34.2 C
New Delhi
Trending now

क्या वाकई मैं कुसूरवार हूँ ? नहीं ! बिलकुल नहीं…

मनुष्य बन पाने की जद्दोजहद के साथ आत्मालोचना के भाव…

प्रेम कैद नहीं करता, दायरे नहीं खींचता , तोड़ता नहीं…

महराजगंज के 18 वनटांगिया गांवों में चकबंदी होगी, शासनादेश आने…

सफाई मजदूर एकता मंच के सम्मेलन में न्यूनतम वेतन 26…

लोकरंग -2024 में आएंगे भोजपुरी पॉप रैपर रग्गा मेन्नो, असम,…

FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat

Gorakhpur NewsLine

सबद हमारा षरतड़ षांडा
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
Gorakhpur NewsLine
  • Home
  • स्वास्थ्य
  • डॉक्टरों की कमी से जूझता देश
स्वास्थ्य

डॉक्टरों की कमी से जूझता देश

by गोरखपुर न्यूज़ लाइनMay 1, 2016May 20, 20160168
Share00

जावेद अनीस

आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश भारत में स्वास्थ्य सेवायें भयावह रूप से लचर है और यह लगभग अराजकता की स्थिति में पहुँच चुकी है, भारत उन देशों में अग्रणी है जिन्होंने अपने सावर्जनिक स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण किया है और सेहत पर सबसे कम खर्च करने वाले देशो की सूची में बहुत ऊपर है. दूसरी तरफ ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन” के मानकों के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर एक डाक्टर होने चाहिए लेकिन भारत इस अनुपात को हासिल करने में बहुत पीछे है और यह अनुपात 2.5 के मुकाबले मात्र 0.65 ही है. पिछले 10 सालों में यह कमी तीन गुना तक बढ़ी है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्ढा ने फरवरी 2015 को राज्यसभा में बताया था कि देश भर में 14 लाख डाक्टरों की कमी है और प्रतिवर्ष लगभग 5500 डाक्टर ही तैयार हो पाते हैं।’’ विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में तो स्थिति और भी बदतर है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. ग्रामीण इलाकों में तो यह आंकड़ा 82 फीसदी तक पहुंच जाता है. यानी कुल मिलाकर हमारा देश ही बहुत बुनियादी क्षेत्रों में भी डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है. यह स्थिति एक चेतावनी की तरह है.

 

  • देश भर में 14 लाख डाक्टरों की कमी
  • सर्जरी, स्त्री रोग और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50 फीसदी डॉक्टरों की कमी
  • विदेशों में 86,680 भारतीय डॉक्टर

 

शायद इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में यह फैसला लिया था कि वह विदेशों में पढ़ाई करने वाले डाक्टरों को ‘नो ऑब्लिगेशन टू रिटर्न टू इंडिया (एनओआरआई)’ सर्टिफिकेट जारी नही करेगी जिससे वो हमेशा के लिए विदेशों में रह सकते थे. इसके बाद महाराष्ट्र के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने सरकार के इस फैसले को मानवीय अधिकार और जीने के अधिकार का उल्लंघन बताकर हाईकोर्ट में फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। एसोसिएशन द्वारा दायर की गई इसी याचिका के जवाब में स्वास्थ मंत्रालय हलफनामा दायर कर कहा है कि ‘देश खुद डॉक्टरों की भारी कमी का सामना कर रहा है। ऐसे में सरकार से उम्मीद नहीं की जा सकती है कि डॉक्टरों को विदेश में बसने की अनुमति दे और यह सर्टिफाई करेगी कि देश को उनकी सेवा की जरूरत नहीं है’.

