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मुख्य सचिव की रिपोर्ट : आक्सीजन संकट, इसके कारणों और जिम्मेदारों को पूरी तरह से छुपा दिया गया

आक्सीजन हादसे के दौरान मृत बच्चे के परिजन विलाप करते हुए (फाइल फोटो)
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मनोज कुमार सिंह

बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर में आक्सीजन संकट के कारण बच्चों की मौत पर हंगामा मचने पर 13 अगस्त को गोरखपुर आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट आने दीजिए। दोषियों के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई होगी जो पूरे प्रदेश में मानक बनेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि समिति इस घटना के कारणों और आक्सीजन की सप्लाई के सभी विंदुओं पर जांच करेगी और इसके लिए जिम्मेदारों का पता लगाएगी।

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इसके ठीक दस दिन बाद 23 अगस्त को मुख्य सचिव की जांच रिपोर्ट आई और इस पर जिस कार्रवाई की संस्तुति की गई है वह भविष्य में बेहतरीन नजीर साबित नहीं होने जा रही क्योंकि इस रिपोर्ट में आक्सीजन संकट, इसके कारणों और जिम्मेदारों को पूरी तरह से छुपा दिया गया है। रिपोर्ट में आक्सीजन संकट पर एक शब्द नहीं है और इसके ज्यादातर पन्ने भविष्य की योजनाओं और नवजात शिशुओं की मौत, इंसेफेलाइटिस कम करने के उपायों के बारे में है जिसमें कुछ भी नया नहीं है। एक तरफ से ‘ सारे फसाने में जिसका जिक्र ( आक्सीजन )  था , उसको भुला दिया गया क्योंकि वही सरकार को बहुत नागवार गुजरी है।

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मुख्य सचिव की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री ने कार्रवाई की संस्तुति भी कर दी है। कार्रवाई की जद में बीआरडी मेडिकल कालेज के निलम्बित प्राचार्य व उनकी पत्नी, दो चिकित्सक, एक चीफ फार्मासिस्ट और प्राचार्य कार्यालय के तीन बाबू और लिक्विड आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड आए हैं। इनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम , कर्मचारी आचारण नियमावली के खिलाफ कार्य करने के आरोप में कार्रवाई होगी और एफआईआर दर्ज करायी जाएगी। इन लोगों में इस दौरान काफी चर्चा में आए बाल रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. कफील खान भी हैं जिन पर आपराधिक कार्रवाई की संस्तुति के साथ-साथ तथ्यों को छिपाकार शपथ पत्र दाखिल करने और मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के नियमों के खिलाफ कार्य करने का आरोपी बताया गया है।

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रिपोर्ट में बीआरडी मेडिकल कालेज में तीन वर्षो में दवाइयों और रसायनों की आपूर्ति की सीएजी से स्पेशल आडिट कराने की संस्तुति की गई थी जिसे स्वीकार कर लिया गया है।
मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली इस समिति में सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य आलोक कुमार, सचिव वित विभाग मुकेश मित्तल और एसजीपीजीआई के मेडिकल सुपरिन्टेण्डेंट डा. हेमचन्द्र शामिल थे।
समिति की रिपोर्ट में आक्सीजन संकट क्यों हुआ, आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी को भुगतान में देरी क्यों हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है, इसका जिक्र सिरे से गायब है। हालांकि समिति कहती है कि उसे पांच विंदुओं-बच्चों की मौत का घटनाक्रम एवं पृष्ठिभूमि, घटना के कारण एवं कारक अभिदाय, जिम्मेदार अधिकारियों व्यक्तियों के नाम, दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध प्रस्तावित कार्रवाई, ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए दीर्घकालीन व तत्कालीन व्यवहारिक सुझाव, पर रिपोर्ट देने को कहा गया था।

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हो सकता है कि समिति ने घटना के कारणों और जिम्मेदारों के बारे में रिपोर्ट दी हो लेकिन सरकार द्वारा मीडिया को जो रिपोर्ट दी गई है, उसमें आक्सीजन संकट के कारणों का उल्लेख नहीं है।
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के पहले अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा अनीता भटनागर जैन को उनके पद से हटा दिया गया था लेकिन उनके बारे में रिपोर्ट में कोई जिक्र नहीं है। इससे लगता है कि इस घटना में बड़े अफसरों को बचाने का काम हुआ है।

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यह अब ढकी-छुपी बात नहीं रह गई है कि बीआरडी मेडिकल कालेज को दवाइयों, चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, लिक्विड आक्सीजन का बकाया का धन, जरूरी उपकरणों व दवाइयों का बजट बीआरडी मेडिकल कालेज को बहुत देर से यानि अगस्त माह में मिला। नेशनल हेल्थ मिशन के जीएम और मिशन निदेशक को इस सम्बन्ध में मेडिकल कालेज की ओर से प्रस्ताव और कई रिमाइंडर दिए गए लेकिन उनकी ओर से कोई प्रस्ताव नहीं मिलने की बात कही गई।

