साहित्य - संस्कृति

इफ्तार की खुशबू से मुअत्तर माह-ए-रमजान की फिजां

गोरखपुर। माह-ए- रमजान का फैजान बदस्तूर जारी हैं। रोजा खैर से गुजर रहा है। इबादत-ए-इलाही में बंदे मशरूफ हैं । अल्लाह भी बंदे की इबादत से राजी हैं। इसलिए तो रोजेदार के लिए तमाम नेमतें हैं। रोजेदार का हर काम इबादत में शुमार हैं। खाना, पीना, सोना, उठना, बैठन, सांस लेना। अन्य दिनों में हम कुछ खाये-पीये, पहनें तो हिसाब ले अल्लाह। रमजान मे खाये-पीये, पहने तो अल्लाह दे इबादत का सवाब। अल्लाह का फज्ल अपने रोजेदार बंदों पर खास हो रहा है। पाक रमजान की बरकत चल रही है। सभी फैजयाब हो रहे है।

मुस्लिम बहुल इलाकों नखास स्थित कई होटल, रेती, घंटाघर, शाहमारूफ, उर्दू बाजार जामा मस्जिद के नीचे वलीउल्लाह का होटल, जाफरा बाजार, रसूलपुर, इलाहीबाग, पिपरापुर, जाहिदाबाद, गोरखनाथ, तुर्कमानपुर आदि की फिजा इफ्तार की खुशबू से मुअत्तर (महक रही) है। यहां इफ्तार के लिए लजीज जायकेदार व्यंजन तैयार हो रहा हैं। इबादतगुजारों के लिए इबादतगुजार बना रहे है दिलकश लजीज व्यंजन। जिनका नाम सुनते मुहं में पानी आ जाए।

अलसुबह इन क्षे़त्रों के होटल गुलजार होने लगते है। फज्र की नमाज व तिलावत के बाद शुरू होता है रोजादारों के इफ्तार व खाने की तैयारी का इंतजाम। इन होटलों  पर रात भर लगा रहता है लोगों का तांता। यकीन जानिए आप को ऐसा महसूस होगा कि हम अमीनाबाद के किसी हिस्से में आ गए है। जहां  देर रात तक लोगों की चहल पहल बदस्तूर जारी रहती हैं। भाई मौका भी है दस्तूर भी। अल्लाह का करम है जो उसने यह नेमत अजीम अता की।

खाने का मीनू भी गजब का हैं। सबसे पहले इफ्तार की तैयारी शुरू होती है जिसमें तमाम तरह की पकौड़ियां मसलन आलू, बैंगन, केला, लौकी की पकौड़ियां। इसके अलावा अंडे की पकौडि़या बननी शुरू होती है। यह सब सुबह से बननी शुरू होती है। दोपहर के बाद से इन्हें तलने का काम शुरू होता है। शाम होते रोजेदारों की भीड़ उमड़ने लगती है। इफ्तार तक आधे से ज्यादा सामान फरोख्त हो जाता है। इफ्तार के साथ लजीज व्यंजन भी तैयार होते है।

इन क्षे़त्रों में ज्यादातर नानवेज आइटम ही बनते हैं। इनमें मटन, चिकन मीट, ब्रियानी, अंडा करी, स्टू मटन, चिकन, कोरमा, दाल, सादा चावल, फ्राई चावल, कलेजी, कीमा, एक दो सब्जी। इनका जायका लेेेने के लिए बाकरखानी, शिरमाल, नान रोटी, रूमाली रोटी आपको बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होगी। लजीज व्यंजन का मजा चख लिया तो जनाब मीठा भी है। शाही टुकड़ा आपका खैरमकदम करता है। इसी के साथ आपको खीर भी मिलेगी।

दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद मस्जिद में दिया गया शरई अहकाम का दर्स
नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां मस्जिद में पूरे रमजान माह तक चलने वाले शरई अहकाम (दीन की बातें) के दर्स का प्रोग्राम शनिवार से बाद नमाज जोहर शुरू हो गया। जिसमें करीब 100 से अधिक लोगों की सहभागिता रही।

दर्स में मौलाना मकसूद आलम मिस्बाही, मुफ्ती मो. अजहर शम्सी व कारी शराफत हुसैन कादरी ने इल्म की महत्ता पर प्रकाश डाला। इल्म के प्रकार बताए गए। उलेमा ने कहा कि इस्लाम में दीन का इल्म सीखना बेहद जरुरी हैं। जब हम दीन की बुनियादी बातें जानेंगे, कुरआन सही ढ़ंग से पढ़ना व समझना जानेंगे तब ही हमारी इबादत हमारे लिए फायदेमंद साबित होगी। दुआ कबूल होगी।

समाज में बहुत से ऐसे लोग जो किसी वजह से दीन की बातें नहीं सीख पाते हैं उन्हें संकोच छोड़ना चाहिए। जभी जागो तभी सवेरा हैं। इल्म हासिल करनी की कोई उम्र नहीं होती है। आप खुशनसीब है जो रमजान में रोजा रखकर, नमाज पढ़ कर इल्म हासिल करने के लिए जमा हुए है। दरगाह के मुतवल्ली इकरार अहमद ने बताया है कि यह शरई अहकाम सीखने का प्रोग्राम पूरे रमजान तक बाद नमाज जोहर चलता रहेगा। इसमें नमाज, हज, रोजा, जकात आदि बातों के बारे में विस्तार से बताया जायेगा ।
इसके अलावा नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में मौलाना असलम रज़वी ने, मस्जिदे मदद अली (एक मीनारा) बेनीगंज में कारी शाबान बरकाती ने, नूरी जामा मस्जिद अहमद नगर चक्शा हुसैन में मुफ्ती नूर मोहम्मद तनवीरी ने, सब्जपोश मस्जिद जाफरा बाजार में हाफिज रहमत अली निजामी ने, गौसिया मस्जिद छोटे काजीपुर में मौलाना मोहम्मद अहमद ने व खादिम हुसैन मस्जिद तिवारीपुर में हाफिज व कारी अफजल बरकाती ने शरई अहकाम का दर्स दिया।

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