साहित्य - संस्कृति

भारतीय किसान की मृत्यु का शोकगीत है ‘ गोदान ’ -प्रो गोपाल प्रधान

प्रेमचन्द जयंती पर ‘ प्रेमचन्द और किसान ’ पर व्याख्यान
अलख कला समूह ने ‘ गुल्ली डंडा ’ का मंचन किया
गोरखपुर, 31 जुलाई। प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के इतिहास में सबसे बड़े रचनाकार हैं। विषय वस्तु व कला दोनों के मामले में। प्रेमचन्द के साहित्य के केन्द्र में किसान इसलिए नहीं हैं कि वह किसानों की पूजा करते हैं बल्कि इसलिए कि स्वाधीनता आंदोलन की दृष्टि से उनके साहित्य में किसानों की उपस्थिति है। प्रेमचन्द के वक्त एक ‘ होरी ’ की मौत हुई जबकि आज तीन लाख किसानों की आत्महत्याओं को हम देख रहे हैं। ‘ गोदान ’ भारतीय किसान की मृत्यु का शोकगीत है। गोदान में होरी की मोत नहीं हुई। उसे समाज की सभी शासक ताकतों ने मिलकर मारा।
यह बातें अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के हिन्दी के प्रोफेसर गोपाल प्रधान ने आज प्रेमचन्द पार्क में प्रेमचन्द जयंती समारोह के दूसरे दिन ‘ प्रेमचंद और किसान ’ विषय पर अपने व्याख्यान में कही। प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर यह आयोजन प्रेमचन्द साहित्य संस्थान, जन संस्कृति मंच और अलख कला समूह ने किया था।

सुजीत श्रीवास्तव

इतिहासकार एवं कथाकार प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव की याद में उनकी कहानी ‘ गरीब की दिवाली’ का पाठ करते सुजीत श्रीवास्तव

गोपाल प्रधान ने भारतीय ब्रिटिश साम्राज्यवाद, महामंदी, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज दुनिया पहली बार ग्लोबलाइज्ड नहीं हुई है। प्रेमचन्द जिस समय लिख रहे थे उस वक्त उपनिवेशीकृत होकर हम पहली ग्लोबलाइज्ड हुए थे। यह विश्व अर्थतंत्र से जुड़ी परिघटना थी। साम्राज्यवाद ने आर्थिक व्यवस्था का निर्माण कुछेक देशों को लाभ पहुंचाने के लिए शेष दुनिया के प्राकृतिक व मानव संसाधनों का दोहन किया। प्रेमचन्द के स्वाधीनता आंदोलन का अन्तरराष्टीय परिप्रेक्ष्य है।
उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने जब अपनी परिपक्व रचनाएं की, उस वक्त पूंजीवाद के इतिहास में महामंदी का दौर चल रहा जो द्वितीय विश्वयुद्ध तक चला। पूँजी को जब-जब संकट आता है उसे पुर्नसमायोजन की जरूरत होती है और इसके लिए पंूजीवाद युद्ध थोपता है। वर्तमान दौर में कृषि का जो संकट है वह पूंजी के वर्तमान रूप से जुड़ा है। प्रेमचन्द कुछ दिनों के लिए फिल्मों में गए थे और उन्होंने न केवल पटकथा लिखी बल्कि एक फिल्म में अभिनय किया। यह फिल्म मजदूरों पर थी। इस फिल्म पर सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि सेंसर बोर्ड में मिल मालिक थे और उनको यह डर सता रहा था कि महामंदी के दौर में मजदूरों को विक्षोभ को इस फिल्म से बल मिलेगा। महामंदी के इस दौर में एक तरफ पूंजीवाद अपनी उत्पादक शक्तियों का विनाश कर रहा था तो दूसरी तरफ पंचवर्षीय योजनाएं के जरिए सोवियत रूस आगे बढ़ रहा था जो अन्य देशों को आकर्षित कर रहा था। मजदूरों, किसानों का आंदोलन सक्रिय हो रहा था और रूस से जो समाचार आ रहे थे उससे वामपंथी प्रभाव बढ़ रहा था। स्वाधीनता आंदोलन में जनता की भागीदारी अपने-अपने ठोस सवालों के साथ थी। स्वाधीनता आंदोलन में किसान-मजदूर प्रमुख ताकत के रूप में उभर रहे थे। एक समय में तो किसानों का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया और तमाम राजनीतिक ताकतों ने भी उनके सवाल उठाने शुरू कर दिए। प्रेमचन्द किसानों के जरिए साम्राज्यवादी अर्थतंत्र को समझ सकते थे क्योंकि उसका असर अर्थतंत्र पर पड़ रहा था। प्रेमचन्द सामाजिक प्रश्नों को स्वाधीनता आंदोलन से अलग नहीं करते हैं बल्कि उसे साथ में रखते हैं। वह अकेले ऐसे रचनाकार-चिंतक हैं जिनके यहां सामाजिक सुधार के प्रश्न, स्वाधीनता के प्रश्न हैं। वह इसकी पड़ताल करते हैं कि किसानों के लिए यह स्थिति क्यों आई ?
प्रो प्रधान ने कहा कि मार्क्स ने कहा था कि फ्रांसीसी क्रांति में समाज के यर्थाथ चित्रण के लिए वह बाल्जाक के उपन्यासों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। ठीक उसी तरह प्रेमचन्द के लेखन में उस दौर के समाज का यर्थाथ चित्रण हैं। प्रेमचन्द बखूबी समझ रहे थे कि देशी सामंतों और विदेशी साम्राज्यवाद से बना तंत्र भारत के किसानों को बर्बाद कर रहा है। रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘ गोदान ’ में ‘ होरी ’ की मौत धीमे-धीमे होती है। गोदान के पहले ही दृश्य में मृत्यु की छाया पड़नी शुरू होती है जो 300 पृष्ठों के उपन्यास के अंतिम दृश्य में होरी की मौत तक चलती रहती है। ऐसा लगता है कि होरी के गले में फंदा कसता जाता है और वह अपने दोनों हाथों से फंदे को चैड़ा करने की कोशिश कर रहा है ताकि वह अपने मौत को कुछ देर के लिए आगे खींच सके लेकिन आखिर में वह नहीं बच पाता। ‘ गोदान ’ दरअसल भारतीय किसान की मृत्यु का शोकगीत है। समाज की सभी शासक ताकतों ने मिलकर होरी का शिकार किया। इसलिए होरी की मौत को हम मौत नहीं कह सकते बल्कि उसकी हत्या हुई।

