे बंद और अनुकूलित प्रयोगशाला जैसे छोटे-बड़े बैंकों के किसी रैक में कॉपर सल्फेट और पोटाशियम नाइट्रेट जैसे रसायनों की तरह रख दिया जायेगा. वह उनका काम अगली पीढ़ी को पैदा करना भर होगा. काम पूरा होते ही वह बेकार हो जायेगा  और रसायनों के खाली बोतलों की तरह उसे फ़ेंक दिया जायेगा. यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जबतक किसी आकाश गंगा में कहीं मनुष्य के उत्तरजीविता योग्य  कोई खगोलीय पिंड मिल नहीं जाता और वहां पहुँच सकने की तकनीक विकसित नहीं हो जाती. यह क्रम हजारों-लाखों पीढ़ियों तक चल सकता है. कुछ मानवशास्त्रियों  ने कहा है कि मनुष्य की आयु (अधिक से अधिक ९० साल) एवं अंतरिक्ष यानों की गति को देखते हुए एक आदमी अपने पूरे जीवन में अपनी आकाश गंगा मिल्की वे की कौन कहे अपने सौर मंडल से भी बाहर नहीं निकल पायेगा. हमारे निकट की गैलेक्सी कैनिस मेजर ड्वार्फ गैलेक्सी जो मिल्की वे का ही एक स्टेलाइट गैलेक्सी है, पृथ्वी से 25,000 प्रकाश वर्ष दूर है. दूरस्थ गैलेक्सी GN-Z11 पृथ्वी से 400 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है. जबकि एक प्रकाश वर्ष 9460730472580.800 किलोमीटर के बराबर होता है. एक नयी खोज यह भी हुयी है कि अंतरिक्ष के सरे पिण्ड एक दुसरे से दूर भाग रहे हैं. इस कारण अंतरिक्ष का निरंतर विस्तार हो रहा है. अंतरिक्ष यान अधिकत्तम 60,000 किमी/घंटा  के वेग से चलते है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में उन्हें लगभग 18,000 वर्ष लगेंगे. अर्थात निकटत्तम गैलेक्सी तक पहुँचने में अंतरिक्ष यान में ही हजारों हज़ार पीढियां जन्म लेंगी और उसी में मर-खप जाएँगी.

ज्ञातव्य है कि 7७ मिलियन साल पूर्व मनुष्य प्रजाति की उत्पति के प्रारंभ होने के संकेत मिलते है. उससे भी अधिक समय उसे अंतरिक्ष यात्रा में बिताना पड़ेगा. जो ऐसी यात्रा में डाल दिए जायेंगे, उनके अमानवीय दुःख दर्द को कौन सुनेगा !

पृथ्वी मनुष्य के लिए न केवल सर्वाधिक एवं एक मात्र अनुकूल खगोलीय पिण्ड है, बल्कि उसी ने उसे आकार दिया है. उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ इसी पृथ्वी की देन  हैं. इससे अलग होकर मनुष्य क्या मनुष्य भी रह पायेगा ?  उसके मष्तिष्क, आँख, कान, स्वरयंत्र काम करेंगें इस पर भी प्रश्न है.

आखिर इस  महान वैज्ञानिक, जिसे किसी देश विशेष से जोड़ना ठीक नहीं, जो  न्यूटन और आइन्सटिन की तरह ही इस काल  का, पूरे विश्व का अपना है, ने इतना कठिन व अकल्पनीय मार्ग क्यों प्रस्तावित किया है. वह खुद एक मानवतावादी विचारक है, कोई अन्य रास्ता न बचे होने के कारण ही उन्होंने ऐसा कहा होगा. जीवन व मनुष्यता के सारे रास्ते पूंजीपति व कार्पोरेट्स बंद कर रहे हैं.

एक और महत्त्वपूर्ण बात स्टेफन हॉकिंग ने  उक्त प्रस्ताव के साथ कही है कि मानव प्रजाति और पृथ्वी को बचाने के क्रम में अब राष्ट्रों की सीमाएं ख़त्म हो जाएँगी. राष्ट्रों के बीच प्रतियोगिता के कारण ही विकास की अवधारणा पैदा हुयी है, वह भयानक रूप से  पर्यावरण को नष्ट कर रही है एवं क्लाइमेट चेंज के लिए भी जिम्मेदार है.  स्टेफन हॉकिंग  भगवान, धर्म वगैरह के तो पहले से ही सख्त खिलाफ है.

अमेरिका एवं यूरोप के साहित्य में पर्यावरण की चिंताएं प्रमुखता से आ रही हैं, जो विकास व सत्ता का प्रतिरोध है.  वहां मानव प्रजाति की उत्तरजीविता पर बड़ी सुखद बातें भी आ रही हैं. लिखा जा रहा कि दूसरे ग्रहों पर जा बसनेवाले या इसी पृथ्वी के नए संस्करण में जो मनुष्य प्रविष्ट होंगे वह पूर्वाग्रहों से पूर्णतः मुक्त नए मनुष्य होंगे. वह मनुष्य से उत्पन मनुष्य होंगे. इस वर्त्तमान पृथ्वी के मनुष्य यूनीसेलुलर प्राणियों से शुरू हो कर बन्दरों वनमानुषों से विकसित हुए हैं . इनकी  विकास यात्रा में लम्बा अज्ञान का अंधकार युग भी आया, जिसमें  उन्होंने खुद अनेक विश्वास, भगवान, धर्म, राष्ट्र, सीमाएं,  परम्पराएँ पैदा कर लीं, जो अंततः अब इन्हीं के खिलाफ  खड़ी  हैं.

पृथ्वी को बचाने की ओर विकसित देश अभी भी गंभीर नहीं हैं, जिन खतरों की भविष्यवाणी  स्टेफन हॉकिंग 200 वर्षों के बाद कर रहे हैं, संभव है, कुछ दिनों बाद घोषित हो जाये कि वह अगले 20 वर्षों में ही भयावह रूप से आ रहा है. जबकि वर्ड पापुलेशन क्लॉक के अनुसार अभी इस पृथ्वी पर 7.5 अरब की आबादी  है. कुछ लोग जो अंतरिक्ष में चले जायेंगे उनकी संख्या मात्र पांच या दस हज़ार हो सकती है, अर्थात सारे लोग विकल्पहीन हो यहीं रहने को बाध्य होंगे. उनकी दृष्टि से देखें तो स्टेफन हॉकिंग की प्रस्तावना निरर्थक ही नहीं, निहायत अमानवीय और एक ढंग से पलायनवादी भी है.

मनुष्य अपने और अपनी पृथ्वी को बचाने का भरपूर प्रयास करेगा. ऐसा करने में  केवल वैज्ञानिक ही नहीं, राजनीतिक दृष्टि व चाह  भी अपेक्षित  होगी.

parmod kumar

( लेखक प्रमोद कुमार वरिष्ठ कवि हैं )

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