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इसी तरह पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड ने बकाया भुगतान के लिए प्राचार्य को लिखे पत्रों की काॅपी प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा, महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा, डीएम गोरखपुर को भी भेजे। मेडिकल कालेज के निलम्बित प्राचार्य ने भी बयान दिया है कि भुगतान के सम्बन्ध में उन्होंने तीन रिमाइंडर भेजे थे। सवाल यह उठता है कि पुष्पा सेल्स के बकाए भुगतान के सम्बन्ध में प्राचार्य ने शिथिलता दिखाई तो लखनउ में बैठे मंत्री, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा विभाग, एनएचएम के अफसरों ने इस सम्बन्ध में क्या किया ? मेडिकल कालेज में लगातार मीटिंग करने वाले कमिश्नर और डीएम ने इस सम्बन्ध में क्या किया जबकि स्थानीय अखबारों में पेमेंट का भुगतान न होने व आक्सीजन संकट की आशंका के बारे में खबरें प्रकाशित हो रही थीं। आक्सीजन संकट के डेढ़ महीने के अंदर दो बार मुख्यमंत्री, दो बार अपर मुख्य चिकित्सा सचिव, एक बार स्वास्थ्य सचिव भी मेडिकल कालेज आए लेकिन इनकी नजरों में चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, आक्सीजन बकाए का भुगतान, उपकरणों की कमी की बात कैसे नहीं आई ?

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यहां यह भी जानने की बात है कि इस घटना के बाद पुराने प्रस्तावों को तुरन्त मंजूरी और बजट रिलीज करने का भी काम किया जा रहा है ताकि गलतियों पर पर्दा डाला जा सके।
कई वर्ष से प्रस्तावित एनआईसीयू को अपग्रेड करने के लिए 7.28 करोड़ का बजट दे दिया गया है जबकि पूर्व में केन्द्र व प्रदेश सरकार से कई बार मांग के बावजूद इसकी अनदेखी की जा रही थी।

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पांच वर्ष पहले गोरखपुर के लिए सैद्धान्तिक रूप से स्वीकृत रीजनल वायरोलाॅजी रिसर्च सेंटर को बीआरडी मेडिकल कालेज में स्थापित करने के लिए 85 करोड़ देने की घोषणा 13 अगस्त को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्ढा ने उस समय की जब वह आक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत के मामले के बाद गोरखपुर आए थे।

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जाहिर है कि बीआरडी मेडिकल कालेज को उसकी जरूरत का बजट काफी मुश्किलों के बाद रूक-रूक कर किश्तों में दिया जा रहा था। इस कारण चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, उपकरणों व दवाइयों की कमी का सामना मेडिकल कालेज को करना पड़ रहा था। ये संकट आखिरकार 10 अगस्त को एक बड़े संकट में बदल गया। पहले से ही जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे बच्चे और वयस्क मरीज आक्सीजन की कमी के भी शिकार हुए और उन्हें जान गंवानी पड़ी। इस बड़ी त्रासदी के लिए अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय सरकार पूरा ठीकरा मेडिकल कालेज के निलम्बित प्राचार्य, दो चिकित्सकों, कुछ बाबुओं पर थोप कर फिलहाल भले बच जाए लेकिन सरकारों के यही तरीके आने वाली त्रासदियों की भूमिका तैयार करते रहे हैं।

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रिपोर्ट के आखिरी पेज में आंकड़ों के हवाले से जेई और एईएस के केस व मृत्यु दर कम होने के दावे किए गए हैं और कहा गया है कि अब पीएचसी व सीएचसी पर भी मरीज जा रहे हैं और बीआरडी मेडिकल कालेज पर मरीजों का भार कम हुआ है। ये आंकड़े नेशनल वेक्टर वार्न डिजीज कन्ट्रोल प्रोग्राम की वेबसाइट से लिए गए हैं।
सभी जानते हैं कि इंसेफेलाइटिस के सर्वाधिक कहर वाला माह अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर का होता है और इन महीनों में मौतें अधिक होती हैं। इसलिए अभी तक के आंकड़ों के आधार पर मृत्यु दर कम होने का दावा करना सच से मुंह छुपाना है। इंसेफेलाइटिस की सच्ची तस्वीर बीआरडी मेडिकल कालेज, जिला अस्पतालों और सीएचसी-पीएचसी के आंकड़ों को अलग-अलग कर विश्लेषित करने से सामने आती है न कि सभी जगह के आंकड़ों को मिलाकर बताने से। मुख्य सचिव की रिपोर्ट से अलग 22 अगस्त तक के बीआरडी मेडिकल कालेज के आंकड़े बताते हैं कि अब तक इंसेफेलाइटिस के 598 केस रिपोर्ट हुए जिसमें 157 की मौत हो गई। यहां मृत्यु दर 26 फीसदी से अधिक है। एक तरफ मेडिकल कालेज में इतनी बड़ी संख्या में इंसेफेलाइटिस के मरीज भर्ती हुए जबकि गोरखपुर मंडल के चार जिलों-गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज और देवरिया के सीएचसी-पीएचसी पर भर्ती मरीजों का आंकड़ा 100 तक भी नहीं पहुंच पाया है और यहां जो मरीज आए वह तुरन्त मेडिकल कालेज रेफर हो गए। यही हाल जिला अस्पतालों का है। वहां जो मरीज पहुंचे उनमें से अधिकतर बीआरडी मेडिकल कालेज रेफर कर दिए गए। इसलिए सचाई का पैमाना मेडिकल कालेज का ही आंकड़ा है।

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