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डा. कफील को हटाने को लेकर उठे सवाल

गोरखपुर, 13 अगस्त। बीआरडी मेडिकल कालेज के 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड के नोडल अधिकारी डा. कफील खान को उनके पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह डा. भूपेन्द्र शर्मा को प्रभारी बनाया गया है। डा. कफील को उनके कार्यभार से हटाने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल किए जा रहे हैं।
34 वर्षीय डॉ कफील को हटाने की जानकारी मेडिकल कालेज के प्राचार्य का जिम्मा संभाल रहे डीजीएमई केके गुप्ता ने दी.
डा. कफील खान बीआरडी मेडिकल कालेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड में एक वर्ष से नोडल अधिकारी के रूप में कार्य कर रहे थे। वह मेडिकल कालेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. बतौर नोडल अधिकारी वह इंसेफेलाइटिस वार्ड में मरीजों के इलाज से प्रबन्धन से जुड़े कार्य को निभा रहे थे।
बीआरडी मेडिकल कालेज में 10 अगस्त को हुए आक्सीजन संकट के बाद वैकल्पिक इंतजाम करने में डा. कफील खान की भूमिका की मीडिया में बड़ी प्रशंसा हुई थी। तमाम स्थानीय खबरों में उनकी एक तस्वीर आयी थी जिसमें वह एक नवजात को वार्ड में एडमिट कराते वक्त भावुक हो गए थे। यह तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हो गई थी और लोग उनकी खूब प्रशंसा कर रहे थे।
दरअसल यह तस्वीर 11 अगस्त की दोपहर की थी। उस समय डा. कफील आक्सीजन सिलेण्डर के इंतजाम में परेशान थे और इधर-उधर भाग दौड़ करते हुए लगातार मोबाइल पर इस सम्बन्ध में बात कर रहे थे। उसी वक्त एक महिला अपने नवजात शिशु को लेकर वार्ड में पहंुची। शिशु की हालत खराब थी। डा. कफील खुद शिशु को अपने गोद में लेकर एनआईसीयू में गए और उसे भर्ती कराया। यह दृश्य वहां मौजूद पत्रकारों ने देखा और छायाकारों ने कैद किया। इसके बाद उनकी संवेदनशीलता को लेकर काफी चर्चा हुई।
लेकिन यह चर्चा ही उनके लिए मुसीबत बन गई। सोशल मीडिया पर कुछ लोग उनका अतीत ढूंढने लगे और उनके बारे में तरह-तरह की बातें लिखने लगे। इसमें उनके प्राइवेट प्रैक्टिस करने, मीडिया में चर्चा में रहने के लिए हथकंडे अपनाने की बातें कही गईं। यही नहीं उन्हें मेडिकल कालेज से आक्सीजन सिलेण्डर अपने अस्पताल के लिए ले जाने का आरोप लगाया गया। उन्हें ट्रोल किया जाने लगा।

आज वह पूरे दिन वार्ड में दिखे लेकिन शाम को उनके हटाने की खबर आई.  तब से उनका मोबाइल बंद हैं।
डा. कफील पर आक्सीजन सिलेण्डर इधर-उधर करने का आरोप पूरी तरह बकवास है क्योकि 10 अगस्त की रात लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई बाधित होने के पहले इंसेफेलाइटिस वार्ड सहित मेडिकल कालेज से सम्बद्ध नेहरू अस्पताल में लिक्विड मेडिकल आक्सीजन प्लांट से आक्सीजन सप्लाई हो रही थी और यह आक्सीजन सप्लाई पाइप लाइन से हो रही थी। आक्सीजन सिलेण्डर सिर्फ संकट की स्थिति में रखा जाता था। भला पाइप लाइन से आक्सीजन की कैसे चोरी हो सकती है. यह तो आरोप लगाने वाले ही बता सकते हैं.
आक्सीजन की सप्लाई और फर्म के भुगतान से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। बकाए का पैसा मेडिकल कालेज को करना था और यह धन शासन से आना था। शासन ने देर से पैसा भेजा और समय से भुगतान नहीं हुआ, इसलिए आक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई।
प्राइवेट प्रैक्टिस के आरोप पर तो गोरखपुर का हरेक आदमी जानता है कि बीआरडी मेडिकल कालेज का कौन डाॅक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करता ? यहाँ तक की कैम्पस में ही डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं. तब डॉ कफील पर ही कार्रवाई क्यों, यह सवाल सोशल मीडिया पर उठाया जा रहा है।
मेडिकल कालेज, प्रशासन या सरकार के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने अब तक यह नहीं बताया है कि डा. कफील पर किस आरोप में कार्रवाई हुई ? क्या उन्हें किसी पुरानी शिकायत पर हटाया गया ? यदि पहले से शिकायत थी तो इस वक्त कार्रवाई का क्या मतलब ? क्या उन्होंने आक्सीजन संकट के समय कोई लापरवाही की ? यदि की तो वह लापरवाही क्या थी ? इन सवालों का सोशल मीडिया पर माँगा जा रहा है. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि असली मुद्दा आक्सीजन संकट से बच्चों की मौत की तरफ से ध्यान हटाने के लिए यह कार्रवाई की गई है.

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