साहित्य - संस्कृति

देवेन्द्र आर्य की दो कविताएं : ‘ भेड़िए अब खेतों में नहीं छिपा करते ’

(1)  हांका

हांका लगता रहा
सारी-सारी रात जागते रहे लोग
भेड़िया आया भेड़िया आया
भेड़िया नहीं आया

निराश हुई नयी पीढ़ी
पहली बार देखती भेड़िए को अपनी आंखों
पुचकारती
सराहती
ढेला मारती
दौड़ाती
हू हू करती
मगर तमाशा न हुआ

बटोर हुई
खैनी-पान
नींद ख़राब हांका
भेड़िया आया ही नहीं !
हवा बांधते रहे सयाने

उन्हें पता है कि भेड़िए ने अबतक गुस्से में
तहस नहस किए होंगे कुछ खेत
तमतमाया होगा
उछला कूदा दांव लगाया होगा चुपचाप
कि हांका थमे और वह गांव में घुसे

जानते हैं बुज़ुर्ग कि माहौल पहचानते हैं भेड़िए
डरते हैं मशालों से
जब जब हांकों में ढील हुई है
गांव की सीवान लांघी है भेड़िए ने

आया था इसके पहले एकबार
मुलायम  रोएंदार चेहरे पर स्त्रियोचित लावण्य लिए
कविताएं लिखी थीं तब
आज के हांके में शामिल बहुतों ने
भेड़िए की रक्ताच्छादित आंखें देख रोमांचित हुए थे
आदमी हो तो भेड़िए जैसा मर्द
एक के पीछे पूरा गांव
फिर भी बंदा दे गया दांव !

उस दिन मुरदार पड़े इस मुहावरे पर धार चढ़ी थी
भेड़िया आया  भेड़िया आया

अबकी सचेत रहे लोग
हांका लगता रह सारी रात
पर भेड़िया नहीं आया

भेड़िए रोज़ रोज़ नहीं आते

मुहावरा फिर गलत निकला
मुहावरे का ग़लत होना ही शायद सच होना है
भेड़िया नहीं आया तो बस इसलिए
कि हांका लगता रहा

पाठकों !
कवि ने इस कविता में कुछ छिपा लिया है
कहीं ऐसा तो नहीं कि भेड़िए ने गांव और
गांव वालों के हांका लगाने का गहरा अध्ययन विश्लेषण किया हो
मशालों के जलने बुझने के आंकड़े इकट्ठा किए हों
और पहले ही छिप कर घुस आया हो गांव में
किसी देवीथान
या खंडहर के पीछे
या किसी बाऊ साहब के खंझासिया आहाते में
कि हांका लगा कर थके लोग सोएं
तो वह नमूदार हो

भेड़िए अब खेतों में नहीं छिपा करते

(2) ठेस

विचारधारा की ठेस खाए मित्रों !
भूलो मत
कभी विचारधारा की इसी नदी में तैरे थे तुम
छपकोइयां मारी थीं
बाहों की मछलियां तैराई थीं
तरोताज़ा हुए
मल-मूत्र उत्सर्जित किए

लगातार सूखती हुई मां को
महादेव बनाने में तुम्हारा कितना हाथ रहा मित्रों ?
पूजा जिन विचार-शिलाओं को
ठेस उसी से खाई

विश्वास की ठेस भीतर तक करकती है न!

मित्रों , लाल हो आई चोट को हौले-हौले रगड़ो
कि नीला न पड़ जाए
ख़ून का थक्का बनना ठीक नहीं
विचारों की गुलठी न बने
उन्हें रगड़ो और दर्द को काफ़ूर समझ आगे बढ़ो

कोई ठोकर जिंदगी नहीं रोक सकती

( देवेन्द्र आर्य कविता की दुनिया में जाना माना नाम हैं. सम्पर्क –‘ आशावरी ‘ , ए-127 आवास विकास कालोनी शाहपुर , गोरखपुर-273006 मोबाइल: 7318323162 )

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