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तुम्हें तो अभी मौसम का नर्तन देखना था

( कवि, पत्रकार अरुण गोरखपुरी के निधन पर उनके सहकर्मी वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी की श्रद्धांजलि. साभार न्यूज़ फॉक्स)

 

तुममें भोर, भोर में तुमको, देख सकूं तो अच्छा है
जीवन को जीवन में यारा, देख सकूं तो अच्छा है
रिमझिम रिमझिम, बरसाती बूंदों का सुर सरगम
आंखों से मौसम का नर्तन, देख सकूं तो अच्छा है
स्मृति शेष हरीन्द्र द्विवेदी उर्फ अरुण गोरखपुरी की शायद यह अंतिम कविता है जो फेसबुक पर मिली है। जीवन की ऊर्जा से भरपूर, हमेशा मुस्कराते हुए अपने साथियों के बीच एकदम पानी की तरह घुलमिल जाने वाले कवि गोरखपुरी बुधवार की दोपहर इस दुनिया से विदा हो गये। उन्हें अभी जाना नहीं था। रवानगी औचक थी। उन्हें तो अभी अपनी पनियाई चमकती हुई आंखों से मौसम का नर्तन देखना था। जीवन को जीवन में देखना था। वे जानते थे कि कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। शायद इसीलिए कहते चलते थे देख सकूं तो अच्छा है।

उनके जीवन के कितने पेच थे, शायद वह खुद भी ताजिंदगी नहीं समझ पाए। हम तो उनको बस उनके ऊपरी हाव भाव और व्यवहार से जान पाए। अखबार के दफ्तर के किसी भी डेस्क के लिए वे संकटमोचक थे, जैसे कोई मास्टर रिंच जो हर पेच खोल दे। अपने इसी काम काज के बीच वे व्यंग्य से लेकर नवगीत और भोजपुरी की माटी के खांटी फ्लेवर के गीत और दोहे रचते थे।
उम्र के 70 वें दशक में भी उन्होंने जैसे जवान रहने का संकल्प पाल रखा था। इधर कुछ महीने से अक्सर बीमार हो जाते थे। पर पूछने पर कभी भी बुखार या पेट दर्द से ज्यादा नहीं बताया। बेहद मजबूत कलेजे वाले गोरखपुरी अपने परिवार में इस समय एक मात्र वयस्क पुरुष सदस्य थे। कुछ वर्ष पहले उनके बड़े बेटे की हत्या हो गई। इसके पूर्व उनका एक बेटा कहीं चला गया, उसका पता नहीं चला। वे इन बेटों के परिवारों के भी सरपरस्त थे। उनके लिए ही जीना चाहते थे। चिंतातुर थे कि उनके पौत्र कमाने खाने लगें। परिवार की मदद के लिए ही इस उम्र में  रिटायर होने के बाद भी नौकरी कर रहे थे।
गोरखपुरी नहीं हैं, आफिस में खाली पड़ी उनकी कुर्सी को देखकर मन भारी हो जा रहा है। जागरण, जनसंदेश टाइम्स और न्यूजफॉक्स में उनके साथ काम करने की इतनी यादें हैं कि उन्हें जिंदगी भर भूलना मुश्किल होगा। गोरखपुरी तुमने अच्छा नहीं किया। बड़े बेवफा निकले।

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