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विकास का मौजूदा माडल आदिवासियों, दलितों पर हिंसा का माडल है-बीजू टोप्पो

12वें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का आगाज 
ओमपुरी की याद में दिखाई गई ‘ आक्रोश ’, तीन दस्तावेजी फिल्में भी दिखाई गईं
गोरखपुर, 25 मार्च। प्रख्यात फिल्म अभिनेता ओमपुरी की याद में आदिवासियों और दलितों के संघर्ष पर केन्द्रित 12वां गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल आज सिविल लाइंस स्थित गोकुल अतिथि भवन में प्रारम्भ हुआ। फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए आदिवासी फिल्मार बीजू टोप्पो ने कहा कि विकास का आज का माडल आदिवासियों, दलितों के विस्थापन और उन पर हिंसा का माडल है। विकास के इस माडल ने समस्त वंचित समुदाय के सामने अपने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।
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बीजू टोप्पो ने आदिवासी बहुल राज्यों झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर आदिवासियों की जल, जंगल, जमीन को हड़पे जाने की साजिश का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि आज आदिवासियों के अपने ही राज्यों में अल्पसंख्यक होने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने प्रतिरोध का सिनेमा को महत्वपूर्ण आंदोलन बताते हुए कहा कि इस आंदोलन ने जनता के सिनेमा खासकर दस्तावेजी सिनेमा को छोटे शहरों-कस्बों के दर्शकों तक पहुंचाने में बड़ा योगदान दिया है।
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मीडिया विजिल के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार डा. पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि आज बेशक कठिन समय है लेकिन हमें अपनी सांस्कृतिक कार्यवाहियों को न सिर्फ करते रहने की जरूरत है बल्कि उन्हें समय के अनुसार बदलते हुए और विस्तारित करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संख्या में कम होने और कमजोर होने के बावजूद इतिहास में वही दर्ज होते हैं जो आंधियों का मुकाबला करते हैं न कि पीठ दिखाने वाले।
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प्रतिरोध का सिनेमा के नेशनल कन्वीनर संजय जोशी ने दो दिवसीय फेस्टिवल में दिखाएं जाने वाली फिल्मों के बारे में जानकारी दी और हाल में बच्चों के बीच सिनेमा दिखाने के अपने अनुभव को बयां किया। उन्होंने एक बच्चे की चिट्ठी का जिक्र किया जिसमें बच्चे ने लिखा था कि उसने अब जाना कि बालीबुड की फिल्मों के अलवा एक बड़ा फिल्म संसार है जिससे हमें दुनिया, समाज और लोगों के बारे में सही जानकारी मिलती है। श्री जोशी ने कहा कि बच्चे की यह प्रतिक्रिया हमारे फेस्टिवल की सार्थकता है।
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आयोजन समिति के अध्यक्ष मदन मोहन ने सभी अतिथि फिल्मकारों व संस्कृति कर्मियों का स्वागत किया और कहा कि 12 वर्ष तक गोरखपुर में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन एक बड़ा सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल ने गोरखपुर को एक नयी पहचान दी है।
उद्घाटन सत्र में नवारुण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कुबेर दत्त की पुस्तक ‘ एक पाठक के नोट्स ‘ का लोकार्पण हुआ।
उद्घाटन सत्र का संचालन गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के समन्वयक मनोज कुमार सिंह ने किया। इस मौके पर फिल्मकार नकुल सिंह साहनी, ओडेस्सा फिल्म कलेक्टिव से जुडे अम्बेडकर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के शिक्षक सिबिल के विनोदन भी उपस्थित थे।
‘ नाची से बांची ’ में दिखा रामदयाल मुंडा का आदिवासी समाज के लिए किया गया संघर्ष 
