साहित्य - संस्कृति

संगोष्ठी, जनगीत और नाटक के साथ मनी आरिफ अजीज लेनिन की पुण्यतिथि

‘ रंगमंच की वर्तमान चुनौतियां ‘ पर संगोष्ठी हुई
प्रदीप कुमार पलटा और उनके साथियों ने जन गीत गाए
अलख कला समूह ने ‘ अभी वही है निजामे कोहना भाग-2 ’ का मंचन किया
गोरखपुर, 26 जनवरी। प्रेमचन्द साहित्य संस्थान, अलख कला समूह और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में शहर के जाने माने रंगकर्मी आरिफ अजीज लेनिन की पुण्यतिथि पर पाँचवां स्मृति समारोह मुंशी प्रेम चंद पार्क में बने मंच पर संगोष्ठी , गीत व नाटक का मंचन कर मनाया गया ।

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कार्यक्रम की शुरुआत ‘ रंगमंच की वर्तमान चुनौतियां ’ विषय पर संगोष्ठी से हुई। संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने रंगमंच सहित अन्य कला विधाओं के समक्ष अभिव्यक्ति के खतरे को चिन्हित किया। वरिष्ठ रंगकर्मी रविन्द्र रंगधर ने कहा रंगमंच की चुनौती हर काल में रही है लेकिन असल चुनौती अभिव्यक्ति पर अंकुश व नाटकों की गुणवत्ता का है । आमोल दा ने कहा कि आज नाटक का आमजन की जिंदगी से कट गया है। मतदान के लिए नाटक मंचित किया जाता है लेकिन किसानों की आत्महत्या, महिलाओं पर हिंसा उसका विषय नहीं है। राजकुमार सिंह ने रंगमंच के लिए सबसे बड़ी चुनौती अर्थ को माना।

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जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि समाज को बदलने में नाटक एक सशक्त माध्यम है। इसलिए इसे कुंद करने के सबसे अधिक प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का जिक्र करते हुए कहा कि सच कहने के लिए हमें हर खतरा उठाने का तैयार रहना होगा। फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने कहा कि आज उन्माद का ऐसा वातावरण बन गया है जिसमें तार्किक बातों के लिए कोई जगह ही नहीं बची है।
जेएन शाह और कंचन त्रिपाठी ने रंगमंच को सहायता देने के लिए समाज को आगे आने की अपील की और कहा कि हमें सरकारी प्रोत्साहन की अपेक्षा करने बजाय जनता से जुड़ना होगा। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने कहा कि आज स्ट्रीट सेंसरशिप हर विधा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। वरिष्ठ रंगकर्मी डा0 मुमताज खान ने सवाल उठाया कि हम संसाधनों की कमी का रोना कब तक रोते रहेंगे ? संसाधनों के अभाव से रंगमंच की सक्रियता का कोई सम्बन्ध नहीं है। सवाल प्रतिबद्धता का है।

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वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा के साहित्य की सभी विधाओं में जितना सृजन हुआ है उसका अधिकतर हिस्सा व्यवस्था के विरोध में है क्योंकि साहित्य और संस्कृति का यही काम है। वह समाज को पीछे ले जाने वाली शक्तियों का प्रतिरोध करता है। यही कारण है कि व्यवस्था साहित्य और संस्कृति से खतरा महसूस करती है और साहित्यकारों-लेखकों-पत्रकारों पर सत्ता जुल्म ढाती है। थिएटर समाज से जुड़ने वाला सबसे अधिक जीवंत माध्यम है। इसलिए उसको सशक्त करना समय की आवश्यकता है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जन नाटककार राजाराम चौधरी ने कहा कि सबसे अधिक समस्या नाटकों का न होना है। नए नाटक भी नहीं लिखे जा रहे हैं। पुराने नाटकों का ही मंचन हो रहा है। नये हिंदी नाटकों का सृजन न होना व सामान्य जनता का नाटकों से दूरी बनना सबसे बड़ी चुनौती है।

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संगोष्ठी के बाद प्रदीप कुमार पलटा व उनके साथियों द्वारा भोजपुरी जनगीत गाए गये। उनके गीत शिक्षा की स्थिति, महंगाई, बेरोजगारी, मेहनतकश के शोषण पर थे। गीतों में बदलाव के लिए संघर्ष का आह्वान भी था। उनके गीत ‘ सबही कहे कि संविधनवा महान बाटें /अरे भूखिया से बाटें बुरा हाल हो/बेरोजगारी से तड़पेला ललनवा/, निशिदिन मरेला किसान हो ’ को श्रोताओं ने काफी सराहा। ढोल व ऑर्गन पर संगत मनीष कुमार, सुशील गुप्ता तथा कोरस सुभाष मौर्य , प्रदीप कुमार व विजय का रहा।

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समारोह के आखिर में अलख कला समूह के कलाकारों ने राजाराम चौधरी द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक ‘ अभी वही है निजामें कोहना भाग-2 ’ का मंचन किया जिसमें बैजनाथ मिश्र  , कुसुम गुप्ता ,राकेश कुमार ,अनन्या  ,सृष्टि गोस्वामी , आशुतोष पाल , अमन कुमार, जंजीर सिंह बलमुआ और प्रदीप कुमार ने अभिनय किया। नाटक में बेरोजगारी , भुखमरी, किसानों की आत्महत्या के सवालों पर राजनीतिकों की लफ्फाजी पर करारा प्रहार किया गया है।

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नाटक में शायर देश के लेखकों, कवियों, कलाकारों का प्रतिनिधित्व करते हुए सत्ता का दमन सहते हुए अपने गीत के जरिए कहता है कि अभी व्यवस्था नहीं बदली है। शासक बदल गए हैं लेकिन जुल्म और शोषण वही है। जुल्म व शोषण का अंत गरीबों, मेहनतकशों, महिलाओं , युवाओं के सामूहिक संघर्ष से ही होगा।
तीन सत्रों में हुए इस समारोह का संचालन युवा रंगकर्मी बेचन सिंह पटेल ने किया।

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