साहित्य - संस्कृति

‘ हजरत निजामुद्दीन औलिया इस ज़मीं पर मोहब्बत के आसमां ’

दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद पर हजरत निजामुद्दीन औलिया अलैहिर्रहमां का उर्स-ए-पाक

गोरखपुर, 6 जनवरी। नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद पर शुक्रवार को जुमा की नमाज के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया अलैहिर्रहमां का उर्स-ए-पाक मनाया गया। कुल शरीफ की रस्म अदा कर दुआएं की गयी।

इस मौके पर दरगाह मस्जिद के इमाम मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही ने हजरत निजामुद्दीन की जिंदगी व पैगामात पर रौशनी डालते हुए कहा कि हजरत निज़ामुद्दीन औलिया मानते थे कि ख़ुदा से इश्क तभी हो सकता है जब उसके बंदों से भी इश्क हो। सूफ़ीवाद की बुनियाद इश्क है। औलिया शब्द का अर्थ हैं ‘अल्लाह वाला’ यानी ‘अल्लाह का दोस्त’। हज़रत निजामुद्दीन औलिया चिश्तिया सिलसिले के सूफ़ी बुजुर्ग हुए जिन्हें ‘महबूब-ए-इलाही’ भी कहा गया। बदायूं में पैदा हुए और बाबा फरीद की सरपरस्ती में अजोधन रहे और बाद में दिल्ली चले आये। हजरत निजामुद्दीन कभी किसी के दरबार में नहीं गए पर उनका प्रभाव किसी सुल्तान से कम नहीं था। अमीर खुसरो फरमाते है कि हजरत निजामुद्दीन अपने खानकाह में किसी सुल्तान से कम हैसियत नहीं रखते। वे इस ज़मीं पर मोहब्बत का आसमां हैं। एक ऐसा सुल्तान जिसके सर पर न ताज है, न कोई राज पर सुल्तान भी जिसके पैरों की धूल अपने ज़बीं (माथे) पर लगाते हैं।

उन्होंने कहा कि हजरत निज़ामुद्दीन का समाज पर इतना असर था कि उनके कहने से दिल्ली में अपराध कम हो गए थे। उन्होंने हमेशा माना कि क़यामत के दिन यह हिसाब ज़रूर होगा कि तुमने अपनी रोज़ी कैसे कमाई। अगरचे ग़लत रास्ते का इख्तियार किया है, तो ख़ुदा सज़ा ज़रूर देगा। हजरत निजामुद्दीन ने अपने जीवन में दिल्ली की रियासत को तीन सल्तनतों के हाथों में देखा – ग़ुलाम, खिलज़ी और तुग़लक वंश।
कारी शराफत हुसैन कादरी ने कहा कि हज़रत निज़ामुद्दीन को अमीर ख़ुसरो से बेहद लगाव था। एक बार हजरत निजामुद्दीन ने अमीर ख़ुसरो के कलाम सुनकर उनसे कुछ मांगने को कहा तो ख़ुसरो ने अपने कलाम में शक्कर जैसी मिठास की चाह रखी। हजरत निजामुद्दीन ने उन्हें कमरे में से शक्कर लाने को कहा और कुछ दाने ख़ुद (ख़ुसरो) पर डालने को और कुछ खाने को कहा। इसके बाद ऐसा माना जाता है कि ख़ुसरो की शायरी एक नयी मिठास के साथ दुनिया के सामने आई। हजरत निजामुद्दीन के पर्दा फरमाने के छह महीने बाद ही ख़ुसरो ने भी अपने प्राण छोड़ दिए। उन्हें हजरत निजामुद्दीन की मज़ार के पास ही दफ्न कर दिया गया।
इस मौके पर हाफिज शहादत हुसैन, इकरार अहमद, शाकिब रजा, हाफिज रिजवान आलम, जमशेद अहमद, परवेज,  हाफिज अब्दुल अजीज, हाफिज मो. आतिफ रजा, हाफिज अशरफ रजा, रहमत अली आदि मौजूद रहे।

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