उद्घाटन सत्र के बाद बीजू टोप्पो और मेघनाथ द्वारा निर्देशित दस्तावेजी फिल्म ’ नाची से बांची ’ दिखाई गई। ‘ नाचेंगे तो बचेंगे ’ का नारा देने वाले मशहूर आदिवासी कलाकार विद्वान् और आदिवासी मुद्दों के योद्धा डॉ राम दयाल मुंडा के जीवन को कैद करती यह दस्तावेज़ी फ़िल्म आदिवासी समाज को बचाने के मुंडा जी के संघर्ष और प्रयासों को पूरे विवरणों के साथ अंकित करती है। फ़िल्म की शूटिंग मुंडा जी के घर खूँटी और उसके आसपास हुई और इसके निर्माण में एक वर्ष का समय लगा।
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फिल्म देखने के बाद दर्शकों ने फिल्म के निर्देशक एवं छायाकार बीजू टोप्पो से फिल्म और आदिवासियों के राजनीति, सांस्कृतिक संघर्ष को लेकर कई सवाल किए जिसका जवाब उन्होंने दिया।
इस फिल्म के बाद उड़ीसा के फिल्मकार सुब्रत साहू की दस्तावेजी फिल्म फलेम्स आफ फ्रीडम दिखाई गई। उड़ीसा के सामाजिक व राजनीतिक आन्दोलनों से गहरे जुड़े सुब्रत साहू ने की यह फ़िल्म दक्षिणी पश्चिमी उड़ीसा के कालाहांडी जिले के एक छोटे गावं इच्छापुर में आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों की सूचना देती है जिसकी घटनाओं को हाल में घटे गुजरात के दलित आन्दोलन के साथ जोड़ने पर धुर पूरब से लेकर पश्चिम तक एक बड़ा सामाजिक व राजनीतिक वृत्त बनता दिखाई देता है।
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बाहरी तौर पर हरा भरा और शांत दिखता इच्छापुर पिछले साल से अशांत है जबसे आदिवासियों की स्थानीय देवी डोकरी को इच्छापुर के ब्राहमणों द्वारा अपनी तरह से अपनाने और उन्हें फिर आदिवासियों के लिए ही वंचित कर देने का षड्यंत्र के खिलाफ संघर्ष को फिल्म में दिखाया गया है। यह आन्दोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण बनता दिखाई दे रहा है क्योंकि यह अस्मिता के सवाल से आगे बढ़कर जमीन के सवाल से अपने आपको जोड़ता हुआ दिखता है।
     फिल्म फेस्टिवल की तीसरी फिल्म सीवी सथ्यन की ‘ होली काउ ’ थी। यह फिल्म जानवरों के काटने के मुद्दों पर धार्मिक संस्थाओं,  आस्था, कर्मकांड, रीति रिवाज और त्योहारों की चर्चा करती है जो न सिर्फ इसे बढ़ावा देते हैं बल्कि इसका उत्सव भी मनाते हैं दूसरी ओर यह इसे जुड़े सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, कानूनी और आर्थिक तर्कों, जवाबों और विवादों की चर्चा करती है जो इस मुद्दे से जुड़े हैं। यह फ़िल्म खेतिहर समाज के औद्योगिक समाज में परिवर्तित होने के कारण मनुष्यों और जानवरों के संम्बंधों में आये बदलाव को भी रेखांकित करती है। इस फ़िल्म को दिल्ली के अम्बेडकर विश्विद्यालय के अध्यापक सिबिल के विनोदन ने प्रस्तुत किया जो सिनेमा के गहरे अध्येता होने के साथ दृसाथ ओडेस्सा कलेक्टिव से भी जुड़े हैं।
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आज की आखिरी फिल्म ओमपुरी अभिनीत चर्चित फिल्म ‘ आक्रोश ’ थी।  1980 में विजय तेंदुल्रकर की कथा पर छायाकार गोविन्द निहलानी द्वारा निर्देशित ‘आक्रोश ’ का ओम पुरी की अभिनय यात्रा में ख़ास महत्व है। आज आदिवासियों पर हो रहे व्यवस्था के हमले के मद्देनजर यह न सिर्फ ओम पुरी के लिए निर्णायक फिल्म साबित होती है बल्कि इस नई लहर को भी बखूबी स्थापित करती है। ‘ आक्रोश ’ का आदिवासी लहान्या भिकू ओम पुरी द्वारा निर्मित ऐसा चरित्र है जो इस फ़िल्म के बनने के 36 साल बाद हमें समझ में आ रहा है कि क्यों लहान्या पूरी फ़िल्म में चुप रहता है। ओम पुरी ने पूरी फ़िल्म में शायद तीन या चार बार संवद बोले हैं। आदिवासी समाज के दबे कुचले होने और व्यवस्था में बुरी तरह फंसे होने को उन्होंने बहुत कुशलता के साथ अपनी भाव भंगिमाओं और आंगिक चेष्टाओं  द्वारा व्यक्त किया है। इस फ़िल्म में आदिवासियों के सवाल अपनी पूरी गुत्थियों के साथ पेश किया गया है।