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सौ साल से निकल रही फसाहत की साड़नी देखी है आपने

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सैयद फरहान अहमद

गोरखपुर, 11 अक्तूबर। मुहर्रम पर सोने-चांदी, गेहूं, शीशा, काठ, लकड़ी की ताजिया, मियां साहब इमामबाड़ा, शाही जुलूस के लिए यह शहर मशहूर हैं। इसके साथ ही एक ऐसी चीज भी जो सालों से जुलूसों की आन, बान, शान बनी हुई हैं जिसे फसाहत की साड़नी के नाम से जाना जाता हैं। नौंवी व दसवीं मुहर्रम के जुलूस में इसे शहर-भर में घुमाया जाता हैं।

दरअसल यह हुबहू ऊंटनी का प्रतीकात्मक लकड़ी का ढांचा हैं जिसे फसाहत की साड़नी कहा जाता हैं। शाहमारुफ में शाही जामा मस्जिद के करीब मीर फसाहत अली इमामबाड़ा हैं जहां दो साड़नियों का ढ़ाचा मौजूद हैं। इन्हें नौवीं और दसवीं मुहर्रम पर शहर में शान से घुमाया जाता हैं। इस वक्त इमामबाड़ा की मुतवल्ली जरीना बेगम हैं। इनके पुत्र सैयद मोहम्मद कमर ने बताया कि सौ सालों से भी ज्यादा समय से इसे निकाला जा रहा हैं। दोनों साड़नी की लम्बाई 8 मीटर और चौड़ाई 3 मीटर हैं। इन्हें आठवीं मुहर्रम को सजाया जाता हैं। पहले इन्हें रुई वगैरह से सजाया जाता था।अब तीन चार साल से मार्बल पेपर के जरिए बेहद शानदार तरीके से सजाया जाता हैं। आकर्षक बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जाती हैं। बकायदा तकनीक का प्रयोग करके इनका मुहं भी चलता रहता हैं। वास्तविकता लाने के लिए मुंह मे नीम की पत्ती रखी जाती है। साड़नी के ऊपर ताजिया रखा जाता हैं। अलम के संग ढोल ताशा बजाते हुए जुलूस निकाला जाता हैं। नौवीं को घंटाघर, रेती आदि जगहों से घुमाते हुए शाहमारुफ वापस लाया जाता हैं। दसवीं मुहर्रम को रात में इसे फिर निकाला जाता हैं। घंटाघर, रेती, नखास, खूनीपुर, लालडिग्गी, मदरसा चौराहा आदि जगहों से गुजारा जाता है।

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फसाहत की साड़नी को देखने के लिए लोग बेकरार नजर आते हैं। खास कर बच्चे। जब जुलूस में चलती हैं तो लोग देखते रह जाते हैं। इसे ठेले पर फिट किया जाता हैं। जब ऊंटनी का मुंह चलता हैं तो लोग दांतों तले उंगलिया दबा लेते है। पहले जब रुई को रंग कर इसे तैयार किया जाता था। तो अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता था कि असली है या नकली। लेकिन अब भी इसकी भव्यता बरकरार हैं। एक बार आप इसे देखेंगे तो देखते रह जायेंगे। सैयद मोहम्मद कमर ने बताया कि खानदान में इमाम हुसैन की अकीदतमंदी में इसे निकाला जाने का रिवाज शुरु हुआ था, जो आज भी जारी हैं। साड़नी की लकड़ी आज भी सही सलामत हैं। कुछ जगह से कुछ तिरछी हुई थी जिसे दुरुस्त कर लिया गया हैं।
मुफ्ती अजहर शम्सी ने बताया कि ने साड़नी का उर्दू अरबी शब्दकोश के मुताबिक मतलब हैं ऊंटनी की सवारी करना। इसका एक और मतलब है वह कासिद(सूचना पहुंचाने वाला) जो तेज रफ्तार ऊंट या ऊंटनी पर बैठकर खबरें या पैगाम ले जायें। चूंकि ऊंट या ऊंटनी को रेगिस्तान का जहाज कहते हैं। पहले जमाने में सवारी के तौर पर ऊंट व ऊटनी व घोड़ों का प्रयोग होता था। हजरत इमाम हुसैन व आपके साथी इन्हीं सवारियों के जरिए कर्बला पहुंचे। इसलिए मुहर्रम में प्रतीकात्मक रुप से दुलदुल व ऊंटनी को जुलूस के रुप में निकाला जाता हैं।⁠⁠⁠⁠

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