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कथाकार बादशाह हुसैन रिजवी की स्मृति में उनकी कहानी ‘ चार मेहराबों वाली दालान ‘ का पाठ करते डॉ मुमताज खान

उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द के समय में देश में देशी सामंतवाद और विदेशी साम्राज्यवाद ने ‘ आत्महंता और सारहीन विकास ’ तथा ‘ मानव विहीन सभ्यता ’ का एजेंडा शुरू किया था उसे भारतीय जनता लडकर कुछ देर के लिए रोका लेकिन आज वह एजेंडा फिर पूरी ताकत के साथ खड़ा हो गया। यही कारण है कि प्रेमचन्द के वक्त एक ‘ होरी ’ की मौत हुई जबकि आज तीन लाख किसानों की आत्महत्याआ को हम देख रहे हैं। ऐसी परिघटना दुनिया के किसी देश में नहीं घटी कि तीन लाख किसान आत्महत्या कर लें और संसद शोक प्रस्ताव तक पारित न करे।
उन्होंने कहा कि आज डेमोक्रेसी में मनुष्य की जीवंत उपस्थिति नहीं है बल्कि व प्रतीक मात्र है। एक ऐसा दौर है जिसमें पूरी दुनिया में लोकतंत्र खत्म हो रहा है। मतदान से पायी जाने वाली ताकत धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब वास्तविक निर्णय ससंद में नहीं कहीं और होते हैं। लोकतंत्र के भीतर से ही तानाशाही पैदा हो रही है लेकिन हताशा के इसी दौर में उम्मीद की किरण भी है। आखिर उपनिवेशवाद के दौर में ही प्रेमचन्द जैसे बड़े लेखक को जन्म दिया जिसकी रचनाएं दुनिया के सभी भाषाओं में पढ़ी जा रही हैं। प्रेमचन्द ने किसान जीवन के चित्रण के जरिए हिन्दुस्तान का साझा जीवन उभारा था। इस दौर की रचनात्मकता भी कम नहीं है। यह दौर दमन के खिलाफ जबर्दस्त रचनात्मक प्रतिरोध का भी है जो डूबते सूरज द्वारा जुगुनुओं को सौंप दी गई विरासत के समान है।
इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने की जबकि जन संस्कृति मंच गोरखपुर के अध्यक्ष जगदीश लाल श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
अलख कला समूह ने ‘ गुल्ली डंडा ’ का मंचन किया
प्रेमचन्द जयंती समारोह के दूसरे दिन अलख कला समूह ने प्रेमचन्द की मशहूर कहानी  ‘ गुल्ली डंडा ’ पर आधारित नाटक का मंचन किया। जगदीश लाल श्रीवास्तव ने इसका नाट्य रूपान्तरण किया था जबकि निर्देशन बेचन सिंह पटेल ने किया। नाटक में आशुतोष पाल, सुमिरनजीत मौर्य, गंगा प्रसाद शुक्ल, बैजनाथ मिश्र, कुसुम, सूरज, नीरज कुमार, दीपाली, रेनू शर्मा ने अभिनय किया। परिकल्पना व रूप सज्जा नम्रता श्रीवास्तव की थी।

नाटक गुल्ली डंडा का मंचन
कार्यक्रम में हाल में दिवंगत कथाकार बादशाह हुसैन रिजवी और इतिहासकार प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव को याद करते हुए उनकी कहानी पढ़ी गई। डा. मुमताज खान ने बादशाह हुसैन रिजवी की कहानी चार मेहराबों वाली दालान और सुजीत श्रीवास्तव ने प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव की कहानी ‘ गरीब की दीवाली ’ का पाठ किया।
प्रेमचन्द जयंती समारोह के पहले दिन 30 जुलाई को इप्टा की गोरखपुर इकाई ने प्रेमचन्द की कहानी ‘ रंगीले बाबू ’ का मंचन किया था।
कार्यक्रम का संचालन मनोज कुमार सिंह ने किया।

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