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आक्सीजन हादसा : जेल में बंद आरोपियों के परिवार की व्यथा कथा

गोरखपुर. बीआरडी मेडिकल कालेज का आक्सीजन हादसा लगातार चर्चा में है। नौ अप्रैल को आक्सीजन सप्लायर पुष्पा सेल्स के निदेशक मनीष भंडारी की सुप्रीम कोर्ट से और 25 अप्रैल को बाल रोग विभाग के प्रवक्ता एवं एनएचएम के नोडल अधिकारी रहे डा. कफील की जमानत हाईकोर्ट से मंजूर हो गई और वे दोनों जेल से बाहर आ गए लेकिन सात आरोपी अभी भी जेल में हैं जिनमें तीन डॉक्टर, एक फार्मासिस्ट और तीन क्लर्क हैं।

इनमें से पूर्व प्राचार्य डा. राजीव मिश्र की जमानत याचिका 30 अप्रैल को हाईकोर्ट की डबल बेंच ने खारिज कर दी। एक मई को डा. राजीव मिश्र की पत्नी डा. पूर्णिमा शुक्ल और दो मई को एनस्थीसिया विभाग के अध्यक्ष रहे डा. सतीश कुमार, चीफ फार्मासिस्ट गजानन्द जायसवाल, लिपिक संजय त्रिपाठी, सुधीर पांडेय और उदय प्रताप शर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए नई तारीख अगले सप्ताह दी गई है। गजानंद जायसवाल की जमानत याचिका पर नौ मई को और डा. सतीश कुमार, सुधीर पांडेय, उदय प्रताप शर्मा व संजय त्रिपाठी की जमानत याचिका पर 8 मई को हाई कोर्ट में सुनवाई है।

डा. कफील अहमद खान, बाल रोग विभाग के प्रवक्ता एवं एनएचएम के नोडल अधिकारी

बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के प्रवक्ता एवं एनएचएम के नोडल अधिकारी रहे डा. कफील अहमद खान25 अप्रैल को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद 28 अप्रैल को जेल से रिहा हो गए। जेल के बाहर उनकी पत्नी, भाई व परिवार के अन्य सदस्यों के अलावा सैकडों लोगों ने स्वागत किया।

जेल से रिहा होने के बाद बसन्तपुर मोहल्ला स्थित उनके घर पर मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। इनमें बड़ी संख्या पत्रकारों की है जो उनसे इंटरव्यू लेने के लिए आ रहे हैं। घर में खुशी का माहौल है। पूरा परिवार एकत्र है। उनकी मां   कहती हैं कि बेटा घर आ गया, हम सब बेहद खुश हैं। ये सात महीनें बहुत परेशानियों वाले रहे हैं। पूरा परिवार टूट गया था।

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डा. कफील कहते है ये सात महीने मैं कभी भूला नहीं सकता। यह पूरे परिवार के लिए विपत्ति थी। मेरे भाई अदील का गोरखपुर और बहनोई समर खान का लखनउ में बिजनेस है। दोनों का बिजनेस बर्बाद हो गया क्योंकि वे सात महीने से गोरखपुर से लखनउ, इलाहाबाद और दिल्ली तक दौड़ भाग करते रहे। वह कहते हैं कि मै जब जेल गया तो मेरी बच्ची जबरीना 11 महीने की थी। अब 18 महीने की हो गई है। तब उसने चलना नहीं सीखा था। अब वह दौड़ रही है। उसके इस विकास क्रम मै देख नहीं सका। एक बाल रोग विशेषज्ञ और पिता के बतौर यह बहुत दुखदायी है। कफील बेटी को गोद में लेकर बोलते हैं कि घर आने पर दो दिन तक तो बेटी पहचान ही नहीं पायी। उसे लगा कि कोई अजनबी घर आ गया।

वह कहते हैं कि अब मै कुछ दिनों तक पूरा समय परिवार में देना चाहता हूं और आराम करना चाहता हूं। अब भी ट्रामा में हैं और उससे निकलने की जद्दोजेहद कर रहा हूं। अगर मेरा सस्पेंशन खत्म होता है तो फिर से बीआरडी मेडिकल कालेज में काम करना चाहूंगा।

डा. कफील के भाई अदील अहमद खान बताते हैं कि इस आठ महीनों में पूरे परिवार पर मुसबीत का पहाड़ टूट पड़ा। मेरा बिजनेस लगभग ठप हो गया। मै गोरखपुर से इलाहाबाद तक अदालत में दौड़ लगाता रहा। मैने भाई की बेगुनाही के सभी दस्तावेज एकत्र किए और अदालत में प्रस्तुत किया। मेरी मां और डा. कफील की पत्नी मुख्यमंत्री से भी मिली और इंसाफ मांगा। हम लोग अपनी बात रखने से भी डरते थे कि कहीं इससे डा. कफील पर कोई और मुसीबत न आ जाए। जब बेल में देर होने लगी तब हमने अपनी सबके सामने रखी।