भूमंडलीकरण के बाद विदेश जाकर पढ़ने वाले भारतीयों की तादाद भी बढ़ी है, चीन के बाद भारत से ही सबसे ज्यादा लोग पढ़ने के लिए विदेश जाते हैं. एसोचैम के अनुसार हर साल करीब चार लाख से ज्यादा भारतीय विदेशों में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं। उनका मकसद केवल विदेशों से डिग्री लेकर लेना ही नहीं बल्कि डिग्री मिलने के बाद उनकी प्राथमिकता दुनिया के किसी भी हिस्से में ज्यादा पैकेज और चमकीले कैरियर की होती है. सरकार का यह निर्णय देश से प्रतिभा पलायन 2012 में लिए गए नीतिगत फैसले की एक कड़ी है, एक अनुमान के मुताबिक देश के करीब 32% इंजीनियर, 28% डॉक्टर और 5% वैज्ञानिक विदेशों में काम कर रहे हैं. भारत दुनिया के प्रमुख देशों, को सबसे अधिक डॉक्टरों की आपूर्ति करता है. ‘इंटरनैशनल माइग्रेशन आऊटलुक (2015)’ के अनुसार विदेशों में कार्यरत भारतीय डॉक्टरों की संख्या साल 2000 में 56,000 थी जो 2010 में 55 प्रतिशत बढ़कर 86,680 हो गई। इनमें से 60 प्रतिशत भारतीय डाक्टर अकेले अमरीका में ही कार्यरत हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय डॉक्टरों की कमी को देखते हुए अपने इस फैसले से विदेशों में बसने वाले डॉक्टरों पर रोक लगाना चाहती थी लेकिन डॉक्टरों की कमी का एक मात्र कारण यह नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक देश में इस समय 412 मेडिकल कालेज हैं। इनमें से 45 प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में और 55 प्रतिशत निजी क्षेत्र में हैं। हमारे देश के कुल 640 जिलों में से मात्र 193 जिलों में ही मेडिकल कालेज हैं और शेष 447 जिलों में चिकित्सा अध्ययन की कोई व्यवस्था ही नहीं है। मौजूदा समय में डॉक्टर बनना बहुत महंगा सौदा हो गया है और एक तरह से यह आम आदमी की पहुंच से बाहर ही हो गया है। सीमित सरकारी कालेजों में एडमीशन पाना एवेरस्ट पर चढ़ने के बराबर हो गया है और प्राईवेट संस्थानों में दाखिले के लिए डोनेशन करोड़ों तक चूका गया है ऐसे में अगर कोई कर्ज लेकर पढाई पूरी कर भी लेता है तो वह इस पर हुए खर्चे को ब्याज सहित वसूलने की जल्दी में रहता है. यह एक तरह से निजीकरण को भी बढ़ावा देता है क्योंकि इस वसूली में उसे दवा कंपनियां पूरी मदद करती है. डॉक्टरों को लालच दिया जाता है या उन्हें मजबूर किया जाता है कि कि महंगी और गैर-जरूरी दवाईया और जांच लिखें.

निजी अस्पतालों के क्या सरोकार हैं उसे पिछले दिनों हुई एक खबर से समझा जा सकता है, घटना बिलासपुर की है जहाँ इसी साल मार्च में तीरंदाजी की राष्ट्रीय खिलाड़ी शांति घांघी की मौत के बाद उनका शव एक मशहूर अस्पताल ने इसलिए देने से मना कर दिया था क्योंकि उनके इलाज में खर्च हुए 2 लाख रुपये का बिल बकाया था. दुर्भाग्य से भारत के नीति निर्माताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को इन्हें मुनाफा पसंदों के हवाले कर दिया है, हमारे देश में आजादी के बाद के दौर में निजी अस्पताल संख्या के लिहाज से 8 से बढ़कर 93 फीसदी हो गयी है. चूंकि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं या अक्षम बना दी गयी हैं इसीलिए आज ग्रामीण इलाकों में कम से कम 58 फीसदी और शहरी इलाकों में 68 फीसदी भारतीय निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर है. आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं पर बढ़ते खर्च की वजह से हर साल 3.9 करोड़ लोग वापस गरीबी में पहुंच जाते हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है फिर भी इसके बजट में कटौती की जाती है. केंद्र सरकार द्वारा अपने मौजूदा बजट में स्वास्थ्य में 20 फीसदी की कटौती की है, जानकार बताते हैं कि इस कटौती से नये डॉक्टरों की नियुक्ति करना और स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर सुविधाओं कराने जैसे कामों पर असर पड़ेगा .

