स्वास्थ्य

मिनी पीकू और ईटीसी से जुड़े 44 स्वास्थ्यकर्मियों को एईएस मरीजों के सीरम ट्रांसपोर्टेशन का प्रशिक्षण दिया गया

गोरखपुर.  जिले की तीन मिनी पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (मिनी पीकू) और 19 अरली ट्रीटमेंट सेंटर (ईटीसी) से जुड़े 44 स्वास्थ्यकर्मी संदिग्ध एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) मरीजों का सीरम जिला अस्पताल स्थित पैथालाजी पहुंचाएंगे। इन सभी स्वास्थ्यकर्मियों को मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) कार्यालय स्थित प्रेरणा श्री सभागार में जिला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी ओपीजी राव की मौजूदगी में प्रशिक्षित किया गया।

प्रशिक्षक व जेई-एईएस कंसल्टेंट डा. सिद्धेश्वरी सिंह ने बताया कि सीरम की जांच के बाद रिपोर्ट सीधे संबंधित मिनी पीकू और ईटीसी को प्रेषित की जाएगी।

प्रशिक्षक डा. सिंह ने बताया कि एईस मरीज के सीरम में 200 प्रकार के वायरस का संदेह होता है जिनमें से कुल 25-30 वायरस ही पहचाने जा सकते हैं। लिहाजा सीरम की जांच और ट्रांसपोर्टेशन बेहद संवेदनशील कार्य होता है। थोड़ी सी असावधानी से जांच के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। सभी स्वास्थ्यकर्मियों को एक-एक बिंदु की बारीकी से जानकारी दी गयी है।

जिला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी ने बताया कि सभी स्वास्थ्यकर्मियों को कोल्ड चेन मेंटेन करते हुए सीरम जिला अस्पताल तक पहुंचाने के बारे में बताया गया है। सीरम जांच और इसका परिणाम समुदाय की सेहत के लिए काम करने में हमारी मदद करता है। लिहाजा यह कार्य पूरी सावधानी से सुनिश्चित किया जा रहा है। कार्यक्रम में पाथ संस्था के जिला समन्वयक राहुल तिवारी भी मौजूद रहे।

ईटीसी व मिनी पीकू से ठीक हो रहे हैं मरीज : सीएमओ

सीएमओ डा. श्रीकांत तिवारी ने बताया कि इस साल सात अगस्त तक कुल 695 अत्यधिक बीमार लोग (खासतौर से बच्चे) जिले में बने ईटीसी पर पहुंचे। इनमें से 658 का इलाज कर उन्हें ईटीसी पर ही ठीक कर दिया गया जबकि एईएस के 33 संदिग्ध मरीजों को मिनी पीकू रेफर किया गया। इनमें 29 केस एईएस के निकले। 13 एईएस मरीजों को मिनी पीकू पर ही ठीक कर दिया गया जबकि बाकी लोगों को रेफर कर दिया गया।

उन्होंने बताया कि जिले में पिपरौली, चौरीचौरा और गगहा में 3-3 बेड का मिनी पीकू जबकि 19 स्वास्थ्य केंद्रों पर 2-2 बेड का ईटीसी संचालित हो रहा है।

कोल्ड चेन करेंगे मेंटेन

प्रशिक्षण की प्रतिभागी हरनही की स्टाफ नर्स पिंकी कुमारी और पिपरौली के स्वास्थ्यकर्मी शैलेष कुमार वर्मा ने बताया कि प्रशिक्षण में उन्हें ग्लब्स, मास्क से सेल्फ प्रोटेक्शन करते हुए सीरम से भरा वायल कोल्ड चेन मैंटेन करते हुए लैब तक पहुंचाने की जानकारी दी गयी है। उन्हें बताया गया है कि सैंपल में कोई लीक नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे रिपोर्ट प्रभावित हो सकती है।

समय से इलाज है एईस से बचाव
जेई-एईस कंसल्टेंट डा. सिद्धेश्वरी ने बताया कि एईएस अपने गंभीरावस्था में एक लाइलाज बीमारी है लेकिन अगर तेज बुखार होने पर समय से स्वास्थ्य केंद्र पहुंचा जाए तो बीमारी से बचाव हो सकता है। व्यक्तिगत साफ-सफाई, खुले में शौच न करना, शुद्ध पेजयल का सेवन और बुखार होने पर तुरंत चिकित्सक को दिखाने जैसे उपायों से इस बीमारी से बचाव किया जा सकता है।

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