डा. राजीव मिश्र और डा. पूर्णिमा शुक्ल

बीआरडी मेडिकल कालेज के पूर्व प्राचार्य डा. राजीव मिश्र के विरूद्ध 409, 308,120 बी आईपीसी, 7/13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत और उनकी पत्नी डा. पूर्णिमा शुक्ल के विरूद्ध 120 बी आईपीसी, 7/13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया है। दोनों को 29 अगस्त को कानपुर से गिरफ्तार किया गया था।

डा राजीव मिश्र मूल रूप से बरेली के रहने वाले हैं। चार दशक पहले वह बीआरडी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस की पढ़ाई करने आए थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह यहीं पर पैथालाजी में फैकेल्टी हुए। बाद में वह पैथालाजी विभाग के अध्यक्ष हुए। जनवरी 2016 में वह मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य बने थे।

डा. राजीव मिश्र पर आरोप है कि बजट रहते हुए भी आक्सीजन का बकाया भुगतान नहीं किया। स्थिति को जानते हुए भी डीजीएमई से अनुमति बिना अवकाश पर चले गए। उन पर और उनकी पत्नी डा. पूर्णिमा शुक्ल पर भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं।

डा पूर्णिमा शुक्ला गोरखपुर जिले में गोला स्थित राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय में वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात थीं। बाद में उनका तबादला बीआरडी मेडिकल कालेज स्थित होमियोपैथी रिसर्च सेंटर में हो गया। चार्जशीट में आरोप है कि उनका मेडिकल कालेज के प्राचार्य कार्यालय में पूरा दखल था। वह प्रधानाचार्य के कमरे में भी बैठती थीं और सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती थीं।

डा. राजीव मिश्र और डा पूर्णिमा शुक्ल के इकलौते बेटे डा. पुरक मिश्र सर्जन हैं। उन्होंने मनिपाल कालेज आफ मेडिकल साइंसेज से एमबीबीएस और इन्द्रप्रस्थ अपोलो से जनरल सर्जरी में पीजी किया। इसके बाद वह सीनियर रेजीडेंट के बतौर अपोलो में काम कर रहे थे कि आक्सीजन हादसे में माता-पिता को जेल हो गई और कानूनी लड़ाई उनके कंधों पर आ गई। पिछले आठ महीने से दिल्ली, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनउ का चक्कर लगाने की वजह से उनकी जाब छूट गई। सितम्बर 2017 में हायर फेलोशिप के लिए एमआरसीएक का उन्हें परीक्षा देनी थी लेकिन इस घटन की वजह से वह परीक्षा भी नहीं दे पाए।

मिश्रा परिवार 13 वर्षों के भीतर दूसरी बार बड़ी त्रासदी का सामना कर रहा है। पुरक मिश्र की बहन जब कक्षा सात में थी तो स्कूल के दक्षिण भारत के टूर में अचानक निधन हो गया था। यह घटना 2004 में हुई जब पुरक ने अपनी बहन को खो दिया। अब वह अकेले हैं और माता-पिता जेल में बेल की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

डा. पुरक ने 15 अप्रैल को इंडियन मेडिकल एसेासिएशन के अध्यक्ष को पत्र लिख कर जेल में पिता के गिरते स्वास्थ्य और उनके इलाज की व्यवस्था न होने के बारे में जानकारी दी।

डा. पुरक मिश्र ने बताया कि उनके 63 वर्षीय पिता कई गंभीर रोगों से पीड़ित हैं। वह 27 वर्ष पुराने मधुमेह रोगी है और उन्हें इंसुलिन लेना पड़ता है। उन्हें कोरोनरी आर्टलरी डिजीज है। काफी प्रयास के बाद जेल प्रशासन ने इलाज के लिए लखनउ के राम मनोहर लोहिया इंस्टीच्यूट में भेजा तो वहां उनकी एंजियोग्राफी हुई। वहीं जांच में पता चला कि उनके आहार नाल में गांठे बन गई हैं। उन्हें ग्रेड 4 फाईब्रोसिस के साथ नाअल्कोहलिक लीवर सिरोसिस भी है। चिकित्सकों की सलाह है कि उन्हें नियंत्रित आहार दिया जाय और बेड पर सोने की सुविधा दी जाए लेकिन जेल के अंदर उन्हें यह सुविधा नहीं दी जा रही है।

चार मई की रात उनकी तबियत फिर बिगड़ गई. इसके बाद उन्हें 5 मई की सुबह उन्हें इलाज के लिए  राम मनोहर लोहिया इंस्टीच्यूट भेजा गया है.