विदेशों में कार्यरत भारतीय मूल के डॉक्टरों को वापस लाना एक अच्छा कदम हो सकता है लेकिन यह कोई हल नहीं है. बुनियादी समस्याओं पर ध्यान रखना होगा और यह देखना होगा कि समस्या की असली जड़ कहाँ पर है. भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पर्याप्त और अच्छी चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के मामले में गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है. अभी तक कोई ऐसी सरकार नहीं आई है जिसके प्राथमिकताओं में सावर्जनिक स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, आने वाली सरकारों को जरूरत के मुताबिक नए मेडिकल कालेजों में सार्वजनिक निवेश करके इनकी संख्या बढ़ाकर नए डॉक्टर तैयार करने वाली व्यवस्था का विस्तार करना होगा. निजी मेडिकल और अस्पतालों को भी किसी ऐसे व्यवस्था के अंतर्गत लाना होगा जिससे उन पर नियंत्रण रखा जा सके.
javed

 (लेखक जावेद अनीस से  9424401459 या javed4media@gmail.com से संपर्क किया जा सकता है )

Share00
previous post
मार्ग दुर्घटना में दो घायल
next post
उरुव धुरियापार सड़क का निर्माण ठप होने से क्षुब्ध विधायक अनशन पर बैठे
गोरखपुर न्यूज़ लाइन

संपर्क करें

अगर आप कोई सूचना, लेख, ऑडियो -वीडियो या सुझाव देना चाहते हैं तो इस ईमेल आईडी पर भेजें: gnl2004@gmail.com

सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन

Popular Posts

क्या वाकई मैं कुसूरवार हूँ ? नहीं ! बिलकुल नहीं !

गोरखपुर न्यूज़ लाइनApril 23, 2018April 23, 2018
April 23, 2018April 23, 20180
जेल में बंद डॉ कफ़ील अहमद खान का का ख़त -सच बाहर ज़रूर...

मनुष्य बन पाने की जद्दोजहद के साथ आत्मालोचना के भाव वाले कवि...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 21, 2024February 22, 2024

प्रेम कैद नहीं करता, दायरे नहीं खींचता , तोड़ता नहीं : डॉ...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 25, 2024February 26, 2024

महराजगंज के 18 वनटांगिया गांवों में चकबंदी होगी, शासनादेश आने पर वनटांगियों...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनMarch 1, 2024March 2, 2024

सफाई मजदूर एकता मंच के सम्मेलन में न्यूनतम वेतन 26 हजार करने की...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 29, 2024
logo
About US
गोरखपुर न्यूज़ लाइन , अलख फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित स्वत्रंत और जन्नोमुखी समाचार वेबपोर्टल हैं. इसकी स्थापना का लक्ष्य लोगों तक पेशेवर तटस्थता , जनसरोकार और स्वीकृत मूल्यों के अधीन रहते हुए समाचार पहुंचाना है और जनता के सवालों को चर्चा के केंद्र में लाना हैं. कॉर्पोरेट पूंजी से पूरी तरह मुक्त रहते हुए हम ऐसे मीडिया का निर्माण चाहते है जो लोगों में सामूहिक चेतना ,पहल , मानवीय संस्कृति का निर्माण करे. हमारी प्रतिबदधता जन संस्कृति के प्रति है. वितीय रूप से हम अपने मित्रों, सहयोगियों और व्यक्तिगत सहयोग पर निर्भरता की घोषणा करते हैं जो हमारे आधार मूल्यों और लक्ष्यों से सहमति रखते हैं.
Contact us: gnl2004@gmail.com
Follow us
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat
@2024 - gorakhpurnewsline.com. All Right Reserved.
Gorakhpur NewsLine
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
Gorakhpur NewsLine
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
@2026 - gorakhpurnewsline.com. All Right Reserved. Designed and Developed by PenciDesign
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat