34.2 C
New Delhi
Trending now

क्या वाकई मैं कुसूरवार हूँ ? नहीं ! बिलकुल नहीं…

मनुष्य बन पाने की जद्दोजहद के साथ आत्मालोचना के भाव…

प्रेम कैद नहीं करता, दायरे नहीं खींचता , तोड़ता नहीं…

महराजगंज के 18 वनटांगिया गांवों में चकबंदी होगी, शासनादेश आने…

सफाई मजदूर एकता मंच के सम्मेलन में न्यूनतम वेतन 26…

लोकरंग -2024 में आएंगे भोजपुरी पॉप रैपर रग्गा मेन्नो, असम,…

FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat

Gorakhpur NewsLine

सबद हमारा षरतड़ षांडा
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
Gorakhpur NewsLine
  • Home
  • विचार
  • ‘ मांस का मजहब ’
विचार

‘ मांस का मजहब ’

by गोरखपुर न्यूज़ लाइनMarch 31, 2017March 31, 20170155
Share00
( उत्तर प्रदेश में बूचड़खानों पर पाबंदी को लेकर छिड़ी बहस मांसाहार और शाकाहार तक पहुँच गई है। वरिष्ठ पत्रकार नासिरुद्दीन का यह लेख इस बहस को छेड़े जाने की राजनीति को समझने के लिए बहुत जरूरी है। नासिरुद्दीन का यह लेख 12 अगस्त 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित हुआ था ) 
हमारे मुल्क के खान-पान का मिजाज मांसाहार नहीं है या इस मुल्क की बड़ी आबादी शाकाहारी है-  यह भ्रम है. मिथक है. तथ्य से परे है. फिर भी ऐसा क्यों है कि हमारा मानस इसे मानने को तैयार नहीं होता है. हमें यह क्यों लगता है कि यह मुल्क असलियत में शाकाहारी है और कुछ समूह या समुदाय ही मांसाहारी हैं.
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) के जून में आये आंकड़ों के मुताबिक, इस मुल्क की लगभग एक तिहाई आबादी ही शाकाहारी है. यानी 70 फीसदी से ज्यादा लोग मांसाहारी हैं.
मांसाहार का यह अनुपात सभी जातियों और लिंगों में लगभग एक जैसा है. जैसे सामान्य, अनुसूचित जातियों और जनजातियों  के बीच शाकाहारी और मांसाहारी लोगों की तादाद में थोड़ा ही फर्क है. सामान्य समूह में करीब 69 फीसदी मांसाहारी हैं, तो अनुसूचित जातियों में 77 और अनू‍सूचित जनजातियों में 76 फीसदी. इन संख्याओं को यों भी देखा जा सकता है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों में शाकाहारियों की तादाद, सामान्य वर्ग के लोगों से थोड़ी ही कम है. ये आंकड़े 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों के खान-पान की पसंद के बारे में हैं. ये आधिकारिक हैं और सरकार के स्तर पर महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त की ओर से जारी किये गये हैं.
अब थोड़ा राज्यों के खान-पान के मिजाज के बारे में भी देखा जाये तो बेहतर है. एसआरएस की रिपोर्ट 21 बड़े राज्यों के बारे में जानकारी देती है. इसके मुताबिक, आठ बड़े राज्यों में रहनेवाले 90 फीसदी से ज्यादा लोग मांसाहारी हैं. ये राज्य उत्तर-पूर्व के नहीं हैं. इनमें आंध्र प्रदेश (98.25), बिहार (92.45), झारखंड (96.75), केरल (97), ओड़िशा (97.35), तमिलनाडु (97.65), तेलंगाना (98.7) और बंगाल (98.55) शामिल हैं. ध्यान रहे, इसमें जम्मू-कश्मीर शामिल नहीं है. जम्मू-कश्मीर की लगभग 69 फीसदी आबादी ही मांसाहारी है. असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तराखंड ऐसे राज्य हैं, जहां 70 फीसदी से ज्यादा लोग मांसाहारी हैं.
बड़े राज्यों में एक भी ऐसा नहीं है, जहां 90 फीसदी आबादी शाकाहारी हो. हालांकि, 21 में से चार राज्य ऐसे हैं, जहां शाकाहारी लोगों की तादाद ज्यादा है. वे हैं- राजस्थान (74.9), हरियाणा (69.25), पंजाब (66.75) और गुजरात (60.95). यानी गुजरात में भी करीब 40 फीसदी लोग मांसाहारी हैं. वहीं मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां शाकाहारियों की तादाद 35 से 45 फीसदी के बीच है. यहां आंकड़े यह भी बताते हैं कि शाकाहारियों में महिलाएं ज्यादा हैं (29.3), पुरुष कम (28.4).
ऐसा नहीं है कि एसआरएस की यह रिपोर्ट कोई अकेली है, जो इस मुल्क की बहुसंख्य आबादी के शाकाहारी होने की बात बताती है. एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआइ) ने नब्बे के दशक में एक बड़ा अध्ययन किया था. इस अध्ययन के मुताबिक, भारत में रहनेवाले 4,635 समुदायों में से लगभग 88 फीसदी मांसाहारी हैं. आबादी का ये लगभग 80 फीसदी हिस्सा हैं. विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) ने दस साल पहले ‘स्टेट ऑफ द नेशन सर्वे’ किया था. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक भी देश की करीब 70 फीसदी आबादी मांसाहारी है.
इन अध्ययनों की रिपोर्ट के आंकड़ों में थोड़ा बहुत फर्क हो सकता है. लेकिन इनके नतीजे एक जैसे हैं- मुल्क में मांस खानेवालों की तादाद शाकाहारियों की तुलना में काफी ज्यादा है. इससे यह नक्शा भी बहुत साफ होता है कि वस्तुत: शाकाहार जीवनशैली कहां और किनकी है. मांस के नाम पर हो रही हिंसा की राजनीति कहां, क्यों जोर पर है, यह भी दिखता है. इससे यह भी समझने में मदद मिलती है कि गोरक्षा के नाम पर मौजूदा तनाव के केंद्र कुछ राज्यों में मजबूत क्यों हैं.
जहां शाकाहारी कम हैं यानी मांसाहारी ज्यादा हैं, वहां ‘मांस का मजहब’ तय किया जा रहा है, ताकि मांसाहारियों को ‘मांस के मजहब’ के आधार पर बांटा जाये. मांसाहार में भी कौन किस चीज का मांस खाता है- यानी कहीं एक मांसाहारी, दूसरे मांसाहारी के ‘मजहब का मांस’ तो नहीं खाता. ऐसे ही काम के लिए ‘रक्षकों’ ने जगह-जगह मोरचा संभाल रखा है.
 खान-पान, कपड़ा-लत्ता का रिश्ता संस्कृति से है. सांस्कृतिक परिवेश से है. इसका रिश्ता आर्थिक हालत से भी है. मांस खाने का स्वाद कहीं बाहर से आया हो, इतने बड़े आंकड़े से यह नहीं लगता है. मुल्क के एक कोने से दूसरे कोने तक खान-पान में मांस की मौजूदगी भी यही इशारा करती है. इसीलिए शाकाहार जीवनशैली अपनाने का आंदोलन तो दिखता है, मगर मांसाहार अपनाने के लिए कोई मुहिम नहीं दिखती है.
मांसाहार किसी एक-दो समुदायों या जातियों तक सीमित नहीं है. वहीं इसके उलट शाकाहार सीमित दायरे में है.यह सीमित समूह, ज्यादातर समाज का मजबूत तबका है. समाज के रीति-नीति पर उसकी मजबूत पकड़ है. वह अपनी रीति-नीति को ही समाज की असरदार संस्कृति बनाना चाहता है. इसलिए वह खान-पान की श्रेष्ठता का शास्त्र बनाता है. इसे ही सभ्यता व संस्कृति का शास्त्र बताता है. वह चाहता है, सब उसके मुताबिक ही ‘सभ्य और सुसंस्कृ‍त’ हों. तनाव का एक केंद्र, यह भी है.
वैसे, हमारे देश की अधिकांश आबादी जीने के लिए खाती है. स्वाद के मौके उसके जीवन में कम आते हैं. उसके आसपास जो भी आसानी से मिलता है, वह उस पर जिंदगी गुजारती  है. फिर वह चाहे चूहा-चींटी-सांप ही क्यों न हो.  क्या खायें, क्या न खायें- इसे चुनने का मौका अब भी इस मुल्क की बड़ी आबादी के पास नहीं है. और अगर है भी, तो यह तय करने का हक किसने, किसे दिया है- कि कोई क्या खायेगा?
असल में खान-पान की श्रेष्ठता की राजनीति, लो‍कतांत्रिक मूल्यों को दरकिनार करने की राजनीति है. कोई क्या खायेगा- यह किसी व्यक्ति की निजी आजादी का भी मामला है. यह मुल्क के हर नागरिक के मौलिक अधिकार का भी मसला है. कोई किसी पर किसी की मर्जी के खिलाफ अपनी जीवनशैली नहीं थोप सकता. न ही किसी को यह हक बनता है कि वह अपनी जीवनशैली या खान-पान को सबसे बेहतरीन और दूसरे के खान-पान को नीच बताये.
Share00
previous post
इंसेफ्लाइटिस से विकलांग हुए बच्चों के लिए चिकित्सा शिविर 22-23 अप्रैल को
next post
सीनियर वर्ग में अनिकेत सोनी तीसरी बार बने टॉपर
गोरखपुर न्यूज़ लाइन

संपर्क करें

अगर आप कोई सूचना, लेख, ऑडियो -वीडियो या सुझाव देना चाहते हैं तो इस ईमेल आईडी पर भेजें: gnl2004@gmail.com

सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन

Popular Posts

क्या वाकई मैं कुसूरवार हूँ ? नहीं ! बिलकुल नहीं !

गोरखपुर न्यूज़ लाइनApril 23, 2018April 23, 2018
April 23, 2018April 23, 20180
जेल में बंद डॉ कफ़ील अहमद खान का का ख़त -सच बाहर ज़रूर...

मनुष्य बन पाने की जद्दोजहद के साथ आत्मालोचना के भाव वाले कवि...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 21, 2024February 22, 2024

प्रेम कैद नहीं करता, दायरे नहीं खींचता , तोड़ता नहीं : डॉ...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 25, 2024February 26, 2024

महराजगंज के 18 वनटांगिया गांवों में चकबंदी होगी, शासनादेश आने पर वनटांगियों...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनMarch 1, 2024March 2, 2024

सफाई मजदूर एकता मंच के सम्मेलन में न्यूनतम वेतन 26 हजार करने की...

गोरखपुर न्यूज़ लाइनFebruary 29, 2024
logo
About US
गोरखपुर न्यूज़ लाइन , अलख फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित स्वत्रंत और जन्नोमुखी समाचार वेबपोर्टल हैं. इसकी स्थापना का लक्ष्य लोगों तक पेशेवर तटस्थता , जनसरोकार और स्वीकृत मूल्यों के अधीन रहते हुए समाचार पहुंचाना है और जनता के सवालों को चर्चा के केंद्र में लाना हैं. कॉर्पोरेट पूंजी से पूरी तरह मुक्त रहते हुए हम ऐसे मीडिया का निर्माण चाहते है जो लोगों में सामूहिक चेतना ,पहल , मानवीय संस्कृति का निर्माण करे. हमारी प्रतिबदधता जन संस्कृति के प्रति है. वितीय रूप से हम अपने मित्रों, सहयोगियों और व्यक्तिगत सहयोग पर निर्भरता की घोषणा करते हैं जो हमारे आधार मूल्यों और लक्ष्यों से सहमति रखते हैं.
Contact us: gnl2004@gmail.com
Follow us
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat
@2024 - gorakhpurnewsline.com. All Right Reserved.
Gorakhpur NewsLine
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
Gorakhpur NewsLine
  • Home
  • समाचार
    • जनपद
    • राज्य
  • साहित्य – संस्कृति
    • स्मृति
    • लोकरंग
    • यात्रा संस्मरण
    • व्यंग्य
  • जीएनएल स्पेशल
  • चुनाव
    • लोकसभा चुनाव 2024
    • विधानसभा चुनाव 2022
    • नगर निकाय चुनाव 2023
    • लोकसभा चुनाव 2019
    • गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव 2018
    • यूपी विधानसभा चुनाव 2017
  • विचार
  • स्वास्थ्य
  • पर्यावरण
  • विज्ञान – टेक्नोलॉजी
  • साक्षात्कार
  • सपोर्ट गोरखपुर न्यूज लाइन
@2026 - gorakhpurnewsline.com. All Right Reserved. Designed and Developed by PenciDesign
FacebookTwitterInstagramPinterestLinkedinFlickrYoutubeEmailVimeoRssSnapchat