डा. पुरक ने बताया कि जेल के बाथरूम में गिरने से उनकी60 वर्षीय मां को चोट आयी है लेकिन उनका ठीक से इलाज नहीं हो रहा है। वह हाइपरटेंशन, लुम्बर स्पांडलाइटिस के साथ-साथ लंग डिजीज के कारण सांस लेने में दिक्कत की बीमारी है। डा. पुरक कहते हैं कि कहते हैं कि उनके पिता डा राजीव मिश्र को मीडिया की नाराजगी को संतुष्ट करने के लिए आरोपी बनाया गया। प्रथम दृष्टया कोई साक्ष्य नहीं होते हुए मीडिया और सरकार ने उन्हें अपराधी घोषित कर दिया। जब सरकार ने कहा है कि आक्सीजन की कमी नहीं हुई और नेचुरल डेथ है तो फिर डा. राजीव मिश्र को 308 आईपीसी का आरोपी कैसा बनाया जा सकता है ? सरकार ने बकाया भुगतान के लिए बजट ही नहीं दिया जबकि पुष्पा सेल्स को भुगतान कैसे होता। उन्हांने बताया कि डा राजीव मिश्र अवकाश लेकर ऋषिकेश स्थित एम्स गए थे। उन्होंने कार्यवाहक प्राचार्य को चार्ज दिया था। चूंकि वह पैथालाजी विभाग के अध्यक्ष थे, तो उन्होंने विभाग के सबसे सीनियर को भी चार्ज दिया था और फिर ऋषिकेश गए। इसके सबूत मौजूद हैं। उन्होंने लिक्विड आक्सीजन के भुगतान के लिए शासन को बार-बार रिमाइंडर भेजा लेकिन बजट समय से नहीं दिया गया।

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गजानंद जायसवाल, चीफ फार्मासिस्ट

चीफ फार्मासिस्ट  58 वर्षीय गजानंद जायसवाल मूल रूप से गोरखपुर जिले के पीपगंज कस्बे के रहने वाले हैं। पांच वर्ष पहले वह तबादला होकर बीआरडी मेडिकल कालेज आए थे। वर्ष 2016 में उन्हें जम्बो आक्सीजन की आपूर्ति की जिम्मेदारी मिली थी। एफआईआर में उन पर आरोप लगाया गया है कि उनके द्वारा डा. पूर्णिमा शुक्ला के साथ दुरभिसंधि कर कमीशन हेतु फर्मों के बिल का भुगतान मनमाने ढंग से अनधिकृत रूप से धन उगाही कर भ्रष्टाचार किया जाता था। पुलिस ने जांच के बाद उनके विरूद्ध 120 बी, 466, 468, 469, 471 आईपीसी तथा 7/13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप पत्र दाखिल किया है। उन्हें 14सितम्बर को गिरफतार किया गया था।

श्री जायसवाल के घर में पत्नी और इकलौता बेटा वैभव जायसवाल है। 26 वर्षीय वैभव नई दिल्ली में कम्प्यूटर कम्पनी में काम कर रहे थे। पिता के जेल जाने के कारण उन्हें नौकरी छोड़कर घर लौटना पड़ा है क्योंकि मां की मदद करने और पिता के लिए कानूनी लड़ाई  लड़ने वाला और कोई नहीं है।

वैभव ने बताया कि पिता दो वर्ष बाद रिटायर होने वाले थे। पूरे कैरियर में उन पर कोई आरोप नहीं लगा। रिटायरमेंट के वक्त उनको झूठे केस में फंसा दिया गया। उनके पिता पर लिक्विड आक्सीजन से सम्बन्धित कोई काम नहीं था। उनका काम सिर्फ जम्बो सिलेण्डर की  आपूर्ति देखनी थी। उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने कोई लागबुक नहीं बनाया था जोकि गलत है। जब उन्हें इसकी जिम्मेदारी मिली थी, तो उन्हें पहले का कोई लागबुक चार्ज में नहीं दिया गया। अपने कार्यकाल में पिता ने आक्सीजन सिलेण्डर का पूरा हिसाब-किताब रखा था और उसे सम्बन्धित प्रपत्र में दर्ज किया था। उन्होंने रिजर्व में जितना जम्बो सिलेण्डर होना चाहिए था, उतना स्टाक में रखा था। उनका आक्सीजन के भुगतान से कोई वास्ता नहीं था। इसके बावजूद उन पर एफआईआर दर्ज कर दिया गया।

वैभव ने बताया कि वह 14 अप्रैल को जेल मे मिलने पिता से गए थे। पिता बहुत हताश दिख रहे थे। बोले-‘ पता नहीं कितने दिन और रहना पड़ेगा। आखिर मुझे किस बात की सजा दी जा रही है। ’ वैभव ने बताया कि पिता मधुमेह से पीड़ित हैं और जेल में संतुलित खान-पान न होने से सुगर अनियंत्रित हो गया है। मां अक्सर बीमार रहती हैं।

संजय कुमार त्रिपाठी, सहायक लिपिक लेखा कार्य

संजय कुमार त्रिपाठी के विरूद्ध 120 बी आईपीसी और7/13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया है।

48 वर्षीय संजय त्रिपाठी का घर जगरनाथपुर में है। घर में पत्नी और 12 वर्ष और सात वर्ष के दो बच्चे हैं। पति के जेल जाने के बाद उनकी मदद के लिए उनके भाई अनुराग आए हैं। हमारी बातचीत अनुराग से हुई । अनुराग में बताया कि इस घटना के बाद से बहन की तबियत अक्सर खराब रह रही है। संजय त्रिपाठी बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य आफिस में एकाउंटेट थे। उनके जिम्मे छात्र वृत्ति, लघु निर्माण, फर्नीचर आदि के भुगतान की जिम्मेदारी थी। लिक्विड आक्सीजन की आपूर्ति और भुगतान का कार्य नेहरू चिकित्सालय से होता था। संजय की  इसमें कोई भूमिका नहीं थी लेकिन उन्हें सिर्फ एकाउंटेट होने के नाते इस मामले में फंसा दिया गया। हम लोग काफी परेशान हैं। दो छोटे बच्चों की देख रेख के साथ अदालत का चक्कर लगाना काफी मुश्किल हो रहा है।

सुधीर कुमार पांडेय, सहायक लिपिक

49 वर्षीय सुधीर पांडेय को 9 सितम्बर को गिरफतार किया गया था। उन पर आरोप है कि प्रधानाचार्य डा. राजीव मिश्र के साथ उनकी दुरभिसंधि थी और उत्कोच की लालसा के कारण पुष्पा सेल्स को समय से भुगतान करने में देरी की। सुधीर कुमार पांडेय के खिलाफ पुलिस ने 120 बी आईपीसी और7/13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में आरोप पत्र दाखिल किया है।

सुधीर पांडेय का घर मेडिकल कालेज के पीछे वाली कालोनी में है। उनके बेटे सुयश पांडेय ने बताया कि वह दो भाई हैं। वह एमबीबीएस की तैयारी कर रहे हैं। पिता के जेल जाने से उनकी पढाई डिस्टर्व हो गई है। बड़ा भाई सुप्रिय पांडेय कोटा में रह कर कम्पटीशन की तैयारी कर रहा है। पिता की ही सेलरी से घर का खर्चा चलता था। सस्पेंड होने के नाते अब आधी सेलरी ही मिल रही है। हम काफी आर्थिक कठिनाई से जूझ रहे हैं। मां अकेले घर और कोर्ट कचहरी का काम देख रही हैं। अभी वह कल ही इलाहाबाद से लौटकर आयी हैं।

सुप्रिय ने कहा कि उसके पिता बहुत ही मजबूत इच्छा शक्ति के हैं लेकिन सात महीने जेल में रहते हुए बुरी तरह टूट गए हैं। पिछले सप्ताह जब मैं उनसे मिला तो उनकी स्थिति देख कर रोना आ गया। वह अवसाद में थे। डा.कफील की जमानत होने पर उन्हें आशा थी कि उन्हें भी बेल मिल जाएगी लेकिन बेल पर सुनवाई की तारीख एक सप्ताह आगे टल जाने से वह बेहद निराश थे। पिता ने बताया कि उनके पिता का मार्च2017 में पटल परिवर्तन कर दिया गया था। घटना के समय लिक्विड आक्सीजन की आपूर्ति, भुगतान से सम्बन्धित कोई जिम्मेदारी उनके पास नहीं थी।

आक्सीजन हादसे के नवें आरोपी कनिष्ठ सहायक लेखा अनुभाग उदय प्रताप शर्मा से काफी प्रयास के बाद भी सम्पर्क नहीं हो पाया।

About मनोज कुमार सिंह

मनोज कुमार सिंह गोरखपुर न्यूज़ लाइन के संपादक हैं